राजपथ - जनपथ

राजपथ-जनपथ : रफ्तार से मंज़ूरी
09-Apr-2026 5:27 PM
राजपथ-जनपथ : रफ्तार से मंज़ूरी

रफ्तार से मंज़ूरी

पखवाड़े भर पहले ही बजट सत्र में पारित धर्म स्वातंत्र्य विधेयक 26 को राज्यपाल के मुहर लगाए जाने की रफ़्तार पर विधानसभा से लेकर विधि विभाग तक सभी दांतों तले उंगली दबा रहे हैं। उन्हें लग रहा था कि कहीं किंतु परंतु लग कर क्वेरी हो सकती है?। पर ऐसा नहीं हुआ। वैसे 20 दिनों में  महानदी भवन से लोक भवन तक यह सब हो चुका होगा। फिर दोनों ही क्यों तीनों भवन, विधानसभा भी तो ...। सभी प्रश्न हल कर लिए गए हैं।

पिछली बार 2008 के विधेयक पर 18-19 वर्ष बाद भी मुहर नहीं लग पाई और लोक भवन से वापस महानदी भवन भेज दिया गया। हालांकि नए विधेयक के लिए ऐसा करना संवैधानिक औपचारिकता थी। विधि के जानकार बताते हैं कि नए विधेयक में सरकार ने किसी तरह के परंतुक की भी गुंजाइश नहीं रख छोड़ी। कहा जा सकता है कि एक मुकम्मल है। मसलन धर्मांतरण की प्रक्रिया, कितने दिन पहले आवेदन, पुनर्विचार का अवसर, फिर अनुमति, ऐसा न होने पर सजा अर्थदंड, अंतर धर्म विवाह की स्थिति में प्रावधान आदि..आदि. 2008 के विधेयक में इन सबकी कमी थी। क्योंकि वो अविभाज्य मप्र के कानून का अनुपालन भर था। यह पूरी तरह से नया, मूल कानून  कहलायेगा। ऐसे में बस इस नए कानून को लागू करने में समय समय पर आने वाली व्यवहारिक दिक्कतों को भर नियम बना कर सुधारा जा सकेगा। हालांकि हर ऐसे नए सुधार की सूचना सदन पटल पर सरकार को पेश करना होगा।

 यह भी कहा जा रहा है कि खामियां निकालने वाले जुट गए हैं। वे इस पर स्टे के लिए कोर्ट में चुनौती दे सकते हैं। 2008 के कानून को भी सुप्रीम कोर्ट चुनौती दी गई थी। वह भी छत्तीसगढ़ के कानून को लेकर। इस पर कोर्ट ने 5 राज्यों से जानकारी मांगी थी। इस बार चुनौती के लिए काफी महीन अध्ययन करना होगा। वैसे पिछले ही दिनों सुप्रीम कोर्ट ने धर्मांतरितों के डबल मुनाफे पर प्रश्न चिन्ह लगाया था। सो यह मुद्दा भी नहीं बन सकता। देखना होगा आगे क्या होता है।

बस्तर की रेल के लिए नया आश्वासन

छत्तीसगढ़ राज्य बने 25 साल से अधिक बीत गए, लेकिन आज भी बस्तर जैसे अहम इलाके राजधानी रायपुर से रेल नेटवर्क से नहीं जुड़ पाए हैं। इधर एक बार फिर रेल मंत्रालय ने घोषणा की है कि जगदलपुर रावघाट रेल लाइन के लिए डीपीआर तैयार हो गया है।

अभी तक सिर्फ घोषणाएं और अनुबंध होते रहे हैं, जमीन पर काम नहीं होता। कोरबा-अंबिकापुर रेल लाइन की भी यही हालत है। बस्तर और सरगुजा संभाग के लाखों लोग अभी भी बस, ट्रक या निजी वाहनों पर निर्भर हैं। यात्रा महंगी और समय लेने वाली हो जाती है।

रावघाट-जगदलपुर रेल लाइन की मांग पुरानी है। 1995 में योजना आयोग ने दल्लीराजहरा से जगदलपुर तक रेल मार्ग को मंजूरी दी थी। 1996-97 में पहला अनुबंध हुआ। 2007 में दूसरा अनुबंध। फिर 9 मई 2015 को दंतेवाड़ा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जनसभा में तीसरा अनुबंध हुआ। उस दिन सेल, एनएमडीसी, इरकान और सीएमडीसी ने मिलकर बस्तर रेलवे प्राइवेट लिमिटेड (बीआरपीएल) बनाई। प्रधानमंत्री खुद मौजूद थे, पूरा बस्तर उत्साहित था। लेकिन आज 11 साल बाद भी एक इंच रेल नहीं बिछी।

रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव बार-बार आश्वासन देते हैं। बस्तरवासी लगातार आंदोलन करते रहते हैं। फिर भी काम शुरू नहीं हो पाता। अब रेलवे बोर्ड ने नया डीपीआर तैयार किया है। इस बार लागत बढक़र 3282.14 करोड़ रुपये हो गई है। दावा किया गया है इस लाइन को विद्युतीकरण के साथ बनाया जाएगा और ट्रेन 130 किलोमीटर की रफ्तार से दौड़ सकेगी। योजना खुश करती है, पर रेलवे बोर्ड ने इसे सिर्फ सैद्धांतिक मंजूरी दी है, बजट में कोई प्रावधान नहीं है, जबकि 3 साल में काम पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। 

राज्य सरकार के अनुरोध पर अब रेलवे बोर्ड ने पूरा प्रोजेक्ट अपने हाथ में लेने का फैसला किया है। बीआरपीएल कंपनी में शेयर होल्डिंग, इरकान की भूमिका और सेल के बखेड़े ने सालों तक काम रोका। बीआरपीएल ने अलग से ठेकेदार से अनुबंध किया, लेकिन विवाद सुलझा नहीं।  अगर यह लाइन बन गई तो बस्तर सीधे रायपुर से जुड़ जाएगा। यात्रियों का समय और पैसा दोनों बचेगा। माल ढुलाई सस्ती हो जाएगी। व्यापार बढ़ेगा। नक्सल प्रभावित इलाकों में विकास की रफ्तार तेज करने का मकसद भी पूरा होगा। पर बस्तर के लोग उम्मीद और निराशा के बीच झूल रहे हैं।

नतीजों से पहले एडमिशन

अभी न तो सीबीएसई न सीजी बोर्ड के 10-12 वीं और न ही 9,11 वीं लोकल परीक्षाओं के नतीजे घोषित हुए हैं। और न नए सत्र की मुकम्मल शुरुआत हुई है। लेकिन अखिल भारतीय स्तर के बड़े और स्थानीय निजी कोचिंग सेंटर के संचालक अपना कारोबार शुरू करने में जुट गए हैं। देश प्रदेश के बड़े सेंटर शैलेन्द्र नगर, देवेंद्र नगर, बैरन बाजार, शंकर नगर शांति नगर, कोटा, राजेन्द्र नगर के साथ कई स्कूलों में भी किराए पर संचालित हैं।

नतीजों से पहले ही वे 10-11 वीं के एडमिशन बुक करने लग गए हैं। खासकर कॉमर्स, साइंस और मैथ्स के लिए। अभिभावकों की शिकायत है कि बच्चों के साथ कंसल्टेशन के लिए कोचिंग सेंटर पहुंचने पर कोई भी टर्म कंडीशन नहीं बताया जाता। बस एक दो दिन के ट्रायल क्लासेस में बिठाने के बाद कहा जा रहा है कि बहुत कम सीटें बच गई हैं, एडमिशन कन्फर्म कर लीजिए। ऐसा तो स्कूलों में नहीं होता। कारण- उन्हें मालूम है कि बच्चों को पढ़ाना अभिभावकों की जिम्मेदारी से कहीं अधिक  मजबूरी भी है।

 उस पर इन सेंटर्स ने फीस भी इस वर्ष 20-50 फीसदी तक बढ़ा दिया है। यह भारी भरकम फीस भी एक या अधिकतम दो किश्त में जमा करने की बाध्यता। उसमें भी मसलन  यह कि एक मुश्त देने पर 36 हजार और दो किश्त में 40 हजार रुपए देने होंगे। ड्राप लेकर डमी एडमिशन के इच्छुक बच्चों की फीस तो लाख डेढ़ लाख तय है। मानों इन लोगों ने माता पिता को लोन दिया हुआ हो और उस पर टर्म कंडीशन लागू कर रखा हो।

 एडमिशन के बाद स्कूल में पढ़ाई जा रही किताबें, इन्हें मान्य नहीं है ये अपनी प्रिसक्राइब्ड महंगी किताबें खरीदवाएंगे। साथ ही ड्रेस कोड के नाम पर महंगे टी-शर्ट, एडिडास, नाइकी, स्कैचर्स, रिबाक और वुडलैंड के जूते भी। मोटे कमीशन के लिए इसका काउंटर भी सेंटर में ही खोल रखा है। अभिभावक पूछे तो कहते हैं कि दो अलग-अलग किताबों के गणित पढऩे से नॉलेज मजबूत होता है। कुछ एक महीने की पढ़ाई के बाद फैकल्टी के लूप होल उजागर होने पर भी बच्चे का पढऩा और अभिभावकों का पढ़ाना मजबूरी हो जाती है। दरअसल  तीन वर्ष पहले लिए गए अपने फैसले को सरकार के भुला दिए जाने से ये सभी स्वछंद हो गए हैं। केंद्र सरकार ने सभी कोचिंग सेंटर को आयकर के दायरे में ला रखा है, लेकिन अब तक किसी से उनके आय-व्यय का हिसाब-किताब नहीं लिया।

उडऩे वाली गिलहरियों का शिकार

बस्तर जैसे सघन वन क्षेत्र, जहां जैव विविधता का खजाना मौजूद है, वहां ग्रामीण इलाकों में कई बार लोग परंपरागत या अज्ञानता के चलते ऐसे वन्यजीवों का शिकार कर लेते हैं जो संरक्षित प्रजाति के हैं और विलुप्ति के कगार पर हैं।

यह प्रजाति करीब 3 फीट तक लंबी हो सकती है और अपने आकर्षक रंगों व वृक्षों पर रहने की आदत के कारण जंगल की पारिस्थितिकी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। मालाबार गिलहरियों को स्थानीय लोग उडऩे वाला चूहा भी कहते हैं। इनको वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 की अनुसूची एक में शामिल किया गया है। यानि इन्हें बाघों के समान ऊंची कानूनी सुरक्षा मिली हुई है। ऐसे में इनका शिकार एक बड़ा दंडनीय अपराध है। सोशल मीडिया पर अनेक मालाबार गिलहरियों के शिकार के बाद जश्न मनाते हुए दो युवकों की वीडियो क्लिप इस समय वायरल है। इस तस्वीर को बस्तर का बताया जा रहा है।

उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में इनकी सुरक्षा के उपाय किए जाने का दावा वन विभाग के अधिकारी करते हैं। इसके लिए ड्रोन का इस्तेमाल भी किया जा रहा है। जागरूकता अभियान चलाने की जरूरत ज्यादा है, ताकि लोग इनका शिकार करने से बचें।


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