राजपथ - जनपथ
अफसर को अनिवार्य सेवानिवृत्ति
रेल मंत्रालय ने छत्तीसगढ़ यानि दपूमरे बिलासपुर जोन के अंतर्गत वरिष्ठ प्रशासनिक श्रेणी के एक अधिकारी को अनिवार्य सेवानिवृत्ति देकर घर बिठा दिया है। वे देश भर के 6 वरिष्ठ अधिकारियों में एक है। इनमें उत्तर रेलवे के मुख्यालय में तैनात ष्टरूश्व (प्रोजेक्ट), दक्षिण पश्चिम रेलवे के हृस्न-॥्रत्र अधिकारी, दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे के स््रत्र अधिकारी, और पूर्वी रेलवे के ढ्ढक्रस्स्श्व अधिकारी शामिल हैं। इसके अलावा रेलवे बोर्ड सचिवालय सेवा (क्रक्चस्स्) के अंडर सेक्रेटरी/डिप्टी डायरेक्टर स्तर के अधिकारी हैं। यह कड़ी कार्रवाई भारतीय रेल स्थापना संहिता (ढ्ढक्रश्वष्ट) के नियम 1802(क) के तहत की है। यह नियम प्रशासन को यह विशेष अधिकार देता है कि वह जनहित को ध्यान में रखते हुए किसी भी ऐसे अधिकारी को समय से पहले रिटायर कर सकता है, जिसका प्रदर्शन मानक के अनुरूप नहीं है। सरल शब्दों में कहें तो, अगर कोई अधिकारी सरकारी कामकाज में बाधा बन रहा है या उसकी काम करने की क्षमता खत्म हो गई है, तो सरकार उसे पेंशन देकर रिटायर कर सकती है।
यह कार्रवाई उन सभी के लिए एक कड़ा सबक है जो सरकारी नौकरी को केवल सुरक्षित ठिकाना मानकर अपने कर्तव्यों के प्रति लापरवाह रहते हैं। इस कदम ने जोन और मंडल मुख्यालय के अफसरों में हडक़ंप मचा दिया है।
वैसे यह व्यवस्था मनमोहन सरकार ने 20 वर्ष की सेवा और 50 वर्ष की आयु पूरी करने वाले दागी और काम में असमर्थ केन्द्रीय अधिकारी कर्मचारियों को अनिवार्य सेवानिवृत्ति की योजना बनाई थी। इसे मोदी सरकार भी जारी रखे हुए है। जो छत्तीसगढ़ में भी लागू हैं लेकिन दो दशकों में केवल तीन आईपीएस, 2 आईएएस को घर का रास्ता दिखाया जा सका है। हालांकि इस दौरान कई आईएएस, आईपीएस आईएफएस अफसरों को शार्ट लिस्ट किया गया था। लेकिन सभी को सरकारों का वरदहस्त मिलता रहा। कुछ आईपीएस तो जेल भी होकर आ गए हैं। लेकिन ऐसे सभी महानुभाव अब तक सेवा पर बने हुए हैं। हर साल सीआर के पिछले पन्ने पलट दिए जा रहे हैं। देखना होगा मुख्यधारा की सेवा वाले इन अफसरों का नंबर कब आएगा।
मौत का जोखिम उठाकर पर्यटन?
खल्लारी माता मंदिर 1100 फीट की ऊंचाई पर है। यहां की घुमावदार 900 सीढिय़ां चढऩा मुश्किल लगता है, इसलिए पांच साल पहले शुरू हुई यहां की रोप वे सेवा हजारों श्रद्धालुओं की पहली पसंद है। नवरात्रि जैसे मौकों पर भीड़ तो बढ़ती है, लेकिन सुरक्षा मानक ढीले रह जाते हैं।
ठीक एक साल पहले डोंगरगढ़ में बम्लेश्वरी देवी मंदिर की रोप वे में बीजेपी नेता समेत चार श्रद्धालु घायल हुए थे। उस समय भी केबल टूटने और ट्रॉली गिरने की बात सामने आई थी। इससे पहले 2021 में एक मजदूर की मौत हुई थी। यहीं पर तत्कालीन कलेक्टर संजय अग्रवाल 1 अप्रैल 2024 को चैत्र नवरात्रि की तैयारी देखने के लिए गए थे। बिजली बंद हो जाने के कारण वे रोप वे में काफी देर तक हवा में लटके रह गए।
देशभर के दूसरे स्थानों में भी यही तस्वीर है। बीते साल 2025 में गुजरात के पावागढ़ हिल पर कार्गो रोप वे के केबल टूटने से छह लोग मारे गए। 2022 में झारखंड के त्रिकुट रोप वे में दो केबल कारों की टक्कर से दो मौतें हुईं और दर्जनों श्रद्धालु घंटों फंसे रहे।
अपने राज्य के देवी मंदिरों में नवरात्रि के दौरान श्रद्धालुओं की संख्या एकाएक बढ़ जाती है। रोप वे से जाने के लिए भी लंबी कतारें लगती हैं और इनमें ओवरलोडिंग भी होती है। रविवार की घटना में 28 वर्षीया आयुषी की मौत हो गई। उनके पति ऋ षभ सहित 16 लोग गंभीर रूप से घायल हो गए।
सरकार ने घटना के प्रति शोक जताते हुए जांच कराने की बात की है। पर मोटे तौर पर कुछ सवाल खड़े होते हैं। क्या नवरात्रि के पहले सेफ्टी ऑडिट कराई गई? केबल, ब्रेक, सेंसर और मोटर किसी भी रोप वे के संवेदनशील हिस्से होते हैं, उन्हें क्या जांचा परखा गया?
रोप वे का संचालन निजी कंपनी या मंदिर ट्रस्ट करती हैं। अक्सर लागत को बचाने के चक्कर में पुराने या कालातीत हो चुके पार्ट्स से काम चलाया जाता है। इसलिए ऑडिट का काम, संचालन करने वाली टीम से अलग होना चाहिए। इसे एनडीआरएफ, एसडीआरएफ या सरकार से मान्यता प्राप्त विशेषज्ञों की टीम के जरिये कराया जा सकता है। कल की घटना में दूसरी ट्राली को तो सुरक्षित वापस लाया गया लेकिन पूरी रोप वे में कई ट्रॉलियां फंस जाती तो क्या होता?
मौजूदा सरकार पर्यटन विकास और खासकर मंदिरों में पर्यटन सुविधाओं के विस्तार पर खूब जोर दे रही है। बम्लेश्वरी, खल्लारी जैसे स्थल तीर्थ तो हैं ही, पर्यटन के लिहाज से भी पसंदीदा डेस्टिनेशंस हैं। यहां सुविधाएं किस तरह की है, सुरक्षा की व्यवस्था कैसी है- यह हमारे राज्य की पर्यटन संभावनाओं को प्रतिबिंबित करती हैं। पर्यटक किसी भी पर्यटन स्थल पर मौत का जोखिम उठाकर नहीं पहुंचना चाहेगा।


