राजपथ - जनपथ

राजपथ-जनपथ : सभी के निशाने पर राजस्व विभाग
22-Mar-2026 6:25 PM
राजपथ-जनपथ : सभी के निशाने पर राजस्व विभाग

सभी के निशाने पर राजस्व विभाग

विधानसभा के बजट सत्र में इस बार टंकराम वर्मा सबसे ज्यादा निशाने पर रहे। खास बात यह रही कि उन्हें सिर्फ विपक्ष ही नहीं, बल्कि अपनी ही पार्टी के सदस्यों की नाराजगी भी झेलनी पड़ी।

सत्र के दौरान जब मंत्री वर्मा ने नसीहत भरे अंदाज में जल संसाधन और अन्य विभागों को अपनी जमीन की रक्षा करने की बात कही, तो पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि दूसरे विभाग अपनी जमीन की रक्षा करेंगे, तो फिर राजस्व विभाग की भूमिका क्या रह जाएगी।वहीं भाजपा विधायक रिकेश सेन भी विभाग की कार्यप्रणाली से असंतुष्ट नजर आए। उन्होंने सदन में कहा कि लगभग हर विधानसभा क्षेत्र में भू-माफिया सक्रिय हैं, लेकिन राजस्व अमला निष्क्रिय बना हुआ है। उन्होंने सीधे तौर पर अमले पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगाए।

दूसरी ओर, कांग्रेस विधायक दलेश्वर साहू ने विभाग में अफसरशाही का मुद्दा उठाया। उन्होंने बताया कि एक विवादित अधिकारी को हटाने के लिए वे स्वयं मंत्री से मिले थे और मंत्री ने भी सहमति जताई थी, लेकिन जब तबादला सूची जारी हुई, तो स्थिति जस की तस बनी रही।

इसके साथ ही राजस्व मामलों के निपटारे के लिए लगाए जाने वाले शिविर भी बंद होने की बात सामने आई। इन तमाम मुद्दों के चलते सदन में राजस्व मंत्री के प्रति असंतोष खुलकर दिखाई दिया, जो इस सत्र की प्रमुख राजनीतिक चर्चाओं में शामिल रहा।

इंटरनेट बंद, फिर भी पूरा बिल!

इंटरनेट की सेवा बिजली पानी की तरह जरूरी हो गई हो गई है। केंद्र सरकार ने डिजिटल इंडिया को एक मिशन के रूप में अपना रखा है। ऑनलाइन पढ़ाई, वर्क फ्रॉम होम, यूपीआई लेन-देन तो इस सेवा पर टिका ही है आजकल दफ्तरों में हाजिरी और दूरदराज के गांवों से डेटा हासिल करने के लिए भी सरकार को इसकी जरूरत पड़ती है। ऐसे में लोकसभा में सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने इंटरनेट सेवाएं उपलब्ध कराने वाली कंपनियों पर जवाबदेही बढ़ाने के लिए आवाज उठाई जो एक बड़ी पहल  है। 2024-25 में भारत में प्रति व्यक्ति मासिक डेटा उपयोग 27.5 से 36 जीबी तक पहुंच चुका है, जो दुनिया में सबसे ज्यादा है।  यह आंकड़ा और बढ़ सकता है मगर, ग्रामीण और छोटे शहरों में तो स्थिति बदतर है। रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग जैसे शहरों से लेकर दूरदराज के गांवों तक उपभोक्ता हर महीने सैकड़ों रुपये फूंक रहे हैं। राशन के खर्च की तरह इंटरनेट की बिलिंग का भुगतान भी जरूरी हो चुका है। मगर टेलीकॉम कंपनियां जवाबदेह नहीं। सेवाएं ठप होने के बावजूद पूरा बिल वसूल करती हैं। बिजली-पानी की बिलिंग तो मीटर चलने के हिसाब से होती है, मगर इंटरनेट की नहीं। सांसद अग्रवाल ने ट्राई के सेवा गुणवत्ता विनियम, 2024 में संशोधन की मांग की है ताकि ब्रॉडबैंड बिलिंग बिजली मीटरिंग की तरह लागू हो। बिजली कटौती के समय मीटर रुक जाता है, चाहे कटौती एक मिनट की हो या पूरे दिन की। ऐसा इंटरनेट पर लागू क्यों नहीं होता? दुनिया के कई देशों जैसे सिंगापुर, यूके, कुछ यूरोपीय राष्ट्रों में स्वचालित क्रेडिट का प्रावधान पहले से मौजूद है, मगर भारत में यह लागू नहीं है। दरअसल, टेलीकॉम दिग्गजों का एकाधिकार इतना मजबूत है कि उपभोक्ता की शिकायतों पर ट्राई सख्ती से कार्रवाई नहीं करता। बीते साल मोबाइल प्री-पेड सेवा का शुल्क पहले जियो ने बढ़ाया, फिर एक के बाद एक दूसरी कंपनियों ने बढ़ा दिया। उपभोक्ता सवाल करते रहे कि अचानक कौन सा खर्च बढ़ गया? ट्राई भी खामोशी से देखता रहा, जबकि शुल्क को नियंत्रित करने का अधिकार उसके पास है। इधर, ब्रॉड बैंड सेवा ठप होने पर आप कॉल करते रहिये, तकनीशियन जब मर्जी आकर सुधारेंगे। व्यवधान के बदले में कोई  मुआवजा नहीं, जुर्माना नहीं, कोई जवाबदेही नहीं।और अब तो 5जी के दावा किया जाता है, पर ग्राउंड रियलिटी यह है कि बुनियादी 3जी, 4जी कवरेज भी कई जगहों पर खराब है।आज इंटरनेट कोई शौक नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जरूरत बन चुका है। बड़ी समस्या यह है कि जब इंटरनेट चलता नहीं, तब भी उसका पूरा बिल क्यों भरा जाए। सही सुझाव है कि बिजली जाती है तो मीटर रुक जाता है, वैसे ही इंटरनेट बंद होने पर बिल भी रुकना चाहिए।

बहुत कठिन है डगर तीरथ की...

स्कूलों की परीक्षाएं खत्म होते ही तीर्थ और पर्यटन स्थलों पर भीड़ उमड़ पड़ी है। लेकिन इस बार यात्रियों को राहत कम और परेशानियों का सामना ज्यादा करना पड़ रहा है। सबसे बड़ी दिक्कत दो हैं, ट्रेनों की लगातार लेट लतीफी और गैस सिलेंडर की किल्लत।

रेल मार्ग पर यदि कोयला या आयरन ओर की खदानें पड़ती हैं, तो यात्रियों को देरी झेलना लगभग तय है। रेलवे की प्राथमिकता यात्री ट्रेनों से ज्यादा मालगाडिय़ों को समय पर पहुंचाना बन गई है। यही वजह है कि छत्तीसगढ़ से जगन्नाथ पुरी धाम जाने वाले यात्रियों को खासा इंतजार करना पड़ रहा है। आस्था के इस प्रमुख केंद्र के साथ-साथ यहां का समुद्र भी पर्यटकों को आकर्षित करता है, जिससे सीजन में भीड़ और बढ़ जाती है। दुर्ग-पुरी रेल मार्ग पर कई कोयला और लौह अयस्क खदानें होने के कारण यात्री ट्रेनों को बार-बार रोका जाता है, ताकि मालगाडिय़ों को रास्ता दिया जा सके। नतीजतन, दुर्ग-पुरी जैसी तेज रफ्तार ट्रेनें भी 2 से 4 घंटे की देरी से चल रही हैं।

दूसरी ओर, पुरी में ठहरना भी महंगा होता जा रहा है। होटलों के किराए बढ़ गए हैं, जिसकी एक बड़ी वजह कमर्शियल गैस की कमी बताई जा रही है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ईरान-अमेरिका-इजराइल तनाव के चलते गैस सप्लाई प्रभावित हुई है, जिसका असर स्थानीय बाजार तक पहुंच रहा है। होटल संचालकों को पर्याप्त गैस नहीं मिल पा रही, जिससे वे लकड़ी के चूल्हे या इंडक्शन पर निर्भर हो गए हैं। इन तमाम परिस्थितियों ने यात्रा को न सिर्फ थकाऊ बना दिया है, बल्कि खर्च भी काफी बढ़ा दिया है। यात्रियों के लिए इस बार की तीर्थयात्रा आस्था से ज्यादा धैर्य की परीक्षा बनती दिख रही है। इसलिए तो कहा जाता है कि तीर्थ यात्रा कठिन होती है।


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