राजपथ - जनपथ
टरकाना या भरमाना?
विधानसभा में इन दिनों मंत्रियों के जवाबों की शैली खुद चर्चा का विषय बनी हुई है। कई मौकों पर ऐसे जवाब सामने आते हैं, जिन्हें सदस्य ‘टरकाने वाला’ मानते हैं। खास तौर पर ‘दिखवा लेंगे’ या दिखवा लेंगे अलग से उपलब्ध करा देंगे जैसे जवाबों ने सदन की गंभीरता पर सवाल खड़े किए हैं।
‘दिखवा लेंगे’ वाला जुमला कोई नया नहीं है। विधानसभा के पहले कार्यकाल में तत्कालीन पंचायत मंत्री अमितेश शुक्ल अक्सर इसका इस्तेमाल किया करते थे। किसी मामले में सीधे जांच के आदेश देने से बचते हुए वे इस तरह के जवाब देकर स्थिति संभालने की कोशिश करते थे। एक बार भाजपा सदस्य चोवा दास खांडेकर ने जब गड़बड़ी की जांच की मांग की, तो ‘दिखवा लेंगे’ कहकर बात टालने की कोशिश की गई। इस पर सदस्य नाराज हो गए और उन्होंने साफ पूछा कि इसका मतलब क्या है—जांच होगी या नहीं? मामला बढ़ता देख तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद शुक्ल को हस्तक्षेप करना पड़ा और उन्होंने स्पष्ट कराया कि प्रकरण की जांच कराई जाएगी।
समय के साथ यह जुमला कम जरूर हुआ, लेकिन अब उसकी जगह एक नया तरीका देखने को मिल रहा है—अलग से दस्तावेज उपलब्ध करा देंगे। मौजूदा सत्र में कई मंत्री अधूरे जवाबों के साथ यही आश्वासन देते नजर आए हैं।
इस पर सत्ता पक्ष के ही वरिष्ठ सदस्य अजय चंद्राकर ने सवाल खड़े करते हुए कहा कि मंत्री लिखित जानकारी देने की बात तो करते हैं, लेकिन हकीकत में बाद में दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए जाते। विपक्ष ने भी इस पर सहमति जताई और कई जवाबों को गलत या अधूरा बताया।
कुल मिलाकर, इस सत्र में ज्यादातर मंत्रियों के जवाबों का स्तर संतोषजनक नहीं माना जा रहा। सदन के भीतर यह धारणा बनती दिख रही है कि जवाबदेही से बचने की प्रवृत्ति बढ़ी है, जो संसदीय परंपराओं के लिहाज से चिंता का विषय है।
देवी दरबारों में एलपीजी संकट

देशभर में आज से चैत्र नवरात्रि का महापर्व शुरू हो गया है। देवी मंदिरों में नौ शक्तियों की आराधना हो रही है। हवन-पूजन के साथ-साथ इनके लिए ईंधन की भारी मात्रा जरूरी होती है। प्राय: सभी मंदिरों में भंडारा खोले जाते हैं, जिनमें हजारों-लाखों लोगों के लिए भोजन, खिचड़ी, हलवा, पूरी सब्जी तैयार किए जाते हैं। ईरान-अमेरिका (इजरायल) के बीच चल रहे महायुद्ध का देशभर के देवी मंदिरों में असर दिख रहा है। एलपीजी सिलेंडर का दाम 60 से 115 रुपये तक युद्ध के शुरुआती दिनों में ही बढ़ गया था। मगर, युद्ध लंबा खिंचने के कारण इसकी आपूर्ति भी बाधित हो गई है। देश के कुछ बड़े मंदिरों में इसका क्या असर हुआ है, इसकी जानकारी जुटाने से दिलचस्प तथ्य सामने आते हैं। टीटीडी, यानि तिरुमाला देवस्थानम् में रोजाना 6 टन एलपीजी की खपत होती है। युद्ध के पहले ही यहां इतना रिजर्व रख लिया गया कि आने वाले दिनों में भंडारा बिना रुकावट चालू रहे। श्री माता वैष्णोदेवी श्राइन बोर्ड ने भी लंगर सेवा जारी रखने के लिए स्टाक बढ़ाया। बोर्ड की ओर से बयान दिया गया कि भंडारा तैयार करने के लिए व्यवस्था मजबूत कर ली गई है। मगर, पंचकुला स्थित मनसा देवी मंदिर में एलपीजी की किल्लत के चलते भंडारे का रोटी बनाना बंद कर दिया गया है। कहा गया है कि व्यवस्था दुबारा पहले जैसी करने का प्रयास किया जा रहा है। अयोध्या की राम रसोई में भंडारे का समय सीमित कर दिया गया है। यहां इंडक्शन स्टोव, इलेक्ट्रिक कुकर और स्टीम बेस्ड कुकिंग की जा रही है। कुछ अन्य देवी मंदिरों में कामाख्या, कालीघाट, विंध्यवासिनी आदि में भी भंडारे की मात्रा या वितरण के समय में कटौती की गई है।
अब छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध देवी मंदिरों का हाल भी जान लें। रतनपुर स्थित महामाया मंदिर प्रबंधन की ओर से कहा गया है कि प्रसाद और भंडारा जारी रहेगा लेकिन एलपीजी संकट को देखते हुए रोटी-सब्जी की जगह सादी खिचड़ी या फल-मिठाई पर फोकस किया जाएगा। डोंगरगढ़ का भंडारा भी ईंधन संकट से प्रभावित है। यहां भी इंडक्शन-इलेक्ट्रिक कुकर तथा बायोगैस का उपयोग बढ़ाया गया है। दंतेश्वरी मंदिर में भंडारे की व्यवस्था सुचारू रखने के लिए लकड़ी कोयला और डीजल का विकल्प अपनाया है। चंद्रहासिनी देवी मंदिर में भी भंडारे का समय कम किया गया और प्रसाद की मात्रा घटाई गई है।
मंत्रालय में अब-अन्ना, एक प्लेट इडली नहीं...
1 अप्रैल से छत्तीसगढ़ मंत्रालय के गलियारों में अन्ना एक मसाला डोसा,एक प्लेट इडली, के साथ एक स्ट्रांग या फिल्टर काफी की गूंज सुनाई नहीं देगा।
इंडियन कॉफी हाउस का सांबर बड़ा, उपमा, उत्तपम,नहीं मिलेगा। हम अभी से अप्रैल फूल वाली खबर नहीं, सही खबर दे रहे हैं। और ऐसा भी नहीं है कि काफी हाउस वाले , ये बनाना या सर्व करना बंद कर रहे हैं,बल्कि वहां अब काफी हाउस ही नहीं रहेगा।
सामान्य प्रशासन विभाग के मंत्रालय अधीक्षण शाखा ने नए रेस्टोरेंट के लिए टेंडर जारी कर दिया है जिसकी चयन प्रक्रिया अंतिम चरण में है। 1 अप्रैल से किसी नए होटल समूह को कैंटीन संचालन का ठेका मिल जाएगा। हालांकि ऐसा पहले भी हो चुका था। राज्य गठन के बाद से डीकेएस मंत्रालय भवन में इंडियन कॉफी हाउस का कैंटीन संचालित होता रहा। लेकिन महानदी भवन शुरू होते ही काफी हाउस के बजाय अन्य होटल संचालक को दिया। जहां न केवल महंगे बल्कि व्यंजन स्वादानुसार न परोसने की शिकायतें आम रहीं । 2012 में मुख्य सचिव रहे सुनील कुमार की पहल पर पुन: केरल की कॉफी की चुस्की मिलने लगी। इंडियन काफी हाउस एक सहकारी समिति द्वारा संचालित रेस्टोरेंट समूह है, जो रियायती दरों में सेवा प्रदाता है। अब तक इसे लेकर कोई शिकायत नहीं सुनाई देती। कॉफी हाउस मतलब स्वाद और ताजा होने की गारंटी भी, देश में भर दी जा रही गारंटियों से कहीं अधिक विश्वसनीय।
बहरहाल महानदी भवन में कॉफी हाउस की विदाई की खबर बताने और सुनने वाले यह भी कह रहे जल्द वापस भी आएगा। जैसे विधानसभा में हुआ। जहां बड़े प्रॉफिट की उम्मीद से खुला रेस्टोरेंट बढ़ती लागत से बंद हो गया। सो जो होगा अच्छा होगा।


