राजपथ - जनपथ
20 साल में ही कॉरिडोर में आया मंत्रालय
बीस साल पहले नवा रायपुर में जब नए मंत्रालय भवन की योजना बनाई गई थी तब प्लानर और डेवलपर्स ने 50 वर्ष की जरूरत के मुताबिक निर्माण का दावा किया था। मिनिस्टीरियल, सेक्रेटरियल और एडमिनिस्ट्रेटिव तीन ब्लॉक के पांच मंजिल वाले महानदी भवन ने आकार लिया। एकड़ों में फैले भवन में बड़े अनुभाग कक्ष के साथ एडमिनिस्ट्रेटिव ब्लॉक में 156 और मिनिस्ट्रियल सेक्रेटेरिएल ब्लाक में 220 कक्ष हैं। हम भवन का नाप जोख इसलिए बता रहे हैं कि अब दो दशक में ही यह भवन छोटा पडऩे लगा है। ऐसा नहीं है कि इन वर्षों में मंत्रालय कैडर में बहुत अधिक भर्तियां हो गई हों।
केवल तीन बार की भर्ती के आंकड़े मिलते हैं और उससे कहीं अधिक लोग रिटायर हो चुके हैं। ऐसा भी नहीं है कि सचिवों की संख्या बढ़ गई हो। उसके बावजूद स्थानाभाव की यह समस्या संसदीय सचिवों के लिए बने कमरों में आला सचिवों का कब्जा। तो फील्ड अफसर कहे जाने वाले डिप्टी कलेक्टरों के साथ राज्य कैडर वाले ओएसडी की आरामतलब नौकरी के लिए मंत्रालय में पोस्टिंग लेने से आई है। पुराने लोग बड़े बड़े कमरे में बने हुए हैं और नयों को कमरे देने कई अनुभागों में पार्टिशन करके चेंबर बनाने पड़े हैं । और कुछ को जीएडी से ही कह दिया जाता है कि मंत्रालय में कक्ष नहीं मिलेगा। उसके बाद भी मंत्रालय पोस्टिंग का क्रेज़।
दूसरी समस्या एनआईसी जैसे कई दफ्तरों का महानदी भवन में बने रहना। ऐसी हालत में कमरों की मारामारी की इस समस्या से निपटने जीएडी ने भवन के भूतल के ओपन कॉरिडोर में एक दर्जन नए कमरे बनाए हैं। जहां जीएडी के ही अनुभाग को शिफ्ट किए जाने की चर्चा है। यह प्रयोग सफल हुआ तो कहीं ऐसा न हो कि हर मंजिल के कॉरिडोर में कमरों का अंबार लग जाए। वैसे मंत्रालय अधीक्षण शाखा और जीएडी के बीच चर्चाओं में परिसर के भीतर उपलब्ध खाली जमीन पर एक नया भवन बना लिया जाए तो समस्या 50 वर्ष आते तक हल हो सकती है।
कमाऊ पूत की थाली
रेल बजट को लेकर बढ़-चढक़र दावे किए जा रहे हैं। छत्तीसगढ़ के लिहाज से रेल बजट को ऐतिहासिक करार दिया जा रहा है। केन्द्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा कि छत्तीसगढ़ में रेलवे की अधोसंरचना विकास के लिए 7470 करोड़ रुपए खर्च किए जाएंगे। मगर अब जानकारी छनकर आ रही है, उसमें कोई खास बात नहीं दिख रही है।
कुछ जागरूक लोगों ने रेलवे के रिकॉर्ड खंगाल रहे हैं। यह बात सामने आई है कि बिलासपुर जोन 9462 करोड़ के फायदे में है। उस अनुपात में छत्तीसगढ़ में यात्री सुविधाएं नहीं बढ़ी है। इससे परे सेंट्रल रेलवे और वेस्ट सेंट्रल रेलवे जो कि क्रमश: 787, और 3572 करोड़ के घाटे में हैं। वहां बुलेट ट्रेन और हाईस्पीड ट्रेन व मेट्रो चलाई जा रही है। ये दोनों जोन महाराष्ट्र और गुजरात में आते हैं, और रेलवे ने इन्हीं राज्यों पर विशेष रूप से फोकस किया है। छत्तीसगढ़ में परमालकसा-खरसिया कॉरीडोर के अलावा अन्य रेल लाइन बिछाने की योजना है। खास बात ये है कि यहां से यात्री सुविधाओं के बजाय कोयला परिवहन का उपयोग ज्यादा होगा।
सुदूर आदिवासी अंचल रावघाट-जगदलपुर रेल परियोजना पर काम चालू होने वाला है। लेकिन यहां भी खनिज परिवहन के लिए ज्यादा उपयोग होगा। हालांकि कुछ वंदे भारत जैसी कुछ ट्रेन जरूर चली है। नए रेलवे स्टेशन का निर्माण हुआ है, लेकिन जिस हिसाब से मुनाफा बढ़ा है, उससे यहां मेट्रो हाईस्पीड ट्रेन चलाए जाने की उम्मीद जताई जा रही थी, जो कि फिलहाल दूर की कौड़ी नजर आ रही है।
शांति के प्रतीक पर अनदेखा संकट

शाम ढलते ही घरों की मुंडेर पर आ बैठने वाले कबूतर शांति, प्रेम और सह-अस्तित्व के प्रतीक माने जाते हैं। नीले-धूसर पंखों की यह सुंदर छवि अब शहरों में एक अलग ही बहस का कारण बन गई है। पक्के मकानों, बंद बालकनियों और सीमित खुली जगहों के बीच आज इंसान और कबूतर आमने-सामने खड़े दिखाई देते हैं। डर और असमंजस के साथ।
चिकित्सकों और शोधों ने चेताया है कि कबूतरों की बीट और पंखों से उडऩे वाले सूक्ष्म कण हवा के जरिए फेफड़ों तक पहुंच रहे हैं। इससे हाइपरसेंसिटिविटी न्यूमोनाइटिस और इंटरस्टिशियल लंग डिजीज जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ता है। अस्थमा और सांस संबंधी रोगियों के लिए यह जोखिम और भी गंभीर बताया जा रहा है। राजस्थान के कुछ शहरों में कबूतरों की बढ़ती संख्या के साथ इन बीमारियों के मामलों में इजाफा होना इसकी वजह बताई जा रही है।
देश के कई शहरों में पुरानी इमारतों के सामने कबूतरों को दाना डालने की पुरानी परंपरा है। कहा जा रहा है कि के कारण बढ़ते प्रदूषण और बर्ड फ्लू का खतरा बढ़ रहा है। अब जयपुर, बेंलगूरु और मुंबई के कुछ शहरों में कबूतरों के लिए सार्वजनिक दाना डालने पर 5000 रुपये तक दंड का प्रावधान कर दिया गया है। एक ओर स्वास्थ्य का सवाल है, तो दूसरी ओर पक्षी के लिए करुणा और परंपरा।
कई पक्षी प्रेमियों को कबूतरों के साथ इस तरह का बर्ताव करने पर आपत्ति है। उनका कहना है कि मानव ने जब जंगल छीने, खुले आकाश को कंक्रीट में बदला, तब इन कबूतरों का प्राकृतिक आश्रय भी छिन गया। आज जंगल उनके नहीं रह गए। अब शहरों से विदा होकर कहां जाएंगे। क्या चील, बाज की तरह ये भी लुप्त हो जाएंगे? मगर, इसके अस्तित्व को तो बचाकर रखना ही होगा- वरना राष्ट्रीय समारोहों में शांति के प्रतीक के रूप में किसे उड़ाया जाएगा? यह तस्वीर बिलासपुर के नरेंद्र वर्मा ने खींची है।


