राजपथ - जनपथ
प्लास्टिक बोतलों के पहाड़ से कैसे बचेंगे?
छत्तीसगढ़ सरकार ने 2026-27 की एक्साइज पॉलिसी में सरकारी दुकानों से बिकने वाली शराब को प्लास्टिक बोतलों में पैक करने का फैसला लिया है। निर्णय नए वित्तीय वर्ष से यानि एक अप्रैल से लागू होगा। छत्तीसगढ़ जैसे भारी खपत वाले राज्य में प्लास्टिक बोतलों के उपयोग को लेकर इतना बड़ा फैसला तो सरकार ने ले लिया लेकिन ऐसी कोई नीति घोषित नहीं की है जो इससे जुड़ी स्वास्थ्य और पर्यावरण प्रदूषण संबंधी चिंताओं का समाधान करे।
सरकार ने मुख्य रूप से ब्रेकेज और डैमेज से होने वाले नुकसान को कम करना इसका कारण बताया है। कांच की बोतलों में ट्रांसपोर्ट और स्टोरेज के दौरान टूटने से आर्थिक नुकसान होता है। दरअसल, प्लास्टिक बोतलें सस्ती और हल्की होती हैं, जिससे ट्रांसपोर्टेशन लागत घटती है। शराब निर्माताओं के लिए भी प्लास्टिक आसान और सस्ता विकल्प है। कांच की बोतलों के मुकाबले प्लास्टिक बोतलों पर खर्च 30 प्रतिशत तक कम हो जाता है। कुछ रिपोर्ट्स में अनुमान लगाया गया है कि इस नई नीति के चलते सरकार का भी सालाना राजस्व 400 करोड़ तक बढ़ सकता है।
छत्तीसगढ़ जैसे उच्च खपत वाले राज्य में कांच की बोतल बंद होने से इसका निर्माण करने वाले उद्योगों को भारी नुकसान होगा, वहीं प्लास्टिक बोतल बनाने वालों को एक बड़ा बाजार मिलेगा। मगर, श्रमिकों के वर्ग में भी हलचल है। कल दुर्ग जिला मुख्यालय में दर्जनों महिलाओं ने प्रदर्शन कर प्रशासन को ज्ञापन सौंपा। ये महिलाएं नई आबकारी नीति के विरोध में हैं। इनका कहना था कि कांच की खाली बोतलों को धोकर वे अपना परिवार पाल रही हैं। एक दिन में 10 से 15 कट्टा बोतलों को धोने के बदले उनको 400 रुपये तक की कमाई होती है, जो बंद हो जाएगी। इनका दावा है कि पूरे प्रदेश में हजारों महिलाएं इस काम में लगी हुई हैं, सबका रोजगार छिनेगा।
मगर इससे भी बड़ा मुद्दा स्वास्थ्य और पर्यावरण प्रदूषण से संबंधित है। आम तौर पर शराब कांच की बोतलों में रखी जाती है। माना जाता है कि प्लास्टिक में ऑक्सीजन घुस सकता है, जो शराब के फ्लेवर और क्वालिटी को खराब कर देता है। शराब प्लास्टिक से केमिकल्स, जैसे एथिलीन ग्लाइकॉल को घोल सकती है, खासकर छत्तीसगढ़ जैसे इलाके में, जहां गर्मी अधिक पड़ती है। लंबे समय तक स्टोरेज में यह समस्या बढ़ सकती है। प्लास्टिक से माइक्रोप्लास्टिक्स और केमिकल्स शराब में घुल सकते हैं, जो कैंसर, डिमेंशिया जैसी बीमारियों के कारण होते हैं।
प्लास्टिक बोतलें शराब का सेवन करने वालों की ही समस्या नहीं है। सबको पता है कि प्लास्टिक कंटेनर आसानी से प्रदूषण फैलाते हैं और रीसाइक्लिंग मुश्किल होती है। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकार ने 2019 में प्लास्टिक बोतलों में शराब बेचने का फैसला लिया था जिसे पर्यावरण के लिए संकट मानते हुए बाद में वापस ले लिया गया। महाराष्ट्र, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, मध्य प्रदेश, ओडिशा, और राजस्थान ने भी प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगा रखा है, या कांच पर स्विच कर लिया है।
मगर कई राज्यों में प्लास्टिक बोतलों पर शराब मिलती है। जैसे केरल में 80 प्रतिशत शराब प्लास्टिक बोतलों में बिकती हैं। तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश भी ऐसे ही राज्य हैं। ऐसे ज्यादातर राज्यों में सस्ती या देसी वैरायटी या फिर 90 एमएल की बोतल प्लास्टिक की होती हैं। मगर, कुछ राज्यों ने पर्यावरण संबंधी खतरों को कम करने के लिए कुछ उपाय भी किए हैं। केरल और तमिलनाडु में डिपॉजिट स्कीम चलती है, जिसमें शराब के साथ 10 या 20 रुपये अतिरिक्त लिए जाते हैं। यह राशि बोतल वापस करने पर लौटा दी जाती है। छत्तीसगढ़ सरकार ने प्लास्टिक बोतलों को डिस्पोज ऑफ करने की कोई पॉलिसी अभी घोषित नहीं की है। शायद, 1 अप्रैल से पहले तय हो।
लखमा के तो पड़ोस में है दूसरा प्रदेश
करीब पौने चार सौ दिन जेल में गुजारने के बाद पूर्व आबकारी मंत्री कवासी लखमा की रिहाई हो रही है। लखमा पर 34 सौ करोड़ के शराब घोटाले में संलिप्तता के आरोप हैं। उनके खिलाफ ईडी, और ईओडब्ल्यू-एसीबी ने केस दर्ज किया था। लखमा को सुप्रीम कोर्ट से सशर्त जमानत मिली है। जमानत की एक शर्त में यह भी है कि उन्हें जमानत अवधि में राज्य के बाहर रहना होगा। खास बात ये है कि लखमा कई और आरोपियों की तुलना में सुविधाजनक स्थिति में रहेंगे।
कोयला घोटाले के आरोपी रानू साहू, समीर विश्नोई, और अन्य को भी जमानत अवधि में दूसरे राज्यों में रहना पड़ रहा है। मगर लखमा को बहुत दूर जाने की जरूरत नहीं है। लखमा सुकमा जिले के कोंटा विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनका विधानसभा दो राज्य ओडिशा के मलकानगिरी, और आंध्रप्रदेश के चित्तूर जिले से सटा हुआ है।
लखमा दोनों ही जगहों पर आते-जाते रहे हैं। दोनों राज्यों में पार्टी प्रत्याशियों का प्रचार करने जा चुके हैं। वहां उनका अच्छा नेटवर्क भी है। लखमा के करीबी लोग मलकानगिरी में रहने की व्यवस्था कर रहे हैं। उन्हें तीन दिन बाद प्रदेश छोडऩा पड़ेगा। वो एक-दो दिन में ही प्रदेश छोड़ देंगे। कुल मिलाकर प्रदेश छोडऩे के बाद भी वो घर के नजदीक ही रहेंगे। और अपने विधानसभा से जुड़े लोगों के संपर्क में भी रहेंगे।
बृजमोहन के बागी तेवर

संसद की कार्रवाई ठप होने के बाद परिसर में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, और प्रियंका गांधी से चर्चा करते दो भाजपा सांसद बृजमोहन अग्रवाल व विनय सहस्त्रबुद्धे की तस्वीर सोशल मीडिया में वायरल हुई।
चर्चा में मध्यप्रदेश के पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह भी शामिल थे। चूंकि राहुल गांधी की पीएम नरेंद्र मोदी, और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से कटुता जगजाहिर है। ऐसे में बृजमोहन, और विनय सहस्त्रबुद्धे के अनौपचारिक बातचीत को भी राजनीतिक नजरिए से देखा जा रहा है।
बृजमोहन प्रदेश में भाजपा की राजनीति में सबसे सीनियर होने के बाद भी केंद्र में मंत्री नहीं बनाए गए। राज्य सरकार से भी उनकी अलग-अलग विषयों को लेकर तनातनी चल रही है। जंबूरी मामले को लेकर तो खुद अपनी ही सरकार के खिलाफ हाईकोर्ट गए हैं। नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत ने तो एक कार्यक्रम में यहां तक कह दिया था कि बृजमोहन भाजपा के भीतर ‘अपने’ आदमी हैं। ऐसे में राहुल, और सोनिया के साथ तस्वीर को लेकर कुछ लोग अनुमान लगा रहे हैं कि बृजमोहन को नुकसान उठाना पड़ सकता है। चूंकि चुनाव में काफी वक्त बाकी है, ऐसे में बृजमोहन से जुड़े लोग इससे बेपरवाह है।


