राजपथ - जनपथ
पुरानी आकांक्षाएं फिर रह गईं अधूरी
कभी रेलवे बजट को लेकर एक अलग ही रोमांच हुआ करता था। केंद्रीय बजट से ठीक पहले पेश होने वाला रेल बजट देशभर की निगाहें खींच लेता था। जितनी उत्सुकता वित्त मंत्री के भाषण को लेकर रहती थी, लगभग उतनी ही रेल मंत्री के एलानों को लेकर भी होती थी। रेल मंत्री का रुतबा कुछ अलग ही माना जाता था। वित्त मंत्री पूरे देश के लिए, तो रेल मंत्री अपने-अपने इलाकों के लिए खास समझे जाते थे।
इसी दौर में कई रेल मंत्रियों ने अपने क्षेत्रों और अपनी राजनीतिक छवि को मजबूत करने के लिए बड़े फैसले किए। ममता बनर्जी ने दुरंतो एक्सप्रेस जैसी ट्रेनें शुरू कीं। मध्यप्रदेश को माधवराव सिंधिया के कार्यकाल में नई रेल सेवाओं की सौगात मिली। बिहार के लालू प्रसाद यादव ने गरीब रथ चलाकर आम यात्रियों के हितैषी होने की छवि गढ़ी। इन मंत्रियों के दौर में यात्री किराया या तो बढ़ा ही नहीं, या फिर नाममात्र की वृद्धि हुई। कई रियायतें दी गईं- हालांकि इनमें से अधिकांश अब वापस ली जा चुकी हैं। छत्तीसगढ़, खासकर बिलासपुर में रेलवे जोन की मांग को लेकर लंबे समय तक आंदोलन चला। यह देश के सबसे अधिक कमाई करने वाले डिवीजनों में से एक है, इसलिए इसका हक बनता है। लेकिन उसी दौरान बेंगलुरु में सीके जाफर शरीफ के रहते हुए और हाजीपुर में रामविलास पासवान रेल मंत्री के होने के चलते नए जोन घोषित हो गए। इसके बाद बिलासपुर में आंदोलन और उग्र हुआ, तब जाकर कहीं जाकर यहां रेलवे जोन की मंजूरी मिली।
केंद्र में भाजपा सरकार आने के बाद रेलवे बजट को केंद्रीय बजट में मिला दिया गया। इसके पीछे सोच चाहे जो रही हो, लेकिन नतीजा यह हुआ कि रेल मंत्री की व्यक्तिगत छवि और घोषणाओं का दौर खत्म हो गया है। रेल मंत्री का कद अलग नहीं होता, वे बाकी मंत्रियों की कतार में होते हैं। अब किराया घटाने-बढ़ाने या नई ट्रेनें शुरू करने जैसे फैसले बजट भाषण का हिस्सा नहीं होते। इन्हें कभी भी, किसी भी समय घोषित कर दिया जाता है। इसके बावजूद रेलवे आम आदमी की जिंदगी से इतना गहराई से जुड़ा है कि बजट आते ही लोग यह देखने लगते हैं कि उनके राज्य को क्या मिला। नई लाइनें, नई ट्रेनें, किराए में राहत, इन सवालों के जवाब हर बार खोजे जाते हैं। हाल के वर्षों में रेलवे आवंटन को राज्यवार बताने की परंपरा शुरू हुई है, जिसके लिए बजट के बाद रेल मंत्री वर्चुअल प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हैं।
इस बार छत्तीसगढ़ के लिए 7,470 करोड़ रुपये के आवंटन का दावा किया गया। बताया गया कि यह पिछले साल से 545 करोड़ रुपये अधिक है और यूपीए दौर की तुलना में कई गुना ज्यादा है। आंकड़ा वाकई बड़ा है, लेकिन खुशी इसलिए नहीं बन पाई क्योंकि वर्षों से लंबित जन-आकांक्षाओं को इसमें जगह नहीं मिली। बस्तर को राजधानी से जोडऩे वाली रेल लाइन पर कोई घोषणा नहीं हुई। अंबिकापुर-रामानुजगंज-गढ़वा, सरडेगा-पत्थलगांव-अंबिकापुर, खरसिया-नया रायपुर-परमालकसा और कटघोरा-कवर्धा-डोंगरगढ़ जैसी नई लाइनों पर रेलवे ने सैद्धांतिक सहमति तो दे रखी है, लेकिन बजट में इनके लिए कोई प्रावधान नहीं है।
दर्जनभर से अधिक नई ट्रेनों की मांग लंबे समय से उठाई जा रही हैं। सांसदों ने रेल मंत्री से मुलाकात की, संसद में सवाल लगाए, लेकिन मजबूत प्रतिनिधित्व होने के बावजूद कुछ भी खास नहीं मिला। छत्तीसगढ़ के लिए घोषित अधिकांश राशि पुरानी परियोजनाओं को आगे बढ़ाने और ऐसी कनेक्टिविटी पर खर्च होने वाली है, जिससे रेलवे को माल ढुलाई में फायदा हो। स्टेशनों के सौंदर्यीकरण के लिए भी रकम रखी गई है, लेकिन यह सब रेलवे की कारोबारी जरूरतों को ध्यान में रखकर किया गया लगता है।
बिना ट्रेन नए स्टेशन बुढ़ा रहे!
प्रदेश में रेल सुविधाओं का विस्तार हुआ है। रेलवे स्टेशनों का आधुनिकीकरण भी किया गया है। इस साल भी रेलवे के बजट में करीब 75 सौ करोड़ का प्रावधान किया गया है। तमाम दावों के बावजूद प्रदेश की दर्जनभर रेलवे स्टेशन ऐसी है, जहां यात्री ट्रेनें नहीं रुक रही है। यहां सिर्फ माल परिवहन हो रहा है।
कांकेर सांसद भोजराज नाग ने रेलवे की एक बैठक में अंतागढ़ में यात्री टे्रन नहीं रूकने पर नाराजगी जताई थी। उन्होंने कहा कि रेलवे स्टेशन तो बना दिए गए हैं, लेकिन टे्रनें नहीं रूक रही है। ऐसे में रेल सुविधाओं के विस्तार का कोई मतलब नहीं है। राज्यसभा सदस्य देवेन्द्र प्रताप सिंह भी रेलवे की कई बैठकों में रेल सुविधाओं के विस्तार को लेकर सवाल खड़े कर चुके हैं।
नई जानकारी यह है कि रायगढ़ इलाके में आधा दर्जन से अधिक रेलवे स्टेशन का निर्माण हुआ है। मगर यहां यात्री ट्रेनें नहीं रूकती है। इन स्टेशनों में खरसिया से धरमजयगढ़ के बीच आधा दर्जन स्टेशनों का निर्माण हुआ है। इनमें गुरदा, छाल, घरघोड़ा, कारी छापा, कुडूमकेला, और धरमजयगढ़ हैं। खास बात यह है कि आज तक इन स्टेशनों में यात्री ट्रेनें नहीं रुकी है। अब ये नए स्टेशन खंडहर होते जा रहे हैं। सीएम विष्णुदेव साय, और स्थानीय सांसदों ने रेल मंत्री से स्टॉपेज के लिए मांग की है। देखना है आगे क्या होता है।
अफसर नहीं चाहते अधिक बैठकों का सत्र
छत्तीसगढ़ विधानसभा के बजट सत्र को लेकर प्रशासनिक कामकाज शुरू हो गया है। विधानसभा से लेकर मंत्रालय, समेत सभी दफ्तरों में हलचल बढ़ गई है। विधायक भी प्रश्न जमा करने लगे हैं। इस दौरान सभी एक ही मुद्दे पर चर्चा कर रहे हैं कि इतना छोटा सत्र कैसे निपटेगा सरकारी कामकाज। विधानसभा सचिवालय के मुताबिक रजत जयंती वर्ष में यह 25 वर्षों में सदन की बैठकों के लिहाज से सबसे छोटा सत्र होगा। बीते ढाई दशक में भी छोटे सत्र होते रहे हैं लेकिन समय से पहले अवसान होने की वजह से। इस बार 15 दिन के सत्र की अधिसूचना ही पहली बार जारी की गई।
एक ओर कॉमनवेल्थ संसदीय समूह भारत के प्रमुख लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला छोटी विधानसभाओं की अधिक बैठकों पर जोर दे रहे हैं? तदनुसार विधानसभा स्पीकर रमन सिंह भी कम से कम रजत जयंती वर्ष में अधिक बैठकों वाले सत्र के इच्छुक थे। उन्होंने 20 बैठकों वाले सत्र के लिए सरकार से रायशुमारी भी की। लेकिन अधिसूचना जारी हुई छोटे सत्र की। ऐसा सत्र तो कांग्रेस काल में भी नहीं बुलाया गया। पूर्व स्पीकर और नेता प्रतिपक्ष चरण दास महंत भी अधिक दिनों के सत्र के पैरोकार रहे हैं।अब मंत्रालय से विधानसभा तक विचारों का एक ही द्वंद्व कि आखिर अफसर क्यों नहीं चाहते अधिक बैठकों वाला सत्र?
सत्र के निर्णय से जुड़े एक अधिकारी ने कहा कि सत्र के आयोजन में खर्च हमारा, और अधिक दिन बैठक कर अपनी पोल खुलवाने का अवसर विपक्ष को कैसे दें दें? रही बात 15 दिनों में कार्यवाही की तो पहला सप्ताह अभिभाषण, बजट प्रस्तुति में निकल जाएगा। फिर 5-7 दिन का होली अवकाश। उसके बाद विभागों के बजट पर चर्चा। देर रात तक बैठकर काम निपटाना होगा। तभी 20 मार्च तक विधि विधाई कार्य पूरे होंगे या फिर विधेयक अगले सत्र तक मुल्तवी करने होंगे।
स्वाद ही नहीं, सेहत के लिए भी खास
इन दिनों छत्तीसगढ़ के शहरों और कस्बों में फुटपाथों पर सजे बेर लोगों का ध्यान खींच रहे हैं। सर्दी के मौसम में मिलने वाला यह छोटा-सा फल स्वाद और सेहत दोनों के लिए खास है। कच्चे बेर हल्के खट्टे होंगे, जबकि पके बेर मीठे और रसदार हो जाते हैं। इनमें विटामिन-सी, आयरन और फाइबर प्रचुर मात्रा में पाया जाता है, जो रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने और पाचन को बेहतर रखने में मदद करता है।
छत्तीसगढ़ में बेर का उत्पादन बस्तर संभाग, कांकेर, नारायणपुर, धमतरी, महासमुंद और सरगुजा अंचल के ग्रामीण इलाकों में अधिक होता है। यह कम पानी और अपेक्षाकृत कठिन परिस्थितियों में भी उग जाता है, इसलिए आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों में यह आजीविका का एक बड़ा साधन भी है। लोक चिकित्सा में बेर को खांसी, सर्दी और कमजोरी में उपयोगी माना जाता है। सस्ते दाम और पौष्टिक गुणों के कारण बेर तक हर वर्ग की पहुंच है। यह तस्वीर बिलासपुर पं. देवकीनंदन चौराहे से प्राण चड्ढा ने ली है।


