राजपथ - जनपथ
तेंदूपत्ता सुलग रहा है
तेन्दूपत्ता के टेंडर में बड़ी गड़बड़ी होते-होते रह गई। अफसरों ने तो गड़बड़ी कर दी थी, लेकिन कुछ सुबूत छोड़ दिए थे, और फिर मामला इतना बढ़ गया कि सीएम तक शिकायत पहुंच गई। विभाग की प्रमुख महिला अफसर ने टेंडर प्रक्रिया से जुड़े अफसरों को धमकाया, तो आनन-फानन में गड़बड़ी को दुरूस्त कर लिया गया।
हुआ यूं कि पिछले दिनों तेन्दूपत्ता का ऑनलाईन टेंडर हुआ। इस बार अच्छी बोली आई थी, और फिर 586 लॉट स्वीकृत भी कर दिए गए। बाद में संशोधित कर 429 लॉट स्वीकृति दिखाई गई। इस पूरी प्रक्रिया में वेबसाइट से पहले के स्वीकृति आदेश को हटा दिया गया। इसके खिलाफ तेन्दूपत्ता ठेकेदारों ने मोर्चा खोल दिया। पहले तो लघु वनोपज संघ के अफसरों ने ध्यान नहीं दिया, लेकिन बाद में संघ के पदाधिकारियों तक बात पहुंचाई गई, और वह दस्तावेज भी दिखाए गए।
संघ के पदाधिकारियों ने सीएम तक तेन्दूपत्ता के टेंडर में गड़बड़ी की शिकायत की। विभाग की प्रमुख महिला अफसर तक जानकारी पहुंची, तो वो काफी खफा हुईं, और उन्होंने साफ तौर पर जिम्मेदार अफसरों के खिलाफ कार्रवाई की चेतावनी दे दी। फिर क्या था, आनन-फानन में सारी गड़बडिय़ां ठीक की गई, और पूर्व में जो लॉट स्वीकृत किए थे, उसे फिर जारी किया गया।
जितना बड़ा बजट, उतना बड़ा प्रचार भी

केन्द्रीय बजट के प्रचार-प्रसार के लिए इस बार भाजपा ने जो रणनीति अपनाई है, वो पहले कभी नहीं देखी गई। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन देश भर के संगठन मंत्रियों की बैठक ले चुके हैं। बजट को लोगों तक कैसे बेहतर ढंग से पहुंचाया जा सके, इसके लिए पखवाड़े भर से बैठकें होती रही। इसमें पार्टी के राष्ट्रीय नेता जुड़े थे।
बजट भाषण से पहले सभी जिलों से प्रमुख नेताओं को प्रशिक्षण दिया गया, और फिर सबने एक साथ बजट भाषण सुना। बजट पर प्रतिक्रिया देने के लिए पार्टी ने पूर्व वित्तमंत्री अमर अग्रवाल की अगुवाई में एक कमेटी बनाई है। इसमें वित्तमंत्री ओ.पी.चौधरी, खनिज निगम के अध्यक्ष सौरभ सिंह, उपाध्यक्ष नंदन जैन, और अमित चिमनानी हैं। इन सभी को बजट पर प्रतिक्रिया देने के लिए अधिकृत किया गया था। खास बात ये है कि कमेटी का गठन भी पार्टी हाईकमान ने किया था। गांव-कस्बों-नगरों तक बजट के प्रावधान पहुंचे, और लोगों के बीच सकारात्मक माहौल बने, इसके लिए काफी कोशिशें हुई है। सभी ने मजबूती से बजट के प्रावधानों, और आम जनता को होने वाले फायदों से अवगत कराया। छत्तीसगढ़ में तो अभी कोई चुनाव नहीं है, लेकिन पांच राज्यों के चुनाव अगले तीन महीने में होने वाले हैं। केन्द्रीय बजट से राज्यों के चुनावों में कितना फायदा मिलता है, यह तो आने वाले समय में पता चलेगा।
लाठी-डंडों से रोकना पड़ रहा अवैध खनन

छत्तीसगढ़ का मैनपाट इलाका अपनी अद्भुत प्राकृतिक सुंदरता के लिए मशहूर है, लेकिन यहां बॉक्साइट की भरपूर मात्रा भी मौजूद है। इसी इलाके के बरिमा गांव में भी बॉक्साइट के भंडार हैं। राज्य खनिज विकास निगम ने आसपास की जमीन को सात साल के लिए लीज पर लिया था, लेकिन अब लीज की मियाद खत्म हो चुकी है। निगम ने एक निजी कंपनी को खनन का ठेका सौंपा था।
हाल ही में कंपनी के कर्मचारी गांव पहुंचे और बॉक्साइट निकालने के लिए नई जगह पर मिट्टी हटाने का काम शुरू कर दिया। करीब दो महीने तक वे मिट्टी हटाते रहे, लेकिन जब बड़ी-बड़ी जेसीबी मशीनें लाकर बॉक्साइट निकालने की तैयारी हुई, तो ग्रामीणों ने विरोध जताया। प्रभावित लोग ज्यादातर आदिवासी मांझी समुदाय के हैं। वे लाठी-डंडे लेकर खदान में घुस गए और कंपनी के कर्मचारियों को भगा दिया। ग्रामीणों का गुस्सा देखकर कर्मचारी और मजदूर भाग खड़े हुए। शुक्र है कि उस दिन कोई अप्रिय घटना नहीं घटी और किसी को चोट नहीं आई।
छत्तीसगढ़ के रायगढ़, अंबिकापुर और बस्तर जैसे इलाकों में हाल के दिनों स्थानीय लोगों या जमीन मालिकों की सहमति लिए बिना खनन का प्रयास हो रहा है, जिससे तनाव बढ़ा है। यहां ग्रामीणों ने विरोध इसलिए किया क्योंकि यह उनकी निजी जमीन थी, जिसे उन्होंने अभी तक लीज पर नहीं दिया है। कोई मुआवजा नहीं दिया गया और न ही कोई रकम मिली। नियम के मुताबिक, स्थानीय राजस्व और खनिज विभाग के अधिकारियों को ग्रामीणों से बात करके उनकी मंजूरी लेनी चाहिए थी, उसके बाद ही खनन शुरू करना था।
राज्य खनिज विकास निगम तो सरकार की ही संस्था है। फिर प्रक्रियाओं का पालन करने से उसे क्या दिक्कत है? यह बात समझ से बाहर है। अगर खनन करने वालों से ग्रामीणों का टकराव और बढ़ता, तो हालात बिगडऩे पर आदिवासी लोग ही लाठी-डंडों से हमला करने के आरोप में जेल जाते।


