राजपथ - जनपथ

राजपथ-जनपथ : आज बात कुछ जोड़ों की
20-Jan-2026 5:46 PM
राजपथ-जनपथ : आज बात कुछ जोड़ों की

आज बात कुछ जोड़ों की

हाल के  वर्षों में एक ही बैच के आईएएस और आईपीएस अधिकारियों के बीच शादी के आधार पर कॉमन कैडर च्वाइस या इंटर-कैडर ट्रांसफर में काफी बढ़ोतरी हुई है। किसी अधिकारी को गृह राज्य में इंटर-कैडर ट्रांसफर की अनुमति नहीं है।

हालांकि नियम कुछ खास परिस्थितियों में ऐसे ट्रांसफर की अनुमति देते हैं, लेकिन इस क्षेत्र में इसकी बड़ी संख्या ने नौकरशाही और राजनीतिक हलकों में कैडर मैनेजमेंट, संस्थागत संतुलन और शासन में पावर कपल्स की बढ़ती मौजूदगी के बारे में बातचीत शुरू कर दी है। ट्रांसफर आमतौर पर जीवनसाथी के कैडर में होता है।

कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) इन्हें मंज़ूरी देता है, और अक्सर यह सुनिश्चित करता है कि अधिकारी को जीवनसाथी के कैडर में ही भेजा जाए।  छत्तीसगढ़ में भी ऐसी नौकरशाह दंपतियां है जिन्होंने ट्रेनिंग में रहते या बाद में विवाह कर कैडर बदला है। हालिया वर्षों में आईएएस वैशाली जैन- आईपीएस हर्षित मेहर, नम्रता जैन -निखिल, प्रतिष्ठा ममगई उनके पति, आईएएस सुरुचि सिंह -आईपीएस लक्ष्य शर्मा, आईपीएस योगेश पटेल- आईएएस पत्नी प्रमुख हैं। बीते दो दशकों में ऐसी और भी दंपतियां रहीं हैं।

वैसे अखिल भारतीय स्तर पर इनमें सर्वाधिक संख्या पंजाब हरियाणा राज्यों में सामने आई है। जहां कम से कम 66 आईएएस और आईपीएस अधिकारियों के ट्रांसफर हुए हैं, जो देश में सिविल सेवा कपल्स के सबसे बड़े ज्ञात समूहों में से एक है। हरियाणा कैडर को खास तौर पर पसंद किया जाता है, जिसमें हाल के वर्षों में पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और यूपी कैडर सहित कई आईएएस अधिकारियों ने हरियाणा में रहने वाले अधिकारियों से शादी के बाद वहां ट्रांसफर करवाया है। इनमें छत्तीसगढ़ के भी एक पूर्व आईएएस एस के राजू भी राज्य गठन के शुरुआती वर्षों में अपनी पत्नी मधुमिता मित्रा के मूल कैडर हरियाणा चले गए थे। पूर्व में नक्सल समस्या को देखते हुए भी कुछ अफसरों खासकर आईपीएस ने अपने जीवनसाथी के कैडर को चुना है।

अविभाजित मध्यप्रदेश को ऐसा राज्य माना जाता था जहाँ दूसरे राज्यों से आने वाले अफ़सर-जोड़ों का स्वागत किया जाता था। कई ऐसे राज्य भी रहते थे जो ऐसे जोड़ों की अजऱ्ी मंजूर नहीं करते थे। 

हमारी शहर सरकारें गरीब क्यों हैं?

संविधान के अनुच्छेद 243-आई और 243-वाई में लिखा है कि हर पांच साल में राज्य वित्त आयोग बनना जरूरी है। यह आयोग राज्य सरकार की आय का हिस्सा पंचायतों और नगरीय निकायों को देने की सिफारिश करता है। यह स्थानीय स्वशासन की आर्थिक रीढ़ है। लेकिन विडंबना, कई राज्यों में यह आयोग या तो बनता ही नहीं या जानबूझकर निष्क्रिय रखा जाता है। शायद सरकारें नहीं चाहतीं कि निकायों को उनका हक मिले। इससे उनका बजट पर नियंत्रण कम होता है और राजनीतिक दबदबा घटता है। कोई दंड नहीं होने से सरकारें देरी करती हैं। नतीजा? निकाय राज्य पर निर्भर रहते हैं, अपनी आय, जैसे संपत्ति कर बढ़ा नहीं पाते। शहरों में सडक़, पानी, सफाई जैसी सेवाएं प्रभावित होती हैं।

एक रिपोर्ट कहती है कि जहां एसएफसी कमजोर है, वहां नगरीय निकायों की 70-80 फीसदी आय राज्य से आनी चाहिए पर वास्तव में यह अनिश्चित रहती है।

छत्तीसगढ़ राज्य बने 25 साल हो गए, लेकिन स्टेट फाइनेंस कमीशन का गठन देरी से होता रहा है। चौथी बार भाजपा सरकार है, मगर सिर्फ एक बार वीरेंद्र पांडेय को पूरे पांच साल का कार्यकाल मिला। बाकी बार देर से गठित हुआ। पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने तो 2003 के चुनाव से छह महीने पहले टीएस सिंहदेव को अध्यक्ष बनाया। एक बार दोबारा आई- कांग्रेस की भूपेश बघेल सरकार ने भी देर की। इधर हाल में अनेक निगम, मंडल, सहकारी संस्थाओं में नियुक्तियां की गईं, लेकिन एसएफसी जैसी महत्वपूर्ण संस्था को छोड़ दिया गया। इसके चलते नगरीय निकायों को फंड आवंटन की शक्ति वित्त मंत्री और विभागीय मंत्री के हाथ में है। कायदे से यह आवंटन एसएफसी की सिफारिशों पर होना चाहिए, पर वह तो है ही नहीं। राजनीतिक वफादारों को पद देना जरूरी है, लेकिन वह पद जो बड़े काम का है, किसी को नहीं दिया जा रहा। इससे शहरों की आर्थिक आजादी नहीं मिल रही, माली हालत खराब है। नगरपालिकाएं कर्मचारियों के वेतन के लिए राज्य की ओर देखती हैं, विकास योजनाएं सिफारिशों पर टिकी रहती हैं- बिजली का बिल भी भुगतान नहीं कर पाते।  केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक में एसएफसी नियमित हैं, वहां निकाय मजबूत हैं। लेकिन छत्तीसगढ़ की तरह उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, राजस्थान जैसे राज्यों में देरी आम है। अरुणाचल प्रदेश में तो अब तक गठित ही नहीं।

सरकारें बचती हैं, क्योंकि एसएफसी एक संवैधानिक आयोग है। उसकी सिफारिशें बाध्यकारी हैं, जो बजट पर बोझ डालती हैं।

शहरों के गरीब होने की एक बड़ी वजह यह है क्योंकि उन्हें राज्य के राजस्व का जायज हिस्सा नहीं मिलत रहा। यह हिस्सा तब मिलने की संभावना होती है जब राज्य वित्त आयोग काम करता है। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में- जहां डबल-ट्रिपल इंजन विकास की बातें होती हैं, वहां नगरपालिकाएं और नगर निगम पैसों के लिए तरस रहे हैं।


अन्य पोस्ट