राजपथ - जनपथ
जल्द होगी सूचना आयुक्तों की नियुक्ति?
केंद्रीय सूचना आयोग में लंबे समय से रिक्त पड़े मुख्य सूचना आयुक्त और आठ सूचना आयुक्तों के पदों पर आखिरकार नियुक्तियां हो गईं। पूर्व आईएएस अधिकारी राज कुमार गोयल ने 15 दिसंबर को मुख्य सूचना आयुक्त के रूप में शपथ ली, जबकि आठ नए सूचना आयुक्तों ने कल पदभार संभाला। इधर छत्तीसगढ़ में राज्य सूचना आयोग में 2022 से मुख्य सूचना आयुक्त का पद रिक्त है। दो सूचना आयुक्तों के पद खाली पड़े हैं। सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर में सुनवाई के दौरान छत्तीसगढ़ का जिक्र किया था, जहां आयोग केवल एक आयुक्त के भरोसे चल रहा था और 35 हजार से ज्यादा अपीलें या शिकायतें लंबित थीं। मार्च 2025 में दो पदों के लिए आवेदन मंगाए गए थे, अप्रैल तक 72 उम्मीदवारों ने दावेदारी की थी और इंटरव्यू की प्रक्रिया भी पूरी हो चुकी है। हाईकोर्ट में प्रक्रिया पर आपत्ति दर्ज कराते हुए याचिका दायर की गई थी, जिसमें भी शासन के पक्ष में फैसला आ चुका है।
केंद्रीय स्तर पर सुप्रीम कोर्ट के दबाव के चलते ही सही, रिक्तियां भर दी गईं, पर छत्तीसगढ़ में इतनी देरी हो रही है। ऐसा लगता है कि राज्य सरकार को केंद्र के इशारे की जरूरत थी। अब जल्द से जल्द मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों की नियुक्ति हो सकती है।
कब बबा मरही, कब बरा खाबो
बचपन में हम सबने एक कहानी सुनी है। एक गरीब व्यक्ति भीख मांग-मांग कर थोड़ा-थोड़ा सत्तू इक_ा करता है। वह सत्तू एक घड़े में भरकर टांट से लटका देता है, नीचे खटिया डालता है और सपनों की दुनिया में खो जाता है। वह सोचता है, अकाल पड़ेगा तो सत्तू 100 रुपये में बिकेगा। उससे बकरियां लूंगा, फिर मेमने होंगे, फिर गाय आएगी, दूध बिकेगा, खूब पैसा होगा, शादी होगीज्। और, जब पत्नी मेरी बात नहीं मानेगी तो मैं उसे लात मार दूंगा। सपने में मारी गई वही लात असल में घड़े पर पड़ती है। घड़ा टूटता है, सारा सत्तू जमीन पर बिखर जाता है। विधानसभा में वित्त मंत्री का बयान सुनकर यही कहानी याद आ गई। फर्क बस इतना है कि यहां सत्तू नहीं, बल्कि जनता के सपने टांट पर लटकाए जा रहे हैं। टूटने की बस देर है। केंद्र की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कभी 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का सपना दिखाया था। अब छत्तीसगढ़ के वित्त मंत्री ओपी चौधरी सीधे 26 ट्रिलियन की गणित समझा रहे हैं। हकीकत यह है कि आज भी छत्तीसगढ़ की 57 प्रतिशत महिलाएं एनीमिया से पीडि़त हैं और 38 प्रतिशत बच्चे कुपोषित हैं। विधायक देवेंद्र यादव की, विजन 2047 पर यह प्रतिक्रिया है। छत्तीसगढ़ में इसके लिए आसान सी कहावत है- कब बूढ़े दादा की मौत होगी तो कब पोते को स्वादिष्ट बड़ा खाने का मौका मिलेगा।
खेलों के लिए बड़े सपने
सरकार के विजन डॉक्यूमेंट-2047 में ग्रोथ हब की परिकल्पना की गई है। खेल गतिविधियों को बढ़ावा देने की दिशा में भी काम चल रहा है। बीसीसीआई क्रिकेट अकादमी की स्थापना कर रही है। इसके लिए नवा रायपुर में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम के समीप जमीन भी आबंटित की जा चुकी है। इन सबके बीच सरकार कई और खेल अकादमी की स्थापना की कोशिश कर रही है।
पूर्व क्रिकेटर रवि शास्त्री से भी यहां एक और क्रिकेट अकादमी की स्थापना के लिए चर्चा चल रही है। इसके अलावा पूर्व अंतरराष्ट्रीय बैडमिंटन खिलाड़ी और कोच पी गोपीचंद को यहां अपना बैडमिंटन अकादमी स्थापित करने के लिए भी तैयार किया जा रहा है। गोपीचंद की हैदराबाद बैडमिंटन अकादमी से पीवी सिंधु सहित कई नामी खिलाड़ी निकले हैं, जो वर्तमान में देश का नाम रौशन कर रहे हैं।
वित्त मंत्री ओपी चौधरी की कोशिश है कि प्रदेश में माइकल फेल्प्स की स्विमिंग अकादमी की स्थापना की जाए। इसके लिए वो अकादमी से जुड़े लोगों से चर्चा कर रहे हैं। विख्यात तैराक माइकल फेल्प्स के नाम से मुंबई, दिल्ली, पुणे सहित कई शहरों में अकादमी है। इन सबके बीच दिल्ली से स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया के अफसरों की एक टीम बस्तर आने वाली है। ये टीम बस्तर में तीरंदाजी, और अन्य अकादमी की स्थापना की संभावना तलाश करेगी, और वहां के खेल प्रतिभाओं को प्रशिक्षण देने की योजना है, ताकि भविष्य में बस्तर से अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी निकलकर सामने आए। देखना है आगे क्या कुछ होता है।
तो पिछला हिसाब पूछ लेते

बताइए इन बेजुबान जानवरों से निपटने में भी नगर निगम-सरकार फेल हो रही हैं। इस पर सवाल उठाते हमारे एक पाठक ने अपना यह पोस्ट हमसे साझा किया है। उनका कहना है निगम करोड़ों रुपए खर्च करने के बाद भी आवारा कुत्तों की समस्या का निराकरण नहीं कर पाया। अब सरकार इन्हें निजी एजेंसियों को सौंपने जा रही है। इस पर फिर वही सवाल सामने आता है कि जिस काम को सरकारी एजेंसियां पूरा नहीं कर पाती उन्हीं कामों को फिर निजी एजेंसियां कैसे पूरा कर लेती हैं? क्या निजी एजेंसियों में देश से बाहर के लोग काम करते हैं? उनके पास ऐसी कौन सी अतिरिक्त योग्यता होती है जो सरकारी एजेंसियां के पास नहीं होती?
आखिर क्यों फेल हो जाती है सरकारी एजेंसियां और क्यों पास हो जाती है निजी एजेंसियां? चाहे सरकारी अस्पताल हो,स्कूल हो या फिर बस सेवा या टेलीकॉम सेक्टर हर क्षेत्र में निजी एजेंसी/कंपनियों का ही क्यों बोलबाला है? क्यों सरकारी संस्थाएं इसमें फेल होती नजर आती है?
फिर अगर आवारा कुत्तों को भी नहीं संभाल पर रहे है तो फिर वो करते क्या हैं? अब निजी एजेंसियों को फिर होगा करोड़ों का भुगतान,यानी किसी न किसी का सर कढ़ाई में होगा ही। तो क्या इतने वर्षों से कुत्तों की नसबंदी के नाम पर खेल ही हो रहा था। अब उन्हें पकडऩे में आपके हमारे टैक्स के पैसे का खेल होने जा रहा है। इनकी जुबान होती तो पूछ बैठते पिछले धरपकड़ और नसबंदी अभियान में कितना खर्च हुआ और हमारी संख्या बढ़ी या घटी।


