राजपथ - जनपथ

राजपथ-जनपथ : क्रिकेट की नेतागिरी या धोखागिरी?
03-Dec-2025 6:06 PM
राजपथ-जनपथ : क्रिकेट की नेतागिरी या धोखागिरी?

क्रिकेट की नेतागिरी या धोखागिरी?

नवा रायपुर के शहीद वीर नारायण सिंह अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम में बुधवार को भारत-दक्षिण अफ्रीका क्रिकेट मैच की टिकट को लेकर काफी मारामारी रही। ऐसे में क्रिकेट एसोसिएशन के पदाधिकारियों के रवैये से विशेषकर रायपुर जिले के भाजपा विधायक काफी नाराज हैं, और इसकी शिकायत अलग-अलग स्तरों पर हुई है।

अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैच को लेकर लोगों में काफी उत्साह देखने को मिला। रायपुर के भाजपा विधायकों को उम्मीद थी कि उन्हें सौ-सौ  टिकट मिल जाएंगे, इससे वो अपने कार्यकर्ताओं को संतुष्ट कर सकेंगे। मगर मंगलवार की रात एसोसिएशन की तरफ से मंत्री-विधायकों को फ्री टिकट उपलब्ध कराया गया। मंत्रियों को 20, और विधायकों को 5 टिकट दिए गए। टिकट के लिए मंत्री-विधायकों के बंगले में कार्यकर्ताओं-समर्थकों का हुजूम उमड़ पड़ा था। इतनी कम संख्या में टिकट आई, तो मंत्री-विधायकों में नाराजगी देखी गई।

बताते हैं कि रायपुर के एक विधायक को इस स्थिति का पहले से ही अंदाजा हो गया था, उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं के लिए पहले ही टिकट खरीदकर बंटवा दिए। चूंकि एसआईआर अभियान में भाजपा कार्यकर्ता काफी मेहनत कर रहे हैं। ऐसे में क्रिकेट मैच की टिकट देकर उन्हें संतुष्ट करने का मौका भी था। और पर्याप्त टिकट नहीं मिली, तो विधायकों में गुस्सा स्वाभाविक था। रायपुर के भाजपा नेता को एसोसिएशन ने पांच सौ टिकट तो उपलब्ध करा दिए लेकिन इसके एवज में उन्हें चार लाख रुपए भुगतान करने पड़े।

क्रिकेट संघ के एक पदाधिकारी कारोबारी के खिलाफ फेसबुक पर काफी कुछ लिखा जा रहा है। टिकट ब्लैक करने के आरोप भी लग रहे हैं। कारोबारी अपने अपार संपर्कों के लिए जाने जाते हैं। चर्चा है कि वो पिछले चार दिनों से विधायकों तक का फोन नहीं उठा रहे हैं। दिलचस्प बात ये है कि बीसीसीआई के सबसे पावरफुल पदाधिकारियों में से एक राजीव शुक्ला, छत्तीसगढ़ से राज्यसभा के सदस्य हैं, उनसे भी कई लोगों ने उम्मीदें लगा रखी थी। वो रायपुर में ही हैं, लेकिन सबको निराशा हाथ लगी।

हल्ला तो यह भी है कि सरकार के एक मंत्री ने तो क्रिकेट एसोसिएशन के रवैये पर नाराजगी जाहिर करते हुए टिकट वापस कर दिए। दरअसल, बीसीसीआई की पहल पर सरकार ने स्टेडियम पांच साल की लीज पर क्रिकेट संघ को दे रखा है। बावजूद इसके एसोसिएशन का रवैया निराशाजनक नजर देखने को मिला है। कुल मिलाकर मैच के बाद भी टिकट को लेकर किचकिच जारी रह सकती है।

ऑनलाइन चाकू बिक्री-चूहे बिल्ली का खेल

रायपुर उरला में एक फैक्ट्री कर्मी की हत्या ऐसे चाकू से कर दी गई, जिसे ऑनलाइन मंगाया गया था। पुलिस का दावा है कि साल भर में उसने 800 से अधिक ऑनलाइन मंगाए गए चाकू जब्त किए, मगर इस वारदात से मालूम होता है कि डिलीवरी रुकी नहीं है। हाईकोर्ट भी इस मुद्दे पर संज्ञान ले चुका है। सवाल है कि जब पुलिस दिन-रात कार्रवाई कर रही है, तब भी ई-कॉमर्स कंपनियाँ चाकू की बिक्री कैसे कर रही हैं?

अधिकतर ऑनलाइन प्लेटफॉर्म चाकू को किचन टूल, क्राफ्ट कटर या आउटडोर नाइफ जैसे नामों से बेचते हैं। चूंकि 6 इंच से छोटे फोल्डिंग चाकू केंद्र के आर्म्स एक्ट में प्रतिबंधित श्रेणी में नहीं आते, प्लेटफॉर्म उसी खामी का फायदा उठाते हैं। ई कॉमर्स कंपनियों को आईटी एक्ट की धारा 79 उन्हें मध्यस्थ का दर्जा देकर सुरक्षा भी देती है। यानी गलत बिक्री की जिम्मेदारी बेचने वाले की होती है। पुलिस ई-कामर्स कंपनियों को नोटिस देती है, कंपनियां पुलिस के बताए गए लिंक को हटा देती है, लेकिन अगले ही दिन नया विक्रेता वही प्रोडक्ट दोबारा अपलोड कर देता है। 

पुलिस की मजबूरियां और भी हैं, जो समझने लायक है। अधिकांश ई-कॉमर्स कंपनियों का कंट्रोल रूम बेंगलुरु, गुरुग्राम या विदेशों में है। रायपुर या बिलासपुर की पुलिस वहां जाकर कार्रवाई नहीं कर पाती। कार्रवाई डिलीवरी बॉय या स्थानीय पार्टनर पर भी नहीं हो सकती, क्योंकि उसे तो ग्राहक तक सामान ही पहुंचाना है। सामान गलत है तो यह बेचने और खरीदने वाला जाने। 

तो क्या समाधान है? छत्तीसगढ़ सरकार को मध्यप्रदेश और राजस्थान की तरह अधिनियम बनाना चाहिए या अध्यादेश लाना चाहिए। दोनों राज्यों में उनकी ही भाजपा की सरकार है, प्रारूप मंगाने और अध्ययन करने में कोई समय नहीं लगेगा।  मध्यप्रदेश और राजस्थान ने 6 इंच से बड़े फोल्डिंग-स्प्रिंग चाकू पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा रखा है। दावा है कि इसके बाद चाकू से संबंधित अपराधों में 20 से 40 प्रतिशत की कमी आई है। राजस्थान और मध्यप्रदेश जहां ऑनलाइन बिक्री पर पूरी तरह रोक है, वहां इसके उल्लंघन पर भारी जुर्माने का प्रावधान किया गया है। ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के लिए राज्य पुलिस से एनओसी लेना अनिवार्य है, अन्यथा ऐप या वेबसाइट ब्लॉक कर दिए जाएंगे। ऐसे चाकुओं या औजारों के लिए, जिनकी अनुमति है केवाईसी के जरिये खरीदार की पहचान अनिवार्य है, नाबालिगों से ऑर्डर लेना प्रतिबंधित है। ऑनलाइन चाकुओं से होने वाले अपराधों को रोकने की पुलिस की कोशिश अपनी जगह पर है, लेकिन कानून बदले बिना यह लड़ाई अधूरी लग रही है।

बढ़े जमीन रेट का विरोध अब बढ़ा

जमीन के गाइड लाइन दरों की बढ़ोत्तरी के विरोध में कांग्रेस ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। भाजपा के लोग भी गाईड लाईन दरों में बेतहाशा बढ़ोत्तरी के खिलाफ हैं, और सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने भी बढ़ोत्तरी वापसी के लिए सीएम विष्णुदेव साय को चि_ी लिखी है।

दुर्ग में पिछले दिनों कारोबारियों ने विरोध-प्रदर्शन किया था। इस दौरान पुलिस को लाठीचार्ज भी करनी पड़ी। इसको लेकर कुछ चर्चाएं भी सामने आई हैं। बताते हैं कि विरोध-प्रदर्शन की कमान पर्दे के पीछे दुर्ग के एक बड़े बिल्डर ने संभाल रखी थी। भीड़ जुटाने में जिले के एक विधायक ने भूमिका निभाई। चर्चा है कि विधायक का बिल्डर के प्रोजेक्ट में काफी कुछ निवेश है, और गाइड लाइन दरों में बढ़ोत्तरी से प्रोजेक्ट को नुकसान पहुंचाने का अंदेशा है। और अब लाठीचार्ज हुई तो, पुलिस और सरकार के लोगों ने इसकी जानकारी जुटाई। इसके बाद नेता-बिल्डर के गठजोड़ का पता चला है। फिलहाल तो सरकार गाइड लाइन दर बढ़ाने पर बैकफुट में है, ऐसे में तुरंत कोई कार्रवाई तो नहीं होगी, लेकिन बिल्डर जरूर निशाने पर आ गए हैं। देखना है आगे क्या होता है।

हाथों से रजाई बुनने वाले..

माइक्रोफाइबर क्विल्ट्स, होलोफिल, डाउन-फेदर कम्फ़र्टर, फाइबरफिल क्विल्ट, फ्लीस क्विल्ट, थर्मो कंट्रोल्ड, एंटी-एलर्जिक कम्फ़र्टर और थर्मल ब्लैंकेट्स। ये कुछ नाम उन रजाईयों के हैं, जो मॉल और ऑनलाइन शॉपिंग में मिलते हैं। ब्रांडेड कंपनियों ने जिन कारीगरों की रोजी-रोटी पर असर डाला है, उनमें रुई धुनकर, रजाई गद्दे बनाने वाले- धुनकिया भी शामिल हैं। कुछ लोग रह गए हैं, जो अब भी साइकिल पर अपना छोटा-सा संसार लादे गलियों में निकल पड़ते हैं। वे किसी भी गली में रुककर तुरंत काम शुरू कर देते हैं। हाथ और पैरों की गति और तजुर्बे का कमाल दिखता है। रुई की धुनाई कर उसे फुलाना होता है, कपड़े में भरना और फिर बड़े प्यार से रजाई को कसी हुई सिलाई देन होता है। पुरानी रजाई में भी नई जान डाल देते हैं। बिलासपुर के एक गली की तस्वीर साहित्यकार सतीश जायसवाल ने सोशल मीडिया पर साझा की है।


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