राजपथ - जनपथ

राजपथ-जनपथ : 10 लाख पर तलवार
02-Dec-2025 6:10 PM
राजपथ-जनपथ : 10 लाख पर तलवार

10 लाख पर तलवार

मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) का काम चल रहा है। प्रदेशभर में बीएलओ घर-घर जाकर पंजीकृत मतदाताओं के गणना पपत्रों का संग्रहण, और डिजिटलाइजेशन का काम कर रहे हैं। वर्ष-2003, और वर्ष-2023 की मतदाता सूची का मिलान भी हो रहा है। कुल मिलाकर एसआईआर को लेकर गली-मोहल्लों में बहस चल रही है। एक अंदाजा लगाया जा रहा है कि प्रदेश के करीब 10 लाख तक मतदाताओं के नाम कट सकते हैं।

पहले भी मतदाता सूची में नाम जुड़ते रहे हैं। मगर मृत लोगों के नाम अब भी मतदाता सूची में है। यही नहीं, रायपुर शहर में किरायेदार एक से दूसरी जगह शिफ्ट होते रहे, लेकिन मतदाता सूची में पहले से दर्ज नामों को हटाया नहीं गया। रायपुर सांसद बृजमोहन अग्रवाल मानते हैं कि शहर में एसआईआर के बाद एक लाख मतदाता कम हो सकते हैं। हजारों मतदाता ऐसे हैं जो मूलत: गांव से ताल्लुक रखते हैं, और शहर में रहते हैं। ऐसे लोगों का दो जगह मतदाता सूची में नाम दर्ज है। इनमें से किसी एक जगह से उन्हें अपना नाम हटवाना होगा। इन सबको देखते हुए कुल मतदाताओं की संख्या में कमी आ सकती है, और प्रदेशभर से 10 लाख तक मतदाता कम होने का अंदाजा लगाया जा रहा है। इन सबके बीच गृहमंत्री विजय शर्मा के उस बयान पर हलचल मची हुई है, जिसमें उन्होंने  कहा था कि एसआईआर में संदिग्ध नामों पर सख्त कार्रवाई होगी।

उन्होंने कहा था कि 2003 के मूल रिकॉर्ड में जिन व्यक्तियों का कोई पारिवारिक सदस्य, ब्लड रिलेशन या पारिवारिक उपस्थिति दर्ज ही नहीं थी ऐसे नाम अब अचानक कैसे आ गए, इसकी पूरी गहराई से जांच कराई जाएगी।  मूल निवास के संबंध में जांच के साथ ऐसे लोगों के खिलाफ विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के तहत नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।

हालांकि गृहमंत्री के बयान पर सवाल खड़े हो रहे हैं। 2003 के बाद राज्य में औद्योगीकरण, और नौकरी, व्यवसाय आदि के चलते दूसरे प्रदेशों से लोग यहां आए। बाद में स्थाई रूप से रहने लग गए, और स्वाभाविक रूप से मतदाता सूची में नाम दर्ज हुआ। वो चुनावों में वोट डालने लगे। ऐसी स्थिति में उन्हें कैसे गलत ठहराया जा सकता है। बहरहाल, एसआईआर का काम पूरा होने के बाद असली, और फर्जी को लेकर चल रहे विवाद का पटाक्षेप हो सकता है। 

बिजली बिल हाफ, सरकारी छूट तो मिलेगी

सरकार के सलाहकार ऐसी सलाह दे रहे हैं जो गले की हड्डी बन रहा है।  पीएम सूर्य घर योजना लागू करने में बिजली विभाग को एड़ी चोटी लगानी पड़ रही है। बिजली विभाग के अधिकारियों ने सोलर पैनल नहीं लगवाने के पीछे तर्क दिया कि छत्तीसगढ़ में हाफ बिजली बिल योजना के कारण लोग पीएम सूर्य घर योजना का लाभ नहीं लेना चाह रहे हैं। सरकार ने सलाह मानकर हाफ बिजली बिल योजना में कटौती कर दी। नतीजा यह हुआ कि सरकार को उल्टे पांव आदेश वापस लेना पड़ा। और 1 दिसंबर से पुन: लागू करना पड़ा वह भी यूनिट बढ़ाकर।

ऐसी ही एक और सलाह सरकार के पास गई कि खुद बिजली विभाग के  सेवारत, और सेवानिवृत्त कर्मचारी पीएम सूर्य घर नहीं लगवा रहे हैं। आदेश जारी कर दिया गया कि पहले बिजली कर्मचारी सोलर पैनल लगवायें। अब कर्मचारी संकट में पड़ गये हैं। कुछ किराये पर रहते हैं। कुछ सरकारी आवास में रहते हैं। अब किराएदार कैसे लगवाएंगे। मालिक 200 यूनिट हाफ से संतुष्ट हो गया है और वह लगवाने की अनुमति नहीं देगा।

सरकारी क्वार्टर निवासी किसी का घर नहीं बना है। ऐसे में बिजली कर्मचारी सौर पैनल नहीं लगवा रहे हैं। अब पता चला है कि जो सोलर पैनल नहीं लगवा रहे, उन कर्मचारियों को बिजली बिल में छूट नहीं मिलेगी। पर कर्मचारी आश्वस्त है कि उन्हें सीएसईबी से मिलने वाली छूट बंद हो जाएगी तो क्या हुआ।  अब सरकार ने 200 यूनिट बिजली फ्री कर दी है, उस योजना में तो आम उपभोक्ता की तरह लाभ तो मिल ही जाएगी।

 

छात्र जाने देने के लिए विवश क्यों?

रायगढ़ जिले के रहने वाले प्रथम वर्ष के कम्प्यूटर साइंस के छात्र राहुल यादव का शव उनके हॉस्टल के कमरे में मिला। कमरा अंदर से बंद था और साथी छात्रों के बार-बार बुलाने पर भी कोई जवाब नहीं मिला, जिसके बाद मामला सामने आया। घटना ओडिशा के भुवनेश्वर स्थित केआईआईटी यूनिवर्सिटी की है।  हैरानी है कि विश्वविद्यालय में इस सत्र की यह तीसरी छात्र आत्महत्या है। फरवरी और मई महीने में दो नेपाली छात्रों ने आत्महत्या की थी। इसके बाद यूजीसी ने स्वयं एक फैक्ट-फाइंडिंग कमेटी गठित की थी। कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि दो में से कम से कम एक छात्र की मौत तो विश्वविद्यालय की गैर-कानूनी और अवैध गतिविधियों के चलते हुई है। विश्वविद्यालय प्रशासन का आचरण आपराधिक दायित्व के दायरे में आता है। यूजीसी ने यूनिवर्सिटी से यह भी पूछा था कि उसके खिलाफ क्यों न अनुशासनात्मक या कानूनी कार्रवाई क्यों न की जाए। मगर, तीसरी आत्महत्या से साफ है कि कोई दंडित नहीं किया गया, किसी पर जुर्माना नहीं लगा, न ही हॉस्टल का माहौल बदला।

यह तो एक विश्वविद्यालय की घटना है, मगर देश भर के कई निजी शिक्षण संस्थानों की हकीकत है, जहां मार्क्स, अटेंडेंस, अनुशासन के नाम पर छात्रों पर अत्यधिक दबाव डाला जाता है। छात्र अपने अभिभावकों की जेब से निकाली गई मोटी फीस को व्यर्थ नहीं जाने देता और विश्वविद्यालय प्रबंधन भी बताना चाहते हैं कि उनके छात्र अच्छा स्कोर लाते हैं। रेसिडेंसियल निजी शिक्षण और कोचिंग संस्थानों में काउंसलिंग की व्यवस्था नाममात्र की होती है और प्रशासनिक स्तर पर जवाबदेही लगभग शून्य।  इस बार छत्तीसगढ़ के छात्र ने आत्मघाती कदम उठाया है। हमारा शिक्षा तंत्र वाकई युवाओं को सक्षम  बना रहा है या सिर्फ जिंदगियां निगल रहा है?

किताबों के बीच गलत हिंदी

गैरहिंदीभाषी राज्यों में जब हिंदी लिखते पढ़ते लोगों को गलतियां करते हुए हम पाते हैं तो यह स्वाभाविक लगता है। हिंदी राजभाषा है, भाषा समृद्ध है, रोजगार से जुड़ा है- इसलिये सीखने की कोशिश करते हैं। पर, जब हिंदीभाषी प्रदेश में गलत हिंदी पढऩे को मिले तो क्या कहें? शायद कुछ श्रेणियां ऐसे लोगों की भी हैं, जो गलत हिंदी लिखकर यह जताना चाहते हैं कि वे तो पश्चिमी शैली का जीवन जीते हैं, अंग्रेजी ही ओढ़ते-पहनते, खाते-पीते और पढ़ते लिखते हैं। भोपाल हवाईअड्डे के प्रतीक्षालय में एक कोने पर किताबें सजी हुई थीं, जिसके बगल में यह बोर्ड लिखा है। एक जागरूक यात्री ने सोशल मीडिया पर इसे शेयर किया है।


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