राजपथ - जनपथ
पत्रकार मरीज हो, तो भी एम्स में घुसना मना
बस्तर के पत्रकार कमल शुक्ला ने आज सुबह रायपुर के एम्स का यह हाल एक वीडियो के साथ फेसबुक पर पोस्ट किया है।
‘मैं और विद्यानंद इलाज हेतु एम्स पहुंचे, मगर गाड़ी में प्रेस लिखा होने के कारण यहां के सुरक्षा गार्ड्स ने हमें अंदर प्रवेश करने से ही रोक दिया। उनके अनुसार उन्हें अस्पताल के अधीक्षक से निर्देश मिला है कि किसी भी हालत में कोई पत्रकार यहां न घुस पाए। सुरक्षा गार्ड्स के सुपरवाइजर को बहुत समझाने की कोशिश की कि हम बीमार आदमी हैं, इलाज कराने आए हैं, धोखे से पत्रकार भी हैं, हम यहां पत्रकारिता करने नहीं आए हैं। मगर गार्ड ने साफ-साफ कहा कि प्रेस लिखी हुई गाड़ी और प्रेस वालों का यहां घुसना सख्त मना है, नहीं तो हमारे ऊपर कारवाई हो जाएगी । इसका मतलब एम्स के अधीक्षक / व्यवस्थापक के अनुसार पत्रकार बीमार पड़ ही नहीं सकते, और उन्हें इलाज की जरूरत ही नहीं है, या पत्रकारों को मर जाने दो ।
हालांकि बाद में हम प्रेस लिखा हुआ वाहन अस्पताल से बहुत दूर खड़ा करके, पैदल चोरी-छिपे रजिस्ट्रेशन काउंटर तक पहुंच पाए। निश्चित रूप से अस्पताल में काफी अव्यवस्थाएं हैं, जिसे छिपाने के लिए ही यह सब किया जा रहा है। इन समस्याओं की चर्चा बाद में किसी दिन जब पत्रकार बनके आऊंगा, यहां तक देखूंगा और करूंगा, आज तो सच में केवल अपना इलाज के लिए पहुंचा हूं। फिर यहां फोटो भी खींचना सख्त मना है, मगर फिर भी आंखों से एक चीज देखी है, जिसे आपके साथ शेयर कर रहा हूं। किसी अस्पताल की अव्यवस्थाओं को उजागर करना जनहित में है और उन व्यवस्थाओं को सुधारना शासन की जवाबदारी है। अत: सरकार को चाहिए कि इस तरह का नियम बनाने से किसी भी अस्पताल को रोका जाए। सबसे खतरनाक बीमारी कैंसर विभाग के बाहर शंकरजी की मूर्ति लगी है, जबकि यह केंद्र सरकार का पूरी तरह शासकीय अस्पताल है जो जनता के टैक्स के पैसे से चलता है। मेरे ख्याल से यहां मंदिर-मस्जिद नहीं बनाया जा सकता। धर्म की आस्था को चोट पहुंचाने के नीयत से मैं यह नहीं लिख रहा हूं, मेरा मानना है कि अस्पताल तो अपने-आप में एक मंदिर है, एक मस्जिद है, एक गुरुद्वारा है, जहां डॉक्टरों पर और वहां के समस्त स्टाफ पर लोग भगवान जैसा भरोसा करते हैं। मगर इस मूर्ति को देखकर आप जान सकते हैं कि यहां के अस्पताल अधीक्षक अपने डॉक्टर पर विश्वास नहीं करते हैं, बल्कि मरीजों का इलाज पूरी तरह से भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है।अभी सुबह के 10:00 बजे हैं। फिलहाल रजिस्ट्रेशन के आठ काउंटर हैं, जिसमें से केवल तीन चालू हैं, 5 में स्टाफ नहीं पहुंचा है, और हाल के भीतर रजिस्ट्रेशन के लिए 1000 से ज्यादा की संख्या में भीड़ इक_ा है। सारे के सारे परेशान हैं, इसमें कई गंभीर मरीज भी हैं। मैं हॉल की तरफ कैमरा नहीं घुमा पा रहा हूं क्योंकि कई गार्ड इस बात पर नजर रखे हैं कि कोई कैमरा तो नहीं चल रहा है, जबकि उनकी जवाबदारी भीड़ को नियंत्रित करने की है, और सहयोग करने की है। मैं सभी पत्रकार साथियों से अपील करता हूं कि पत्रकारों को एम्स में न घुसने के आदेश के खिलाफ कुछ तो एकजुट होकर करें। इस कानून विरुद्ध नियम का विरोध करना बहुत जरूरी है। फोटो केवल रजिस्ट्रेशन काउंटर का है।
राज्यमाता का दर्जा मिलने से...
बागेश्वर धाम पीठाधीश्वर पं धीरेन्द्र शास्त्री अपने बयानों को लेकर सुर्खियों में रहे हैं। उनका रायपुर के गुढिय़ारी में प्रवचन चल रहा है। उन्होंने सोमवार को अपनी कथा के बीच गाय को राज्य माता घोषित करने की मांग कर दी। पं शास्त्री की मांग पर श्रद्धालुओं ने खूब तालियां बजाईं। उनकी कथा में श्रोता के रूप में सरकार के दो मंत्री केदार कश्यप, टंकराम वर्मा, महामंत्री (संगठन ) पवन साय के भाजपा के आधा दर्जन विधायक मौजूद थे। इन सभी ने ताली बजाकर पं शास्त्री की मांग का समर्थन किया। दरअसल, पिछले डेढ़ साल में गौ शाला में भूख- बीमारी, और गाडिय़ों में कुचलकर एक हजार से अधिक गौवंश की मौत हो चुकी है। इस तरह की मौत पहले भी होती रही है। भूपेश सरकार ने तो गौवंश के संवर्धन के लिए गौठान योजना शुरू की थी। साय सरकार ने गौधाम बनाने का निर्णय लिया है ताकि गौवंश की बेहतर देखभाल हो सके। मगर पंडित धीरेन्द्र शास्त्री की मांग से नई बहस छिड़ गई है।कुछ वर्ष पहले महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे सरकार ने गाय को राज्य माता का दर्जा दिया था। इसके बाद गौशालाओं को सब्सिडी दी जाने लगी है। मध्यप्रदेश में भी गाय को राज्य माता का दर्जा देने की मांग उठ रही है। ऐसे में छत्तीसगढ़ में भी गाय को राज्य माता का दर्जा मिल जाए, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। मगर इससे गायों की स्थिति में सुधार हो पाता है या नहीं, यह देखना है।
कांग्रेस संगठन की चर्चा
कांग्रेस में जिला अध्यक्षों के चयन के लिए रायशुमारी का दौर शुरू हो गया है। दुर्ग, राजनांदगांव, बस्तर, और अन्य जिलों में पर्यवेक्षक ब्लॉकों में जाकर कार्यकर्ताओं से वन-टू-वन चर्चा कर रहे हैं, और जिलाध्यक्ष के लिए उपयुक्त नाम को लेकर सुझाव मांग रहे हैं। यह खबर छनकर आई है कि केन्द्रीय पर्यवेक्षकों के क्रियाकलापों पर भी नजर रखी जा रही है। बताते हैं कि राहुल गांधी की एक टीम जिलों में अध्यक्षों की रायशुमारी प्रक्रिया पर नजर रखे हुए हैं। एक केन्द्रीय पर्यवेक्षक के खिलाफ तो हाईकमान से शिकायत भी हो चुकी है। पर्यवेक्षकों के लिए गाइडलाइन है कि वो किसी बड़े नेता के प्रभाव में नहीं आएंगे, और स्वतंत्र रूप से काम करेंगे। स्थानीय नेताओं की मेहमान नवाजी से दूर रहने की हिदायत दी गई थी, लेकिन केन्द्रीय पर्यवेक्षक ने इसका ध्यान नहीं रखा। और वो एक बड़े नेता के घर चाय पीने चले गए। फिर क्या था, नेताजी के विरोधियों ने पर्यवेक्षक की गतिविधियों से हाईकमान को अवगत करा दिया है।रायशुमारी की प्रक्रिया के दौरान पीसीसी द्वारा नियुक्त पर्यवेक्षकों को दूर रहने के लिए कहा गया है। एक जगह तो एआईसीसी के पर्यवेक्षक ने रायशुमारी से पहले पीसीसी के पर्यवेक्षकों को बाहर जाने तक के लिए कह दिया। केन्द्रीय पर्यवेक्षक एक-एक कर पदाधिकारियों-प्रमुख कार्यकर्ताओं, और बुद्धिजीवियों तक से जिला अध्यक्ष के लिए नाम ले रहे हैं। दावेदारों को बकायदा एक फॉर्मेट उपलब्ध कराया गया है जिसमें उन्हें अपना पूरा ब्यौरा देना होगा। और यह भी बताना होगा कि उन्हें जिलाध्यक्ष क्यों बनाया जाए। कुल मिलाकर जिलाध्यक्ष चयन को लेकर चल रही कसरत की काफी चर्चा है।


