रायपुर

जेजेएम: पाइप बदलने वाले पर एक साल बाद भी कार्रवाई नहीं
07-Dec-2025 8:09 PM
जेजेएम: पाइप बदलने वाले पर एक साल बाद भी कार्रवाई नहीं

सिफारिश करने वाले डेपुटेशन पर गए, कार्रवाई करने वाले रिटायर...!

‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता

रायपुर, 7 दिसंबर। जल जीवन मिशन की मल्टी विलेज स्कीम में कथित तकनीकी अनियमितताओं को लेकर  लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग में बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। पूर्व संचालक डॉ. सर्वेश्वर नरेंद्र भूरे ने 23 अक्टूबर 2024 को पीएचई विभाग के सचिव मोहम्मद कैसर अब्दुल हक को एक विस्तृत शिकायत-पत्र भेजकर मुख्य अभियंता, परिक्षेत्र रायपुर राजेश गुप्ता के खिलाफ डीआई पाइप की जगह ओ पीवीसी पाइप उपयोग करने जैसे गंभीर आरोप लगाते हुए अनियमितता की जांच करने तथा राजेश गुप्ता के खिलाफ तत्काल निलंबन की कार्रवाई करने की बात लिखी गई थी।

पीएचई विभाग के प्रमुख अभियंता रहे टीडी शांडिल्य (अब रिटायर )ने भी विभागीय सचिव को 29 अप्रैल 2025 तथा 18 जुलाई 2025 को राजेश गुप्ता को निलंबित करने पत्र लिखा है।

 लगभग एक साल बीतने के बाद भी विभाग स्तर पर किसी प्रकार की ठोस कार्रवाई नहीं की गई, जबकि पत्र में उठाए गए बिंदु पूरी तरह तकनीकी और नीति-विरुद्ध बदलाव से जुड़े हुए हैं।

क्या है मामला?

डॉ.भूरे  द्वारा भेजे गए पत्र के अनुसार, जल जीवन मिशन की मल्टी विलेज योजनाओं के डीपीआर  में ग्रेविटी  मेन  लाइन के लिए डीआई के 7 पाइप  को अनिवार्य रूप से अपनाया गया था। उच्च स्तरीय वित्तीय/तकनीकी स्वीकृति भी इसी पाइप के आधार पर दी गई थी।

लेकिन विभागीय स्तर पर बाद में 250 एमएम  से नीचे डायमीटर  वाले ओपीवीसी पाइप को लेकर डिजाइन बनाया गया और फिर इसी आधार पर पीएसी  की तकनीकी स्वीकृति देकर निविदा प्रक्रिया संचालित की गई।

पत्र में उठाए गए प्रमुख तकनीकी बिंदु

डीपीआर में डीआई के 7 पाइप की ही स्वीकृति  बल्क वाटर सप्लाईके लिए डीआई के 7 पाइप प्रस्तावित थी, जिसकी राज्य जल एवं स्वच्छता मिशन से प्रशासकीय स्वीकृति मिल चुकी थी।

यहां डिजाइन बदलकर ओपीवीसी पाइप ले लिया गया। आरोप है कि मुख्य अभियंता राजेश गुप्ता द्वारा अपने स्तर पर डिजाइन बदला गया और ओपीवीसी पाइप को मंजूरी देते हुए पीएसी स्वीकृति प्रदान कर दी गई।

डीपीआर में प्रस्तावित सामग्री को बदलने के लिए पुनरीक्षित प्रशासकीय स्वीकृति अनिवार्य थी, लेकिन रिकॉर्ड के अनुसार यह स्वीकृति प्राप्त नहीं की गई। एस?एलएस?एससी

 से पुनरीक्षित स्वीकृति भी नहीं ली गई। पत्र में साफ उल्लेख है कि  ओपीवीसी  पाइप के उपयोग को लेकर  की संशोधित स्वीकृति एसएलएसएससी रिकॉर्ड में उपलब्ध नहीं है।

डॉ. भूरे ने तकनीकी समिति से जांच की अनुशंसा की: पत्र में कहा गया है कि मामला पूरी तरह तकनीकी है, इसलिए जल जीवन मिशन की तकनीकी समिति के माध्यम से मुख्य अभियंता से प्रतिवेदन लिया जाना उचित होगा। यह भी लिखा है कि उपलब्ध दस्तावेज यह स्पष्ट करते हैं कि विभागीय नियमों के अनुसार आवश्यक प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया।

ओपीवीसी डीआई पाइप में अंतर

डीआई (डकटेल आयरन) पाइप - अधिक मजबूत, टिकाऊ, जंग-प्रतिरोधी, लंबी अवधि की योजनाओं के लिए उपयुक्त,महंगी, लेकिन गुणवत्ता और सुरक्षा अधिक।

ओपीवीसी - सस्ती, हल्की और आसान इंस्टॉलेशन,हाई-प्रेशर और ग्रेविटी मेन जैसी लाइनों में मानकों के अनुसार कम उपयुक्त

अधिक बार मरम्मत/रिसाव की संभावना।

विशेषज्ञों के अनुसार बल्क वाटर सप्लाई में डीआई पाइप का उपयोग अंतरराष्ट्रीय मानकों में दर्ज है, जबकि ओपीवीसी को बिना तकनीकी समिति की स्वीकृति के बदलना गंभीर प्रक्रिया उल्लंघन माना जाता है।

यह पत्र 23 अक्टूबर 2024 को लिखा गया था। अब लगभग 12 महीने बाद भी न तो तकनीकी जांच कमेटी बनी, न मुख्य अभियंता से प्रतिवेदन लिया गया और न किसी प्रकार की निलंबन/जांच कार्रवाई हुई।विभाग के भीतर इस चुप्पी को लेकर कई तरह की चर्चाएँ हैं विभागीय सचिव भी संदेह के दायरे में है।

 अब देखना यह है कि इस खुलासे के बाद बाद विभाग मंत्री उप मुख्यमंत्री अरुण साव इस मामले पर कब और कैसी कार्रवाई करते है।


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