रायपुर
एनजीटी में करनी होगी शिकायत
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
रायपुर, 21 सितंबर। नौ साल में कई जनहित और अवमानना याचिकाओं के बावजूद छत्तीसगढ में डीजे के शोर के पीडि़तों को कोई राहत और मुआवजा नहीं मिला। संविधान-प्रशिक्षक बी.के. मनीष ने ध्यान दिलाया है कि पुलिस की गैर-कानूनी जुर्माना-वसूली को बढ़ावा देने के बजाए राहत और मुआवजे पर पर जोर देना ज्यादा जरूरी है।
उन्होंने कहा कि हाई कोर्ट में दाखिल शपथ पत्रों के अनुसार लगभग दो करोड़ रुपए का जुर्माना और डीजे एसोशिएसन के मुताबिक लगभग पांच करोड़ की रिश्वत वसूली हो चुकी है। छग पुलिस ने असंवैधानिक हो चुके कोलाहल नियंत्रण अधिनियम और ट्रैफिक सुरक्षा के खतरे से बाहर मोटर वाहन अधिनियम के तहत डीजे संचालकों के खिलाफ जुर्माने के प्रकरण बनाए हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण मंडल के 2021 में जारी शोर मुआवजा दर-सूची के मुताबिक डीजे संचालकों से वसूली के लिए एक भी कार्रवाई नहीं की गई है। यही वजह है कि छग में अब तक जुर्माने और अवैध वसूली की इस भारी रकम का एक रुपया भी पर्यावरण संरक्षण कोष में जमा नहीं किया गया है।
छत्तीसगढ़ के दूर-दराज इलाकों में रहने वाले डीजे के शोर के पीडि़त को राहत और मुआवजे के लिए एनजीटी, भोपाल में आवेदन की प्रक्रिया का न तो पता है न ही इसके लिए संसाधन हैं। राज्य-जिला प्रशासन भी पर्यावरण संरक्षण कोष या किसी अन्य स्त्रोत से डीजे के शोर के विक्टिम्स को राहत और मुआवजे की राशि भुगतान कर सकता है। उसके बाद इस खर्च की वसूली के लिए कार्यक्रम आयोजक और डीजे संचालक के खिलाफ एनजीटी एक्ट की धाराओं 15 और 17 के अधीन कार्रवाई की जानी चाहिए।
मनीष ने कहा कि आज की तारीख में भारत में सीधे तौर पर डीजे पर नियंत्रण के लिए कोई प्रभावी कानून मौजूद ही नहीं है। ध्वनि प्रदूषण नियम 2000 में ध्वनि पैदा करने वाले (एंप्लीफ़ायर समेत) कई स्त्रोतों का जिक्र है, डीजे का नहीं। उन्होंने कहा कि केंद्रीय विधि, पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के अंतर्गत ध्वनि प्रदूषण नियम 2000 के प्रभाव में आते ही उस 14 फरवरी से राज्य विधि, छग कोलाहल नियंत्रण अधिनियम 1985 शून्य हो चुका है। छग विधि सचिव ने लिखित राय दी है कि सिफऱ् टकराहट की सीमा तक ही राज्य का कानून शून्य होता है जबकि संविधान के अनुच्छेद 253 के मुताबिक राज्य का उस विषय पर कानून बनाने का क्षेत्राधिकार ही खत्म हो जाता है जिस पर भारत कोई अंतर्राष्ट्रीय संधि कर ले (संयुक्त राष्ट्र संघ पर्यावरण संधि स्टॉकहोम, 1972)।
मनीष ने कहा कि राज्य में आज तक ध्वनि प्रदूषण नियम 2000 अंतर्गत औद्योगिक, व्यावसायिक, रहवासी और शांत क्षेत्रों के वर्गीकरण की पर्यावरण सचिव की गजट अधिसूचना जारी नहीं हो पाई है। न ही केंद्र या फिर राज्य शासन ने प्रदूषण नियंत्रण मंडल के सिवा किसी अन्य पदाधिकारी जैसे डीएम-एसपी को प्राधिकारी नियुक्त किया है। इसीलिए ध्वनि प्रदूषण करने वालों पर उचित कार्रवाई नहीं हो पा रही है।
उन्होंने कहा कि केंद्रीय नियम के अधीन स्थानीय प्रशासन द्वारा जबरिया डीजे उपकरण जब्ती, जुर्माना वसूली नहीं की जा सकती। नियमानुसार किसी भी नियंत्रक कार्रवाई के लिए एक-एक प्रकरण में नोटिस जारी कर जिरह सुननी पड़ेगी और सजा-जुर्माने के लिए प्राधिकारी को एनजीटी, भोपाल, में आधिकारिक शिकायत करनी होगी।


