रायपुर
स्वास्थ्य के साथ पर्यावरण के लिए भी खतरा है
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
रायपुर/कोंडागांव, 7 अगस्त। थाई मांगुर मछली को 1998 में सबसे पहले केरल में प्रतिबंधित किया गया, उसके बाद वर्ष 2000 में देश भर में थाई मांगुर की बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया गया गया है, फिर भी इसका कारोबार हो रहा है, इसे चोरी छिपे देश के कई राज्यों में भी ले जाया जा रहा है, साथ ही बिक्री भी हो रही है।
थाई मांगुर का वैज्ञानिक नाम क्लेरियस गेरीपाइंस है। मछली पालक अधिक मुनाफे के चक्कर में तालाबों और नदियों में प्रतिबंधित थाई मांगुर को पाल रहे हैं, क्योंकि यह मछली 4 महीने में ढाई से तीन किलो तक तैयार हो जाती है। इस मछली में 80 फीसदी लेड एवं आयरन के तत्व पाए जाते हैं, जिससे कैंसर का खतरा रहता है। थाई मांगुर पर्यावरण के लिए भी खतरा बनती जा रही है।
दो दिन पहले जिला मत्स्य विभाग कोंडागांव के द्वारा बनियागांव से 4 टन अवैध थाई मांगूर मछलियों के साथ एक ट्रक को जब्त किया है। इसी प्रकार पिछले माह भी कोंडागांव के फरसगांव में कई टन थाई मांगूर जब्त कर नष्ट की गई थीं।
इस बारे में मिली जानकारी अनुसार आंध्र प्रदेश से रायपुर की ओर जा रही ट्रक क्रमांक एपी 39 टीएस 2347 को मत्स्य विभाग ने 4 टन अवैध थाई मांगुर के साथ जब्त किया है। ट्रक को अवैध थाई मांगूर के साथ कोतवाली थाना कोंडागांव में लाया गया है। इसके बाद जमान में दफना कर थाई मांगूर को नष्ट किया गया।
इस संबंध में ‘छत्तीसगढ़’ ने उक्त ट्रक के ड्राइवर से बात की तो टूटी-फूटी हिंदी में बताया कि मछली को आंध्रप्रदेश के कृष्णा जिले से ला रहा हूं, इसे उत्तरप्रदेश ले जा रहा था। बताया जाता है कि उक्त मछली को नष्ट कर ड्राइवर को छोड़ दिया गया। इसका उत्पादन करने वाले पकड़ में नहीं आ रहे हैं।
ज्ञात हो कि थाई मांगुर मछली को 1998 में सबसे पहले केरल में प्रतिबंधित किया गया, उसके बाद वर्ष 2000 में देश भर में इसकी बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया गया। मांगुर मछली के पालन और विक्रय पर प्रतिबंध लगाने के पीछे सबसे बड़ी वजह इसका मांसाहारी होना है, वहीं इसका उपयोग करने वालों में कई बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। थाईलैंड की प्रजाति होने के कारण इसे थाई मांगुर भी कहा जाता है।
चिकित्सकों की मानें तो मांगुर मछली खाने से कैंसर का खतरा रहता है। प्रतिबंधित होने के बावजूद भी इस मछली को बाजारों में खुले तौर पर बेचा जा रहा है। राजधानी लखनऊ की सभी मंडियों में मांगुर मछली देखी जा सकती है।
उत्तरप्रदेश में पाली जा रही है मांगुर
मांगुर मछली मूल रूप से थाईलैंड में पाई जाती रही है। इस मछली की ग्रोथ काफी तेजी से होता है। मात्र 3 से 4 महीने में ही मांगुर मछली बाजार में बेचने लायक हो जाती है। यही वजह है कि मछली पालन से जुड़े किसान इसके पालन को प्राथमिकता देते हैं, लेकिन मांगुर मछली का पालन इस पर प्रतिबंध लगने के बाद भी नहीं रुका है। उत्तर प्रदेश के शामली जनपद में बड़े पैमाने पर प्रतिबंधित थाई मांगुर मछली का पालन किया जा रहा है।
मुनाफे की लालच में मछली पालन करने वाले किसान बेखौफ होकर मांगुर मछली का पालन कर रहे हैं. जबकि प्रशासन का इस पर कोई ध्यान ध्यान नहीं है. इसके अलावा लखनऊ के आसपास के जनपदों में भी मांगुर मछली का पालन जारी है। इतना ही नहीं, लखनऊ की मछली मंडियों में भी खुले तौर पर प्रतिबंधित मांगुर मछली देखी जा सकती है।
मांगुर मछली खाने से क्या हंै नुकसान
वर्ष 2000 में पूरे भारत में थाई मांगुर मछली के पालन और बिक्री पर रोक लगा दी गई। इस मछली के सेवन से कैंसर जैसी घातक बीमारियों का खतरा रहता है।
यह मछली पूरी तरह से मांसाहारी होती है और इसके मांस में 80 फ़ीसदी तक लेड और आयरन की मात्रा होती है, इसलिए इसके आहार से शरीर में आर्सेनिक, कैडमियम, क्रोमियम, मरकरी, लेड की मात्रा बढ़ जाती है, जो स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक है. कैंसर संबंधी बीमारियों के साथ-साथ यूरोलॉजिकल, लीवर की समस्या, पेट एवं प्रजनन संबंधी बीमारियों के लिए भी यह घातक है।
पर्यावरण के लिए भी खतरा है यह मछली
थाई मांगुर स्वास्थ्य के लिए ही नहीं बल्कि पर्यावरण के लिए भी खतरा बनती जा रही है। बताया जाता है कि इस मछली के पालन करने की वजह से तालाब में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है जिसके कारण दूसरी मछलियां मर जाती हैं। इसी वजह से यह छोटी मछलियों समेत कीड़े-मकोड़ों को भी खा जाती है जिसके चलते इसकी वृद्धि तेजी से होती है।
दूसरी मछलियों, जल जीवों को पनपने नहीं देती मांगुर
संचालक मत्स्यपालन श्री नाग ने प्रतिबंध को लेकर बताया कि प्रतिबंध थाईलैंड मांगुर पर हैं देशी पर नहीं। इन मछलियों के देशभर में पालन व कारोबार पर केंद्र सरकार ने ही 2002 में रोक लगाई थी। चूंकि यह मछली मांसभक्षी होती है,यह तालाब, जलाशय में मौजूद सभी तरह की अन्य मछलियों , जल जीवों को भी खा जाती हैं। यहां तक कि नहाने गए गाय,बैल भैंस के अंग काट लेतीं हैं। कुछ घटनाएं तो छोटे बच्चों को काटने की भी हुई हैं देश में । ये मछलियां , दूसरी प्रजाति की मछलियों को बढऩे नहीं देती।
उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश और कई राज्यों में चोरी छिपे सप्लाई किया जा रहा है। यह मछली, होटलों-रेस्टारेंट में नानवेज डिश के रूप मेें परोसी जाती है । केंद्र की रोक के बाद पकड़ी गई इन मछलियों को गड्ढा खोदकर पाटने और पुलिस को सौंप दिया जाता।


