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कल सुबह शुरू हो रही गिनती, मुकाबले में दो, पर तीसरे दल का अस्तित्व भी दांव पर
राजेश अग्रवाल
बिलासपुर, 9 नवंबर (‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता)। मरवाही विधानसभा क्षेत्र के 1 लाख 49 हजार मतदाताओं ने पूर्व मुख्यमंत्री स्व. अजीत जोगी की जगह किसे अपना प्रतिनिधि चुना, यह राज कल ईवीएम खोल देंगी। मुकाबला कांग्रेस और भाजपा के बीच है पर टक्कर में तीसरे दल छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस का अस्तित्व भी है।
ठीक एक सप्ताह पहले 3 नवंबर को बिलासपुर की एकमात्र और दिलचस्प उप-चुनाव में वोट डालकर मतदाताओं ने कांग्रेस प्रत्याशी डॉ. के. के. धु्रव और भाजपा उम्मीदवार डॉ. गंभीर सिंह में से किसी एक को अपना नेता चुन लिया है। कल 10 नवंबर को शुरू हो रही वोटों की गिनती से यह मालूम हो जायेगा कि उनकी पसंद क्या है। जब दोनों ही दल दावा कर रहे हों कि वे अच्छे मतों से चुनाव जीत रहे हैं और नतीजा आने में कुछ ही घंटे बचे हैं तब लोगों के बीच यह चर्चा ज्यादा महत्वपूर्ण हो चली है कि इस जीत हार का प्रदेश की राजनीति पर क्या असर पड़ेगा?
कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष रहते हुए मुख्यमंत्री भूपेश बघेल लम्बी कोशिशों के बाद केन्द्रीय नेतृत्व को यह समझाने में सफल हो गये थे कि जब तक तत्कालीन दिग्गज नेता व प्रथम मुख्यमंत्री स्व. अजीत जोगी कांग्रेस में रहेंगे सत्ता में दुबारा लौटना मुश्किल होगा। परिस्थिति ऐसी बनी कि कई बार जोगी की वापसी की बातें हुईं पर हाईकमान ने साफ कर दिया कि अब इस पर सवाल नहीं होगा। सन् 2018 के विधानसभा चुनाव में प्रचंड मतों से कांग्रेस की हुई जीत ने उनकी इस रणनीति का लोहा माना। डॉ. रेणु जोगी तब तक कांग्रेस में रहीं जब तक यह तय नहीं हो गया कि उन्हें कांग्रेस की टिकट नहीं मिलने वाली है। हालांकि कांग्रेस के रणनीतिकार यहां इस मामले में विफल रहे कि डॉ. रेणु जोगी की जगह जिन्हें कोटा विधानसभा क्षेत्र से टिकट दी गई वे तीसरे स्थान पर रह गये। कोटा विधानसभा क्षेत्र लगातार कांग्रेस का गढ़ रहा और सन् 2018 में पहली बार उसकी पराजय हुई। खुद स्व. जोगी मरवाही से लड़े और यहां भी कांग्रेस तीसरे स्थान पर रही। दोनों हार प्रदेश में मिले विशाल समर्थन के भीतर ढंक गई।

इसके बाद दंतेवाड़ा और चित्रकोट के उप-चुनाव में कांग्रेस की जीत हुई जिनमें से बस्तर से हाथ से फिसली 12 में से एकमात्र दंतेवाड़ा सीट भी कांग्रेस ने भाजपा से हासिल कर ली। अब मरवाही चुनाव को मुख्यमंत्री के ही नेतृत्व में पूरी कांग्रेस पार्टी ने एक साथ मिलकर लड़ा है। यहां चुनौती जोगी के गुजरने के कुछ माह बाद ही बीते चुनाव में विशाल मतों को तीसरे स्थान पर रही कांग्रेस की तरफ मोडऩा रही। यह काम तब मुश्किल हो गया, जब छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस का भाजपा को खुला समर्थन मिल गया।
हालांकि भूपेश बघेल सरकार ने गौरेला-पेन्ड्रा-मरवाही को जिला तभी बना दिया था, जब जोगी स्वस्थ थे और यहां चुनाव की कोई संभावना नहीं थी। पर जोगी की मौत के बाद बदली परिस्थितियों के तुरंत बाद उनके सबसे गढ़ को वापस कांग्रेस के हिस्से में लाने की कोशिश शुरू कर दी गई।
नये जिले का प्रभारी मंत्री जयसिंह अग्रवाल को बनाना, करोड़ों के विकास कार्यों, उद्घाटन और शिलान्यास के कार्यक्रम रखना कोविड-19 की चुनौती के बीच चल निकला। बिलासपुर और कोरबा से कांग्रेस के पदाधिकारियों ने वहां डेरा डाल दिया। उनका मुख्य काम यही था कि जो कांग्रेसी स्व. जोगी की वजह से पार्टी छोड़ चुके थे उन्हें वापस लाना। साथ ही भाजपा के भी असंतुष्टों को तलाशना।
कांग्रेस नेताओं के दावे सही मानें तो 90 फीसदी जोगी के प्रमुख कार्यकर्ताओं को वे कांग्रेस में वापस लेने में सफल रहे। इसका नतीजा यह निकला कि जोगी कांग्रेस के लिये काम करने वाले लोग गिनती के रह गये। भाजपा के सैकड़ों कार्यकर्ताओं सहित दो पूर्व प्रत्याशी भी कांग्रेस के साथ आ गये। कांग्रेस को संजीवनी मिली जब उच्च स्तरीय जाति छानबीन समिति के फैसलों के आधार पर अमित जोगी और डॉ. ऋचा जोगी चुनाव लडऩे से वंचित हो गये। जोगी परिवार को यह सोची-समझी रणनीति के तहत लिया गया, कांग्रेस को फायदा पहुंचाने के लिये ऐन मौके पर लिया गया फैसला लगा। अनेक लोग उनकी इस बात से सहमत भी हैं। पर यह सही है कि परिस्थितियां ऐसी बन गईं कि जोगी कांग्रेस की ओर से किसी वैकल्पिक उम्मीदवार को भी मैदान में नहीं उतारा जा सका।
जोगी परिवार का सीधा सम्बन्ध कांग्रेस हाईकमान से रहा है और यह मेल-जोल अब भी बाकी है। इसका लाभ राजनैतिक तौर पर जोगी परिवार को तो 2018 के टिकट वितरण और उसके बाद तो नहीं दिखा। जानकार कहते हैं कि जिस तरह से उनकी पार्टी पिछले विधानसभा चुनाव में तीसरी शक्ति बनने में विफल हुई थी, और मरवाही चुनाव का परिणाम भी कांग्रेस के पक्ष में जाता है तो मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का कद दिल्ली में और बड़ा हो जायेगा।
मध्यप्रदेश उप चुनाव और बिहार विधानसभा चुनाव में भी उन्हें कई सभाओं की जिम्मेदारी दी गई। वहीं यदि कांग्रेस के पक्ष में परिणाम नहीं आये तो संगठन के कई लोगों पर, मंत्रिपरिषद् के उन सदस्यों की स्थिरता असर पडऩे वाला है जिन पर मुख्यमंत्री ने भरोसा कर रखा था। क्षेत्रवार परिणाम से यह भी साफ हो जायेगा कि मरवाही में कांग्रेस के किस पदाधिकारी की मेहनत सफल रही। उनके लिये भविष्य में होने वाली निगम, मंडलों, समितियों की नियुक्तियों में जगह बन सकती है।
यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या कांग्रेस के विरुद्ध नतीजा हो तो यह सीधे मुख्यमंत्री को प्रभावित करेगा? जानकार कह रहे हैं कि पार्टी और केबिनेट के भीतर उनकी रणनीति पर सवाल भले ही उठें लेकिन अभी उनके विरुद्ध विधायकों के बीच कोई प्रदेश व्यापी वातावरण बनने की संभावना नहीं है। इनका कहना है कि वे सिर्फ मरवाही में कांग्रेस को स्थापित करने के लिये नहीं, बल्कि पार्टी को प्रदेश में नुकसान पहुंचाने वाले छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस के लिये सभी जरूरी कदम उठा रहे थे, जो उन्हें ठीक लगा। पराजय की स्थिति में छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस जे उनके लिये चुनौती के रूप में विद्यमान जरूर रहेगी।
भाजपा इस चुनाव में बहुत उम्मीद लेकर चल रही है। स्व. अजीत जोगी के प्रति आदिवासी बाहुल्य मरवाही के मतदाताओं में जो लगाव था उसे भाजपा ने हरसंभव कुरेदने की कोशिश की। इसके लिये केन्द्रीय राज्य मंत्री रेणुका सिंह, सांसद राम विचार नेताम व प्रदेश भाजपा अध्यक्ष विष्णुदेव साय जैसे भाजपा नेता खास तौर पर सभायें लेने आये। जोगी के खिलाफ आये फैसले का स्वागत करने वाले नंदकुमार साय और ननकीराम कंवर को पार्टी ने मरवाही से दूर रखा। यहां चुनावी बागडोर जरूर पूर्व मंत्री अमर अग्रवाल के हाथ में दी गई थी पर पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह और नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक ने ही यहां अपना पूरा समय दिया।
सन् 2018 के चुनाव में डॉ. रमन सिंह के नेतृत्व में ही भाजपा को प्रदेश में अप्रत्याशित हार मिली थी। उनका मास्टर स्ट्रोक चुनाव प्रचार खत्म होने के दो दिन पहले लगा जब, पर्दे के पीछे से अब तक भाजपा को साथ दे रहा जोगी परिवार और विधायक धर्मजीत सिंह ठाकुर ने अपनी पार्टी का खुलकर समर्थन दे दिया। हालांकि इस फैसले के साथ-साथ पार्टी के दो विधायक देवव्रत सिंह और प्रमोद शर्मा का ठीक इसके विपरीत कांग्रेस को समर्थन मिल गया।
छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस प्रमुख अमित जोगी को कांग्रेस की रणनीतियों को समझने में देर हुई। प्रतीत होता है कि चुनाव की घोषणा हो जाने के बाद एहसास हुआ कि उन्हें चुनाव लडऩे से वंचित किया जा सकता है। इसके पहले उनके नाम की घोषणा विधायक धर्मजीत सिंह ठाकुर कर चुके थे। कांग्रेस की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं थी। नामांकन निरस्त होने के बाद लड़ाई पार्टी की नहीं, जोगी परिवार के मरवाही में अस्तित्व की हो गई। भाजपा यदि यह चुनाव जीत जाती है तो इस जीत में बराबरी का हक छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस का होगा। उनकी पार्टी यह बता सकेगी कि सत्ता ने सारी ताकत लगा दी, पर मरवाही के लोगों ने जोगी परिवार के साथ हुए अन्याय का बदला ले दिया। कांग्रेस की पराजय की दशा में न सिर्फ भाजपा में डॉ. रमन सिंह का कद बढ़ेगा, बल्कि छजकां नेता अमित जोगी भी एक नई टीम तैयार कर प्रदेश की राजनीति में अपनी प्रासंगिकता बनाये रख सकेंगे।
मध्यप्रदेश की सीमा को छूने वाले, अमरकंटक की सीमा पर बसे मरवाही को अब तक जोगी परिवार के प्रतिनिधित्व से एक खास दर्जा मिला हुआ है, जबकि विधानसभा मुख्यालय सिर्फ एक ग्राम पंचायत और तहसील है। मरवाही के मतदाताओं का जो भी फैसला होगा वह बड़ा होगा, प्रत्याशी ही नहीं बल्कि प्रदेश की राजनीति के लिये भी।


