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अरावली के पुनर्जीवन की वैज्ञानिक रूपरेखा पेश, 20% जल स्रोत खत्म होने की चेतावनी
13-Jan-2026 3:29 PM
अरावली के पुनर्जीवन की वैज्ञानिक रूपरेखा पेश, 20% जल स्रोत खत्म होने की चेतावनी

‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता

नई दिल्ली, 13 जनवरी। देश की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में शामिल अरावली गंभीर पारिस्थितिक संकट से गुजर रही है। जंगलों की कटाई, अवैध खनन, बेतरतीब शहरीकरण और जल स्रोतों के सूखने से इस क्षेत्र पर लगातार दबाव बढ़ रहा है। इसी पृष्ठभूमि में संकला फाउंडेशन ने अरावली लैंडस्केप के ईको-रेस्टोरेशन पर एक विस्तृत वैज्ञानिक रिपोर्ट जारी की, जिसे 14 जनवरी 2026 को इंडिया हैबिटेट सेंटर, नई दिल्ली में सार्वजनिक किया गया।

रिपोर्ट पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की अरावली ग्रीन वॉल परियोजना को मजबूत करने के लिए एक समुदाय-आधारित और स्केलेबल रोडमैप प्रस्तुत करती है।
1400 किमी लंबी हरित पट्टी का लक्ष्य
रिपोर्ट के अनुसार, अरावली ग्रीन वॉल परियोजना के तहत गुजरात के पोरबंदर से हरियाणा के पानीपत तक करीब 1400 किलोमीटर लंबी और 5 किलोमीटर चौड़ी हरित पट्टी विकसित करने की परिकल्पना है। इसका उद्देश्य थार मरुस्थल के पूर्व की ओर विस्तार को रोकना, नष्ट भूमि का पुनर्जीवन, जल गुणवत्ता सुधार, जैव विविधता संरक्षण और कार्बन अवशोषण क्षमता बढ़ाना है।
 

जल संकट और घटते तालाब
अध्ययन में पाया गया कि अरावली क्षेत्र में बीते दशकों में लगभग 20 प्रतिशत जल निकाय समाप्त हो चुके हैं। हरियाणा के चार पायलट गांवों में किए गए सर्वे के अनुसार 41 तालाबों में से 7 पूरी तरह गायब हो चुके हैं, जबकि शेष तालाब गाद भरने या मौसमी होने के कारण भूजल पुनर्भरण में सीमित भूमिका निभा पा रहे हैं।
जंगलों पर निर्भर ग्रामीण आबादी
रिपोर्ट बताती है कि अधिकांश ग्रामीण समुदाय आज भी ईंधन, चारा और आजीविका के लिए जंगलों और सामुदायिक भूमि पर निर्भर हैं। आजीविका के सीमित विकल्पों के कारण संकट के समय जंगलों पर दबाव और बढ़ जाता है। स्थानीय लोगों ने पानी की कमी, बढ़ता तापमान और घटती वृक्ष आच्छादन को अपनी प्रमुख समस्याएं बताया।
बहाली के लिए छह-सूत्रीय रणनीति
ईको-रेस्टोरेशन के लिए रिपोर्ट में छह प्रमुख घटकों पर आधारित रणनीति सुझाई गई है। इनमें वैज्ञानिक तरीकों से प्राकृतिक पुनर्जनन, आक्रामक प्रजातियों पर नियंत्रण, देशी पौधों का रोपण, मिट्टी-नमी संरक्षण, सामुदायिक भागीदारी, क्षमता निर्माण और पारंपरिक पारिस्थितिक ज्ञान का उपयोग शामिल है। निगरानी के लिए जीआईएस आधारित सिस्टम और जैव विविधता रजिस्टर जैसे उपकरण अपनाने की सिफारिश की गई है।
सात साल की चरणबद्ध योजना
रिपोर्ट में अरावली के लिए सात वर्ष की, तीन चरणों में लागू होने वाली योजना प्रस्तावित की गई है। इसके लिए सरकारी संसाधनों के साथ-साथ ग्रीन फंड, कार्बन क्रेडिट और सीएसआर जैसे वैकल्पिक वित्तीय स्रोतों के उपयोग की बात कही गई है।
ग्रीन वॉल यात्रा का प्रस्ताव
जनभागीदारी बढ़ाने के उद्देश्य से 12 सप्ताह की ‘अरावली ग्रीन वॉल यात्रा’ का भी प्रस्ताव किया गया है। यह यात्रा गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली से होकर गुजरेगी और वृक्षारोपण, जल संरक्षण, स्वच्छता और पर्यावरण-अनुकूल आजीविका को बढ़ावा देगी।
रिपोर्ट में निष्कर्ष निकाला गया है कि बिखरे और अलग-अलग प्रयास अब पर्याप्त नहीं हैं। अरावली को बचाने के लिए लैंडस्केप-स्तर पर, वैज्ञानिक और समुदाय-आधारित हस्तक्षेप की तत्काल जरूरत है। विशेषज्ञों के अनुसार, समय रहते प्रभावी कदम उठाए गए तो अरावली न केवल पर्यावरणीय संतुलन बहाल कर सकती है, बल्कि देश की जल और जलवायु सुरक्षा में भी अहम भूमिका निभा सकती है।


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