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कृषि बिल का विरोध, तुरंत वापस लेने की मांग
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
रायपुर, 25 सितंबर। भारत बंद के तहत देश के अलग-अलग राज्यों समेत प्रदेश में भी आज करीब दो दर्जन किसान संगठनों का आंदोलन जारी रहा। किसान, कृषि बिल तुरंत वापस लेने की मांग करते हुए अपने-अपने घरों, खेत-खलिहानों में बैनर-पोस्टर, तख्ती लेकर विरोध प्रदर्शन करते रहे। उनका कहना है कि किसान विरोधी कृषि बिल से देश-प्रदेश के किसान बर्बाद हो जाएंगे और आत्महत्या तक के लिए मजबूर होंगे।
केंद्र सरकार के कृषि बिल के विरोध में नदी घाटी मोर्चा के गौतम बंद्योपाध्याय, फाइट फॉर राइट मूवमेंट के अनिल बघेल, कृषि वैज्ञानिक किसान नेता डॉ संकेत ठाकुर ने एक साथ यहां विरोध प्रदर्शन किया और किसान विरोधी काला बिल वापस लेने की मांग की। इसी तरह भिलाई-आरंग में राष्ट्रीय किसान समन्वय समिति के सदस्य पारसनाथ साहू, परसदा जोशी में अखिल भारतीय क्रांतिकारी किसान महासभा के तेजराम विद्रोही व मदन साहू, परसदा में नवा रायपुर प्रभावित किसान समिति के रूपन चंद्राकर, मुजगहन में उमाप्रकाश ओझा, रंजना ओझा सहित सैकड़ों किसानों ने विरोध प्रदर्शन किया।
बताया गया कि रायपुर समेत कई जिलों में लॉकडाउन के चलते किसानों ने अपने-अपने घरों के साथ खेल-खलिहानों में तख्ती लेकर विरोध जताया। छत्तीसगढ़ किसान मजदूर महासंघ से संबद्ध विभिन्न संगठनों के नेताओं ने भी अलग अलग जगहों पर किसान विरोधी कृषि बिल का सांकेतिक विरोध किया। उनका कहना है कि केंद्र सरकार जो कृषि बिल लेकर आई है, वह मूलत: किसानों को बाजार के हवाले करने का प्रयास है। किसान, सालभर खेती करेंगे, लेकिन अपनी उपज का दाम खुद तय नहीं कर पाएंगे।
छग किसान सभा के नेता संजय पराते ने आरोप लगाया कि इन कॉर्पोरेटपरस्त और कृषि विरोधी कानूनों का असली मकसद न्यूनतम समर्थन मूल्य और सार्वजनिक वितरण प्रणाली की व्यवस्था से छुटकारा पाना है। इन कानूनों का हम इसलिए विरोध कर रहे हैं, क्योंकि इससे खेती की लागत महंगी हो जाएगी, फसल के दाम गिर जाएंगे, कालाबाजारी और मुनाफाखोरी बढ़ जाएगी और कार्पोरेटों का हमारी कृषि व्यवस्था पर कब्जा हो जाने से खाद्यान्न आत्मनिर्भरता भी खत्म हो जाएगी। यह किसानों और ग्रामीण गरीबों और आम जनता की बर्बादी का कानून है।
किसान नेता डॉ. संकेत ठाकुर का कहना है कि कार्पोरेट सेक्टर दाम तय कर कम से कम में किसानों की उपज की खरीदी करेंगे। ऐसे में वाजिब दाम न मिलने से किसान बदहाल हो जाएंगे। उपभोक्ता भी महंगाई की मार त्रस्त होंगे। राज्य सरकार धान का 25 हजार रुपये समर्थन मूल्य न दे, तो यहां भी किसानों की हालत खराब होने लग जाएगी। उन्होंने आरोप लगाते हुए कहा कि केंद्र सरकार, खेती को उद्योगपतियों के हवाले करने के प्रयास में शुरू से रही है। इससे सरकार की समर्थन मूल्य की बाध्यता खत्म हो जाएगी, लेकिन किसानों को बड़ा नुकसान होगा।


