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‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
रायपुर, 22 सितंबर। बस्तर के सुकमा जिले में बुर्कापाल नामक जगह पर 2017 में सीआरपीएफ के 25 लोग एक नक्सल हमले में मारे गए थे। यह जगह इस गांव से कुछ ही दूरी पर थी। यह बस्तर में सीआरपीएफ पर दूसरा बड़ा हमला था। अगले कुछ दिनों में राज्य पुलिस ने चिंतागुफा थाने में केस दर्ज करके आसपास के 6 गांवों के 120 आदिवासियों पर आतंक-विरोधी दफाओं के तहत मामला दर्ज कर लिया था।
हिन्दुस्तान टाईम्स के रिपोर्टर रितेश मिश्रा ने दक्षिण सुकमा के इस गांव के लोगों पर एक रिपोर्ट तैयार की है जिसके मुताबिक ये 120 आदिवासी इन कड़े कानूनों में तीन साल से जेल में हैं, और उनके मामले की सुनवाई भी शुरू नहीं हुई है, न ही किसी एक को भी जमानत मिली है।
गांव के लोगों का कहना है कि इस हमले के कुछ दिन बाद ही पुलिस ने गांव के लोगों को गिरफ्तार कर लिया जिनमें बुर्कापाल गांव के सरपंच का भाई भी था। उसका का कहना है- पुलिस ने गांव के हर पुरूष, और कुछ नाबालिग किशोरों को भी, सबको इन दफाओं में गिरफ्तार कर लिया। सरपंच खुद उस वक्त आन्ध्र में एक किराना दुकान में काम कर रहा था इसलिए उसका नाम रह गया। उसका कहना है कि इनमें से एक भी व्यक्ति का हमले से कोई लेना-देना नहीं था, लेकिन सबको नक्सली बताकर जुर्म दर्ज किया गया।
बस्तर में काम कर रही मानवाधिकार कार्यकर्ता बेला भाटिया कुछ आरोपी बनाए गए आदिवासियों की वकील भी है, उनका कहना है कि मामले की सुनवाई भी अब तक इसलिए शुरू नहीं हुई है कि पुलिस इतनी बड़ी संख्या में लोगों को अदालत में पेश करने में असमर्थ है। पुलिस का कहना है कि उसके पास इतनी संख्या में सिपाही नहीं है, और अदालत इन लोगों को छोटे समूहों में सुनना नहीं चाहती। बेला भाटिया का कहना है कि पुलिस ने इन लोगों को बिना जरूरी जांच और सुबूतों के गिरफ्तार कर लिया। उनका यह भी कहना है कि लॉकडाऊन के इस दौर में उन्हें जमानत दी जानी चाहिए, और उसके बाद नियमित रूप से अदालत में उनकी सुनवाई होनी चाहिए।
ये सारे 120 लोग जगदलपुर में रखे गए हैं। बस्तर के आईजी सुंदरराज देरी के आरोपों को गलत बताते हुए कहते हैं कि कोरोना और लॉकडाऊन की वजह से इसमें देर हो रही है वरना पुलिस इस मामले की तेजी से सुनवाई की कोशिश करेगी।


