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क्यूरासाओ की टीम
आज कुछ अलग हो जाए। वैसे तो अयोध्या में राम के पैसों में लूट और गबन करने वालों पर लिखने का सही मौका है, लेकिन धर्म के नाम पर जमा पैसों का बेजा इस्तेमाल तो अनंतकाल से होते आया है, इसलिए उस बारे में फिर कभी। अभी तो जो विश्व फुटबॉल चल रहा है, कुछ उसके बारे में हो जाए। फुटबॉल की खबरों को देखते हुए यह लगने लगा कि जिस देश के बंगाल में, केरल और गोवा में, और उत्तर-पूर्वी राज्यों में फुटबॉल खेलने का इतिहास डेढ़ सौ साल से भी पुराना है, उस देश की टीम फुटबॉल वल्र्ड कप में कहां है? भारत में इस बात की अधिक चर्चा एक राष्ट्रीय शर्मिंदगी ला सकती है, इसलिए विश्वगुरूता के दावों के बीच इस शर्मिंदगी को पीछे धकेल दिया जाता है, दरी के नीचे छुपा दिया जाता है, या मेहमानों के आने पर घर के पीछे आंगन में बिठा दिया जाता है कि फुटबॉल की फीफा रैंकिंग में भारत सौ से 130 के बीच कहीं घिसटते रहता है। हालत यह है कि हिन्दुस्तान के रायपुर जैसे शहर जितनी 38 लाख की आबादी वाला क्रोएशिया विश्वकप फाइनल खेल सकता है, उससे भी कम आबादी का उरुग्वे विश्व चैंपियन बन सकता है, और आईसलैंड जैसा सिर्फ 4 लाख आबादी वाला देश विश्वकप में जगह बना सकता है, तब 143 करोड़ आबादी वाला भारत दुनिया के सौ देशों के बाद कहीं टिकता है! और यही भारत आज क्रिकेट में दुनिया का अव्वल देश है!
मेरी खेल की जानकारी बड़ी सीमित है, बचपन से अभी तक किसी खेल का खिलाड़ी नहीं रहा, और पचपन पार कर लेने के बाद भी किसी खेल का दर्शक भी नहीं रहा। लेकिन खेल से परे की कुछ सामाजिक बातें आज सुबह से यह तुलना करने के लिए मजबूर कर रही थीं कि भारत जैसे गरीब देश में फुटबॉल जैसा गरीब खेल क्यों पनप नहीं पाया, और रईसों से जिस खेल की शुरूआत हुई थी, वह क्रिकेट कैसे आगे बढ़ते चले गया? दोनों ही खेल भारत में शायद अंग्रेजों के वक्त आए। अंग्रेज सैनिकों ने 19वीं सदी के बीच में भारत में फुटबॉल शुरू किया, और 1872 में कलकत्ता में पहला फुटबॉल क्लब बना। लेकिन इसके पहले अंग्रेज 1721 में गुजरात में क्रिकेट शुरू कर चुके थे, और 1848 में जब फुटबॉल पर भारत में पहली किक लग रही थी, तब मुम्बई में पहला क्रिकेट क्लब बना। शुरूआती फर्क को छोड़ दें, तो ये दोनों ही खेल भारत में 25-50 बरस के फासले से शुरू हुए, और एक ही किस्म की सरकार के रहते हुए पनपे। पूरी दुनिया के फुटबॉल पर एक नजर डालें, तो बड़ी दिलचस्प बात दिखती है कि क्रिकेट खेलने वाले देशों में जो फुटबॉल में भी सबसे आगे में से एक है, वह इंग्लैंड की टीम है। कुछ मजेदार बात है कि अंग्रेज भारत से जाते हुए क्रिकेट तो छोड़ गए, जिसमें आज हिन्दुस्तानी आसमान का सितारा बन गए हैं, और वे फुटबॉल ले गए, जिसमें वे खासे आगे हैं!
खैर, भारत में इन दोनों खेलों की बात करें, तो 1950 में एक बार कुछ हालात के चलते हुए भारत विश्व फुटबॉल में क्वालीफाई कर पाया था, लेकिन टीम यहां से खेलने नहीं जा पाई थी। जिस ब्राजील में मैच था, उस ब्राजील तक टीम को ले जाने की ताकत भी उस समय नहीं थी। बल्कि प्रचलित कहानी कहती है कि भारत 1950 के विश्वकप में इसलिए नहीं गया था कि उसके पास जूते नहीं थे। जूतों के अलावा भी कुछ और बातें थीं, भारतीय फुटबॉल फेडरेशन के पास टीम को वहां तक भेजने का खर्च नहीं था। फिर फेडरेशन के लोगों को यह लगा कि दो साल बाद का हेलसिंकी ओलंपिक अधिक जरूरी होगा। वे यह भी नहीं सोच पाए थे कि यह विश्वकप, जो कि 1950 में चौथी बार ही खेला गया था, वह एक दिन ओलंपिक से अधिक बड़ा टूर्नामेंट हो जाएगा। दूसरी तरफ हॉकी की टीम 1928 में एमरस्टरडम, 1932 में लॉस एंजिलिस, और 1936 में बर्लिन ओलंपिक गई, जो कि ब्राजील पहुंचने जितना ही मुश्किल था। और इसके पहले एक बार भारतीय टीम 1948 में लंदन ओलंपिक में फ्रांस के खिलाफ एक मैच खेल चुकी थी, जिसमें कई भारतीय खिलाड़ी नंगे पैर थे। इस देश से लंदन जाने वाले गांधी को वहां नंगा फकीर कहा जाता था, और उसी लंदन में खेलती भारतीय टीम नंगे पैर थी, जबकि फुटबॉल के बूट के तल्ले दूसरों के पैर कुचल सकते हैं, और फ्रांस की टीम उस वक्त के बेहतरीन जूतों में थी। क्रिकेट की टीम 1932, 36, 46 इन सभी बरसों में विदेश खेलने के लिए जाती रही।
फुटबॉल की वह गरीबी अब तक जारी है।
लेकिन जब मैं इन दोनों खेलों की अपनी सामान्य समझ को देखता हूं, तो लगता है कि क्रिकेट के लिए तो कम से कम कुछ सामान लगते हैं, चाहे वह गली में ही क्यों न खेला जा रहा हो। कम से कम आधा दर्जन खिलाड़ी तो लगते ही हैं, उनके बिना तो दूर गई गेंद वापिस भी नहीं लाई जा सकती। दूसरी तरफ फुटबॉल है जिसे संकरी गली में दो बच्चे भी खेल सकते हैं, और एक अकेले फुटबॉल के अलावा कोई सामान नहीं लगता। जब दुनिया में चार लाख आबादी का देश भी विश्व फुटबॉल में अपनी टीम भेज लेता है, तब 140 करोड़ आबादी का यह देश फुटबॉल की लिस्ट में कहीं भी नहीं है, शायद सौ से 140 के बीच उसे कहीं किक पड़ रही है।
मैंने अपने लिए पूरी तरह अनजान खेल के इस मुद्दे पर जब लिखना तय किया, तो अलग-अलग कुछ एआई के सामने अपने सवाल रखे, उनसे बहस की, और उनके तथ्यों को एक-दूसरे में डालकर दुबारा जांच भी लिया। मेरी एक बात से एआई भी थोड़ी दूर तक सहमत थे कि फुटबॉल क्रिकेट के मुकाबले अधिक गरीबों के बीच अधिक लोकप्रिय है। मैं तो पांच-पांच दिन चलने वाले क्रिकेट की ऐसी पुरानी तस्वीरें देखते आया हूं जिनमें सफेद पतलून और पूरी बांहों के सफेद शर्ट पहनकर रईस और कुलीन घरानों के दिखने वाले संपन्न लोग क्रिकेट खेलते थे, और फुटबॉल तो अपने मिजाज के मुताबिक गरीब ही अधिक खेलते आए हैं। मैं एक गैरखिलाड़ी होने के बावजूद इतना समझ रहा था कि क्रिकेट आरामतलबी से खेले जाने वाला खेल रहा, और एआई ने मुझे बताया कि फुटबॉल या हॉकी में क्रिकेट के मुकाबले दो गुना या और अधिक ऊर्जा खर्च होती है! लेकिन क्रिकेट के साथ जिस तरह कई नवाब जुड़े रहे, फिल्मी सितारों की दीवानगी क्रिकेट को लेकर रही, और उस वजह से क्रिकेट खेलने वालों को बड़ी शोहरत मिलती रही, पैसा भी मिलते रहा। शायद इसलिए भी फुटबॉल गरीबों का खेल बने रह गया, उसके टूर्नामेंट भारत मेें क्रिकेट की तरह अलग-अलग कई स्तरों पर नहीं हुए, और फिर पांच दिन के टेस्ट से तीन दिन के टेस्ट, और फिर वनडे क्रिकेट, अब आखिर में जाकर 50 ओवरों का खेल, या ट्वेंटी-ट्वेंटी क्रिकेट। फुटबॉल या किसी और खेल में ऐसा बाजारूकरण संभव नहीं है। उसके तो मैच ही घंटे-दो घंटे के रहते हैं, और उनमें और कोई छोटा मॉडल बनाना मुमकिन नहीं है।
लेकिन स्वघोषित विश्वगुरू को यह सोचना चाहिए कि दुनिया के बहुत छोटे-छोटे से देश, अफ्रीका के बहुत छोटे-छोटे से गरीब देश जब फुटबॉल के कारखानों की तरह कामयाब हैं, तब कश्मीर से कन्याकुमारी तक, और गुजरात से अरूणाचल तक फैले हुए इस देश में जो करोड़ों मैदान हैं, वे भारत को सबसे ऊपर की सौ टीमों में भी क्यों नहीं ला पाते? यह तो सबसे आसान खेल है, इसके लिए न तो क्रिकेट की तरह की पिच लगती है, न ही गेंद किसी खास किस्म की लगती है, विकेटकीपर जैसे जिरहबख्तर की जरूरत भी फुटबॉल में नहीं लगती। गरीब आबादी के बीच आसानी से खेला जा सकने वाला यह खेल, बंगाल में इतनी मजबूत जड़ों के बावजूद देश को ऊपर क्यों नहीं ले जा पाया? क्या बाजार व्यवस्था, सट्टाबाजार, बीसीसीआई जैसा अपने आपमें एक स्वतंत्र देश, क्या इन सबने और खेलों की संभावनाओं को कम कर दिया है?
मुझे खेलों की समझ एकदम सीमित है, लेकिन दुनिया के हर मुद्दे पर मेरी जिज्ञासा असीमित है, यहां पर मैंने गिने-चुने तथ्यों के साथ अपने मन के, मुझे खुद हैरान करने वाले सवाल आपके सामने रखे हैं। सोचिएगा। अभी तक मेरी बातों ने हिन्दुस्तानियों को हीनभावना में न डाला हो, तो 2026 के विश्वकप में खेलने वाली टीमों के बारे में बता दूं कि क्यूरासाओ की आबादी कुल डेढ़-दो लाख के है, और केप वर्दे की आबादी 6 लाख है, और इन दोनों की टीमें विश्वकप में खेल रही हैं। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


