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हाईकोर्ट ने कहा- ट्रायल से पहले नहीं हो सकता मिनी ट्रायल
'छत्तीसगढ़' संवाददाता
बिलासपुर, 11 जून। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बहुचर्चित मनी ग्रो इन्वेस्टमेंट स्कीम चिटफंड घोटाले के एक आरोपी के खिलाफ दर्ज एफआईआर और चार्जशीट निरस्त करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब जांच में संज्ञेय अपराध का प्रथम दृष्टया मामला सामने आता है, तब प्रारंभिक स्तर पर आपराधिक कार्यवाही में हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता।
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने सुनवाई करते हुए कहा कि अदालत भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 528 के तहत अपनी अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग करते समय साक्ष्यों का सूक्ष्म परीक्षण या तथाकथित मिनी ट्रायल नहीं कर सकती। ऐसे विवादित तथ्यों का परीक्षण केवल विचारण न्यायालय में ही किया जाएगा।
मामला बलौदाबाजार-भाटापारा जिले के लवन थाना क्षेत्र का है। वर्ष 2024 में रमेश कुमार धोबी की शिकायत पर पुलिस ने मनी ग्रो इन्वेस्टमेंट स्कीम के खिलाफ अपराध दर्ज किया था। आरोप है कि योजना के संचालकों ने लोगों को 25 महीने में रकम दोगुनी करने का लालच देकर निवेश कराया और करीब एक करोड़ 93 लाख 64 हजार रुपये की ठगी की।
पुलिस जांच पूरी होने के बाद 10 दिसंबर 2025 को न्यायालय में चार्जशीट पेश की गई थी, जिस पर 3 जनवरी 2026 को संज्ञान लिया गया। इसके बाद आरोपी मनेन्द्र जायसवाल ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता समीर सिंह ने दलील दी कि मनेन्द्र जायसवाल का योजना के संचालन, प्रबंधन या प्रशासन से कोई संबंध नहीं था। उन्होंने स्वयं इस योजना में 28 लाख रुपये का निवेश किया था, जो डूब गया। इसलिए उन्हें आरोपी नहीं बल्कि पीड़ित निवेशक माना जाना चाहिए। यह भी तर्क दिया गया कि पुलिस ने केवल सह-आरोपियों के मेमोरेंडम कथनों के आधार पर उन्हें मामले में फंसाया है।
वहीं राज्य शासन की ओर से शासकीय अधिवक्ता एस.एस. बघेल ने याचिका का विरोध करते हुए बताया कि जांच के दौरान प्राप्त चेक, अनुबंध, अन्य दस्तावेज, सह-आरोपियों के बयान और बैंक लेन-देन के रिकॉर्ड मनेन्द्र जायसवाल की भूमिका की ओर संकेत करते हैं। जांच में यह भी सामने आया कि निवेशकों से एकत्र की गई राशि का हिस्सा याचिकाकर्ता से जुड़े बैंक खातों में जमा किया गया था।
अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता वास्तव में निवेशक और पीड़ित था या फिर घोटाले में उसकी भूमिका थी, यह विवादित तथ्य है, जिसका परीक्षण ट्रायल कोर्ट में होगा। खंडपीठ ने सर्वोच्च न्यायालय के निहारिका इंफ्रास्ट्रक्चर फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि एफआईआर निरस्त करने की शक्ति का उपयोग केवल असाधारण परिस्थितियों में किया जाता है। चार्जशीट में उपलब्ध सामग्री और रिकॉर्ड के आधार पर अदालत ने आरोपी की प्रथम दृष्टया संलिप्तता के पर्याप्त संकेत पाए और याचिका खारिज कर दी।


