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फर्जी दस्तावेज और गलतफहमी के चलते दिए गए फैसले हाईकोर्ट ने बदले
11-Jun-2026 1:04 PM
फर्जी दस्तावेज और गलतफहमी के चलते दिए गए फैसले हाईकोर्ट ने बदले

'छत्तीसगढ़' संवाददाता

बिलासपुर, 11 जून। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने दो अलग-अलग मामलों में अपने पूर्व में पारित आदेशों को वापस लेते हुए पुनर्विचार का रास्ता खोला है। एक मामले में सुनवाई के दौरान प्रस्तुत किया गया सरकारी सर्कुलर बाद में फर्जी और मनगढ़ंत पाया गया, जबकि दूसरे मामले में कानूनी स्थिति को लेकर हुई वास्तविक भूल के कारण अदालत को अपना आदेश वापस लेना पड़ा।

पहला मामला जशपुर जिले में पदस्थ संविदा आयुर्वेदिक चिकित्सा अधिकारी डॉ. नवीन कुमार होता की सेवाओं के नियमितीकरण का है। डॉ. होता ने नियमितीकरण संबंधी लाभ पाने के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। सुनवाई के दौरान 28 मई 2010 का एक सरकारी सर्कुलर रिकॉर्ड पर प्रस्तुत किया गया था, जिसमें संविदा कर्मचारियों से जुड़े प्रावधानों का उल्लेख था।

इसी दस्तावेज के आधार पर जनवरी 2026 में याचिका का निपटारा किया गया था। हालांकि बाद में राज्य सरकार ने स्पष्ट किया कि उक्त सर्कुलर फर्जी और कूटरचित था। सरकार ने यह भी बताया कि इस संबंध में जून 2010 में ही स्पष्टीकरण जारी किया जा चुका था। मामले की समीक्षा याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति पार्थ प्रतिम साहू ने माना कि उपलब्ध दस्तावेज पुनर्विचार के लिए प्रथम दृष्टया पर्याप्त आधार प्रस्तुत करते हैं। अदालत ने यह भी स्वीकार किया कि याचिकाकर्ता स्वयं इस तथ्य से अनभिज्ञ थे कि रिकॉर्ड पर रखा गया सर्कुलर फर्जी है। इसके बाद हाईकोर्ट ने अपना पूर्व आदेश निरस्त कर मूल याचिका को पुनः सुनवाई के लिए बहाल कर दिया।

दूसरा मामला कबीरधाम जिले के एक चेक बाउंस प्रकरण से संबंधित है। व्यवसायी देवेंद्र कुमार केशरवानी ने परक्राम्य लिखत अधिनियम (एनआई एक्ट) की धारा 138 के तहत दर्ज मामले में आरोपी के बरी होने के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की अनुमति मांगी थी।

सुनवाई के दौरान यह तर्क दिया गया था कि संबंधित मामले में सत्र न्यायालय के समक्ष भी कानूनी उपाय उपलब्ध है। इस आधार पर जुलाई 2025 में हाईकोर्ट ने याचिका वापस लेने की अनुमति दे दी थी। बाद में याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि यह प्रस्तुति अनजाने में की गई थी, जबकि वास्तविक स्थिति यह थी कि सत्र न्यायालय पहले ही मामले में निर्णय दे चुका था और वहां नई अपील दायर करने का कोई कानूनी विकल्प शेष नहीं था।

रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद न्यायमूर्ति सचिन सिंह राजपूत ने पाया कि पूर्व आदेश में दिया गया विकल्प कानूनन टिकाऊ नहीं था। अदालत ने माना कि यह स्थिति वास्तविक और सद्भावनापूर्ण भूल के कारण उत्पन्न हुई थी। परिणामस्वरूप 14 जुलाई 2025 के आदेश को वापस लेते हुए लंबित अपील को पुनः बहाल कर दिया गया।


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