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'छत्तीसगढ़' संवाददाता
बिलासपुर, 11 जून । छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वर्ष 2010 के एक हत्या मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे तीन आरोपियों को बरी कर दिया है। अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा। मामले में प्रत्यक्षदर्शी गवाह नहीं थे और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की श्रृंखला भी पूरी तरह स्थापित नहीं हो सकी। ऐसे में आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर दिया गया।
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति बिभू दत्ता गुरु की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाया।
मामला बलरामपुर-रामानुजगंज जिले के सपरा गांव का है। 18 मई 2010 को ईंट-भट्ठा संचालक दीपक सिंह का शव उनके भट्ठे के पास ट्रैक्टर और ट्रॉली के बीच पड़ा मिला था। जांच के दौरान मृतक के ट्रैक्टर चालक का मोबाइल फोन क्षतिग्रस्त और खून से सना हुआ बरामद किया गया था।
पुलिस जांच में आरोप लगाया गया था कि घटना की रात रामलाल, रामकुमार और दीपक तिर्की मृतक के साथ शराब पी रहे थे। इसी दौरान किसी बात को लेकर विवाद हुआ और आरोपियों ने मारपीट करते हुए ईंट तथा लोहे की रॉड से हमला किया। अभियोजन के अनुसार, बाद में घटना को दुर्घटना का रूप देने और सबूत मिटाने के उद्देश्य से घायल दीपक सिंह को ट्रैक्टरों के बीच ले जाकर वाहन से कुचल दिया गया। इसके बाद आरोपी मोबाइल फोन और नकदी लेकर फरार हो गए।
जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ चालान पेश किया था। वर्ष 2015 में ट्रायल कोर्ट ने तीनों को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 और 404 के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।
इस फैसले को आरोपियों ने अधिवक्ता श्रीकांत कौशिक के माध्यम से हाईकोर्ट में चुनौती दी। अपील में कहा गया कि पूरे मामले का आधार केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्य हैं। किसी भी व्यक्ति ने घटना को होते हुए नहीं देखा। साथ ही जब्त वस्तुओं से संबंधित कोई निर्णायक फॉरेंसिक रिपोर्ट भी रिकॉर्ड पर उपलब्ध नहीं थी।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का परीक्षण किया और पाया कि मामले में कोई प्रत्यक्षदर्शी गवाह नहीं है। अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि जब्त मोबाइल फोन, कपड़े और नकदी से संबंधित कोई ठोस एफएसएल रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं की गई। कथित बरामदगी की प्रक्रिया भी संदेह से परे साबित नहीं हो सकी।
फैसले में कहा गया कि मृतक की मां सहित कई गवाहों ने स्वीकार किया था कि आरोपियों के साथ उनका कोई व्यक्तिगत विवाद या दुश्मनी नहीं थी तथा उन्होंने केवल संदेह के आधार पर उनके नाम बताए थे। ऐसे में परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की वह पूर्ण श्रृंखला स्थापित नहीं हो पाई, जो किसी व्यक्ति को हत्या का दोषी ठहराने के लिए आवश्यक होती है।
इन आधारों पर हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला निरस्त करते हुए तीनों आरोपियों को संदेह का लाभ दिया और उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया।


