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धर्मांतरण मामलों के आरोपी बरी, पुलिस को अदालत की कड़ी फटकार
01-Jun-2026 12:09 PM
धर्मांतरण मामलों के आरोपी बरी, पुलिस को अदालत की कड़ी फटकार

अभियोजन की जांच और चालान पर उठे सवाल

‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता

बिलासपुर, 1 जून। धर्मांतरण से जुड़े मामलों में कार्रवाई के तरीके को लेकर जिला एवं सत्र न्यायालय ने सख्त टिप्पणी करते हुए सरकंडा पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। ग्यारहवें अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश विजेंद्र सोनवानी की अदालत ने तीन अलग-अलग मामलों में सुनाए गए आदेशों में स्पष्ट किया कि विशेष कानून के अनिवार्य प्रावधानों का पालन किए बिना दर्ज किए गए मामलों को न्यायिक जांच की कसौटी पर टिकाया नहीं जा सकता।

अदालत ने मनोज कुमार सैमुअल और अंजू सैमुअल, यरूषा किशोर तथा पादरी राहुल पटेल एवं मकान मालिक जसपाल आहूजा (अविहार) से जुड़े मामलों में आरोपियों को राहत देते हुए अभियोजन की वैधानिक खामियों को विस्तार से रेखांकित किया।

न्यायालय ने अपने आदेशों में कहा कि पूरे प्रकरणों में ऐसा कोई व्यक्ति सामने नहीं आया जिसने यह आरोप लगाया हो कि उसे धमकी, प्रलोभन या दबाव देकर धर्म परिवर्तन कराया गया। कथित पीड़ितों की ओर से न तो कोई शिकायत दर्ज कराई गई और न ही पुलिस के समक्ष कोई बयान दिया गया। अदालत ने यह भी कहा कि केवल किसी संगठन की शिकायत के आधार पर अपराध स्वतः सिद्ध नहीं माना जा सकता।

सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि संबंधित विशेष कानून के तहत जांच केवल निरीक्षक (इंस्पेक्टर) या उससे वरिष्ठ अधिकारी द्वारा की जानी चाहिए। लेकिन तीनों मामलों में जांच उप निरीक्षक (एसआई), प्रधान आरक्षक अथवा वरिष्ठ आरक्षक स्तर के अधिकारियों ने की। न्यायालय ने इसे कानून का प्रत्यक्ष उल्लंघन माना।

अदालत ने यह भी कहा कि कानून की धारा 7 के अनुसार जिला दंडाधिकारी (डीएम) की पूर्व लिखित अनुमति के बिना न्यायालय में चालान पेश नहीं किया जा सकता। रिकॉर्ड में ऐसी कोई अनुमति उपलब्ध नहीं थी। इसलिए बिना अनुमति प्रस्तुत किए गए चालान को अवैध माना गया।

अदालत की चार महत्वपूर्ण टिप्पणियां की हैं- एक, कथित पीड़ितों में से किसी ने स्वयं शिकायत दर्ज नहीं कराई।दूसरा, किसी पीड़ित का पुलिस के समक्ष बयान रिकॉर्ड नहीं किया गया। तीसरा, जब्त की गई सामान्य सामग्री का कथित धर्मांतरण गतिविधियों से सीधा संबंध साबित नहीं हुआ। चौथा, डीएम की पूर्व अनुमति और विधिसम्मत जांच के अभाव में अभियोजन कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं माना जा सकता।
मोपका कुटीपारा निवासी मनोज कुमार सैमुअल और उनकी पत्नी अंजू सैमुअल के मामले में अदालत ने पाया कि न तो कोई प्रत्यक्ष पीड़ित सामने आया और न ही जांच निर्धारित अधिकारी द्वारा की गई। मामले में जब्त डीवीआर और धार्मिक प्रमाणपत्रों को भी आरोपों से सीधे जुड़ा हुआ नहीं माना गया। डीएम की अनुमति नहीं होने के कारण अदालत ने अभियोजन की वैधता पर सवाल उठाए।

मोपका की ही निवासी यरूषा किशोर के मामले में न्यायालय ने टिप्पणी की है कि यदि कोई पीड़ित ही नहीं है तो अपराध कहां है?

अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं मिला जिसने धर्म परिवर्तन के लिए दबाव या प्रलोभन दिए जाने की शिकायत की हो। सभी गवाह शिकायतकर्ता संगठन से जुड़े हुए थे। ऐसे में केवल संगठन की शिकायत के आधार पर अपराध सिद्ध नहीं किया जा सकता।

पादरी राहुल पटेल और मकान मालिक जसपाल के मामले में भी अदालत ने अभियोजन की कमियों को गंभीर माना। न्यायालय ने कहा कि पुलिस किसी प्रत्यक्ष पीड़ित, आपत्तिजनक दस्तावेज या ठोस साक्ष्य को प्रस्तुत नहीं कर सकी। साथ ही जांच भी कानून द्वारा निर्धारित अधिकारी से नहीं कराई गई। जिला प्रशासन की पूर्व अनुमति के अभाव को अदालत ने गंभीर कानूनी त्रुटि मानते हुए पूरे अभियोजन को अवैध करार दिया।

अदालत ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि यह ऐसा मामला है जिसमें अधिकतम दो वर्ष तक की सजा का प्रावधान है और इसे समन प्रकरण की श्रेणी में रखा जाता है। इसके बावजूद यदि विशेष कानून की अनिवार्य और कठोर प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया जाता, तो पूरा अभियोजन प्रभावित होता है।


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