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भारत में दहेज से जुड़ी हिंसा के कारण हर दिन औसतन 16 महिलाओं की जान जाती है. यानी कानूनी रोक के बावजूद दहेज जैसी कुप्रथा आज भी अलग-अलग तरीकों से जारी है.
डॉयचे वैले पर शिवांगी सक्सेना की रिपोर्ट –
भारत में दहेज के लिए होने वाली प्रताड़ना को 'घर का मामला' कहकर नजरअंदाज कर दिया जाता है. दहेज की कुप्रथा को साल 1961 में कानूनन अपराध घोषित कर दिया गया था. छह दशक बाद भी किसी ना किसी रूप में समाज में मौजूद दिखता है. अब कई लोग लड़की के परिवार से दहेज सीधे शब्दों में नहीं मांगते लेकिन ‘गिफ्ट' और 'बेटी को खुशी से जो देना हो' जैसी भाषा में अपनी मंशा जता देते हैं. इन मांगों के बोझ तले कई महिलाएं मानसिक और शारीरिक हिंसा झेलती हैं जो कई बार उन्हें मौत के मुहाने तक पहुंचा देती है.
हाल ही में 33 वर्षीय ट्विशा शर्मा की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत ने दहेज और वैवाहिक प्रताड़ना के सवाल को फिर केंद्र में ला दिया है. पूर्व मिस पुणे रह चुकी ट्विशा की शादी भोपाल के एक प्रभावशाली परिवार में हुई थी. ट्विशा के परिवार का आरोप है कि शादी के बाद से ही उसे मानसिक प्रताड़ना, घरेलू हिंसा, दबाव और दहेज से जुड़ी मांगों का सामना करना पड़ रहा था. सोशल मीडिया पर वायरल हुए कथित चैट्स और स्क्रीनशॉट्स में ट्विशा ने अपनी दोस्त से कहा था कि वह खुद को 'फंसा' महसूस करती हैं. पुलिस ने दहेज उत्पीड़न और आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में मामला दर्ज किया है. वही, ट्विशा की सास और रिटायर्ड जज गिरिबाला सिंह ने सभी आरोपों से इनकार किया है.
इस मामले के कुछ ही दिन बाद ग्रेटर नोएडा की 24 वर्षीय दीपिका नागर की मौत की खबर सामने आती है. पुलिस ने इस मामले में दीपिका के पति और ससुर को गिरफ्तार किया है. दीपिका की शादी दिसंबर 2024 में ऋतिक तंवर से हुई थी. दीपिका के परिवार का दावा है कि शादी में एक करोड़ रुपये खर्च किए गए थे. लड़के को नकद, जेवर और गाड़ी भी दी गई थी. आरोप है कि फॉर्च्यूनर गाड़ी और 50 लाख रुपये नकद की मांग को लेकर महीनों तक दीपिका को परेशान किया जा रहा था. मांग पूरी न होने पर उन्होंने दीपिका को घर की तीसरी मंजिल से धक्का दे दिया जिसके चलते दीपिका की मौत हो गई.
क्या कहते हैं दर्ज हुए अपराधों के आंकड़े?
दहेज की मांग को लेकर पति या ससुराल वालों की तरफ से दबाव और प्रताड़ना अपराध है. महिलाओं को मारपीट, जहर, जलाने या संदिग्ध हादसों का शिकार होना पड़ता है. कई बार महिलाएं दबाव में आकर आत्महत्या कर लेती हैं. भारत में दहेज मृत्यु के लिए भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 80 (पहले आईपीसी की धारा 304बी) के तहत प्रावधान है. साथ ही दहेज निषेध अधिनियम, 1961 में भी कानूनी कार्रवाई की जाती है. साल 1979 में तरविंदर कौर मामला दहेज मृत्यु के शुरुआती चर्चित मामलों में था जिसने पूरे देश को झकझोर दिया.
देश में हर दिन दहेज से जुड़ी हिंसा, शोषण या दबाव के कारण औसतन 16 महिलाओं की जान गई. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के अनुसार साल 2023 में दहेज मृत्यु के 6,156 और 2024 में 5,737 मामले दर्ज किए गए. हालांकि यह संख्या 2017 में दर्ज 7,466 मौतों से कम हैं, लेकिन आंकड़े अब भी बेहद चिंताजनक हैं. देश की राजधानी दिल्ली में दहेज के कारण मौत के 109 मामले दर्ज हुए.
घरेलू हिंसा की शिकायत दर्ज कराने वाली हर पांच में से तीन महिलाओं ने दहेज उत्पीड़न की भी शिकायत की है. दहेज निषेध अधिनियम के तहत दर्ज मामलों की संख्या देखें तो साल 2023 में 15,489 और 2024 में 12,343 हो गई. इसका मतलब है कि देश में लगभग हर आधे घंटे में दहेज से जुड़ा एक मामला दर्ज होता है. यदि बड़े शहरों की बात करें तो बेंगलुरु में 878 दहेज संबंधी मामले दर्ज किए गए. ये मामले उस सोच को भी पूरी तरह खारिज करते हैं कि दहेज केवल अशिक्षित समाज या छोटे शहरों तक सीमित समस्या है.
क्या कहता है भारत का कानून?
दहेज निषेध अधिनियम, 1961 के तहत दहेज लेना, देना या उसकी मांग करना अपराध है. इसके लिए कम से कम 5 साल की जेल हो सकती है. साथ ही साथ ही 15,000 रुपये जुर्माना या दहेज की कीमत के बराबर जुर्माना लगाया जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता स्नेहा सिंह समझाती हैं कि इस कानून में शादी के दौरान अपनी इच्छा से दिए गए उपहारों को दहेज नहीं माना जाता. जगह, जाति, धर्म या परंपरा के अनुसार दिए गए स्वेच्छिक उपहारों की अनुमति है. यह इस कानून की खामी है जिसका फायदा उठाया जाता है.
महिला अधिकारों की जानकार और एडवोकेट स्नेहा सिंह बताती हैं, "लड़के का परिवार कहता है अपनी बेटी को जो देना हो, खुशी से दीजिए. इसके बाद परिवार कार, घर, एफडी, कपड़े और जेवर जैसी महंगी चीजें 'गिफ्ट' के नाम पर देता है. सगाई, तिलक, शादी समारोह, खाने-पीने की व्यवस्था, सजावट, वेन्यू और दूसरी रस्मों पर होने वाला भारी खर्च भी दहेज लेने का तरीका बन गया है. कई मामलों में शादी के बाद इन्हीं चीजों को लेकर बहू पर और ज्यादा दबाव बनाया जाता है."
भारत: कैसे थमेंगी दहेज के नाम पर होने वाली मौतें?
सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि दहेज और घरेलू हिंसा के मामलों में पुलिस और न्याय व्यवस्था का शुरुआती रवैया महिलाओं के प्रति संदेहपूर्ण होता है. शिकायत को पहले ही 'झूठा' या 'पारिवारिक विवाद' मान लिया जाता है. मुंबई स्थित ‘मजलिस लीगल सेंटर' की निदेशक और वकील ऑड्रे डीमेलो मानती हैं कि दहेज मृत्यु असल में लंबे समय तक चली मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना के बाद होने वाली संदिग्ध मौत या हत्या होती है. ऐसे मामलों में गवाहों की कमी होना स्वाभाविक है क्योंकि अपराध घर की चारदीवारी के भीतर होता है.
ऑड्रे डीमेलो डीडब्ल्यू से बातचीत में कहती हैं, "कानून के अनुसार आरोपी पर अपनी बेगुनाही साबित करने का दायित्व रखा गया है, लेकिन व्यवहार में अक्सर महिलाओं से ही सबूत, गवाह और उत्पीड़न साबित करने की उम्मीद होती है. महिला पर ही गवाह लाने, चैट दिखाने या उत्पीड़न साबित करने का पूरा बोझ डाल दिया जाता है."
अदालत, पुलिस और प्रशासन के रवैये पर सवाल
दहेज से जुड़े अपराध को गैर-जमानती और संज्ञेय (कोजनीजेबल) अपराध माना गया है. फिर भी पीड़ित महिलाओं को शुरुआती स्तर पर ही गंभीरता से नहीं लिया जाता. स्नेहा अपना अनुभव साझा करते हुए कहती हैं कि एफआईआर दर्ज होने में देरी होती है, तो आरोपियों को सेशन कोर्ट या हाई कोर्ट जाने और गिरफ्तारी से पहले अग्रिम जमानत के लिए आवेदन करने का समय मिल जाता है.
स्नेहा सिंह का कहना है, "हर राज्य में दहेज निषेध अधिकारियों और अन्य सदस्यों के साथ सलाहकार बोर्ड बनाए गए हैं. इनका काम दहेज कानून का पालन और शिकायतों की निगरानी करना है. मगर वे गंभीरता से काम नहीं करते.”
ऑड्रे डीमेलो भी अपने विचार जोड़ती हैं. इन मामलों की सुनवाई कई वर्षों तक चलती रहती है. महिलाओं को एक साथ आपराधिक और सिविल (तलाक और गुजारा भत्ता) दोनों तरह के मुकदमे लड़ने पड़ते हैं. समझौते की स्थिति में महिलाओं पर दहेज का मामला वापस लेने का दबाव डाला जाता है, ताकि बच्चों की परवरिश के लिए उन्हें गुजारा भत्ता मिल सके.
समझौता करने, शादी बचाने की सलाह भी है जिम्मेदार
ट्विशा शर्मा मामले में सामने आए चैट्स और परिवार के बयानों से पता चलता है कि वह लगातार अपने घरवालों को ससुराल में हो रहे अत्याचार और असहज माहौल के बारे में बता रही थीं. जवाब में उन्हें समझौता करने, शादी बचाने और थोड़ा समय देने की सलाह ही मिली.
यह मामला दिखाता है कि पढ़ी-लिखी और आर्थिक रूप से स्वतंत्र महिलाएं भी सामाजिक सोच के दबाव से पूरी तरह मुक्त नहीं हैं. ऑड्रे डीमेलो कहती हैं, "भारतीय समाज में आज भी अकेली या तलाकशुदा महिला को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया जाता. कई महिलाएं हमें बताती हैं कि तलाक के बाद वे खुद को अलग-थलग और अकेला महसूस करती हैं. उन्हें इस तरह देखा जाता है जैसे गलती उन्हीं की हो."
ऑड्रे डीमेलो आगे समझाती हैं कि 'एडजस्ट' करने की यह सोच इतनी गहराई से महिलाओं के भीतर बैठा दी जाती है कि वे मानसिक और शारीरिक शोषण सहते हुए भी रिश्ते को बचाने की कोशिश करती रहती हैं. परिवार और ससुराल पक्ष भी इसी सामाजिक कंडीशनिंग का फायदा उठाते हैं. (dw.com/hi)


