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एनडीपीएस मामले में हाईकोर्ट ने 15 साल की सजा में रियायत नहीं दी
30-Apr-2026 12:14 PM
एनडीपीएस मामले में हाईकोर्ट ने 15 साल की सजा में रियायत नहीं दी

कहा-रिकवरी और कब्जे के पुख्ता प्रमाण ही दोषसिद्धि का आधार

‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता

बिलासपुर, 30 अप्रैल। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने नारकोटिक्स मामले में एक अपील पर फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि यदि मादक पदार्थ की बरामदगी, कब्जा और उसकी कस्टडी के ठोस प्रमाण मौजूद हैं, तो केवल प्रक्रियात्मक खामियों के आधार पर आरोपी को राहत नहीं दी जा सकती। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रमेश सिन्हा व जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई 15 वर्ष की सजा को बरकरार रखा।

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि एनडीपीएस एक्ट, 1985 की धाराओं 42, 50 और 52-ए के पालन में हुई त्रुटियां स्वतः ही अभियोजन के पूरे मामले को खारिज करने का आधार नहीं बनतीं, जब तक यह साबित न हो कि इन खामियों से आरोपी को गंभीर नुकसान हुआ है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ठोस और प्रत्यक्ष साक्ष्यों को केवल तकनीकी आधार पर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

प्रकरण के अनुसार, शेख रहमान कुरैशी को 4 मई 2024 को रायपुर के तेलीबांधा थाना क्षेत्र में गिरफ्तार किया गया था। पुलिस को सूचना मिली थी कि काशीराम नगर ओवरब्रिज के नीचे एक व्यक्ति मादक पदार्थ बेचने की कोशिश कर रहा है। तलाशी के दौरान उसके पास से काले बैग में रखी स्पास्मो प्रॉक्सीवॉन प्लस की 25 स्ट्रिप्स, यानी कुल 600 कैप्सूल बरामद किए गए।

फॉरेंसिक जांच में इन कैप्सूल में डाइसाइक्लोमाइन, ट्रामाडोल और एसिटामिनोफेन जैसे प्रतिबंधित तत्व पाए गए, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि यह मादक पदार्थ की श्रेणी में आता है।

आरोपी के वकील ने दलील दी कि मामले में कई प्रक्रियात्मक खामियां हैं। उनका कहना था कि जब्ती सूची में पर्याप्त विवरण नहीं है, 600 में से केवल 48 कैप्सूल का ही सैंपल लिया गया, जो प्रतिनिधि नमूना नहीं माना जा सकता। इसके अलावा मलकाना रजिस्टर में ओवरराइटिंग, सील जमा न करने और एफएसएल को नमूना भेजने में देरी जैसे मुद्दे भी उठाए गए। हाईकोर्ट ने इन तर्कों को खारिज करते हुए कहा कि जब बरामदगी और कस्टडी की पूरी श्रृंखला स्पष्ट और प्रमाणित है, तो ऐसी तकनीकी खामियां दोषसिद्धि को प्रभावित नहीं करतीं।


 


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