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‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
बिलासपुर, 22 अप्रैल। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की एकलपीठ ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि रिट कोर्ट आमतौर पर केवल आशंका या संभावित खतरे के आधार पर दायर याचिकाओं पर विचार नहीं करता। न्यायमूर्ति ए के प्रसाद की पीठ ने स्पष्ट किया कि असाधारण अधिकार क्षेत्र के प्रयोग के लिए वास्तविक या आसन्न खतरे का होना जरूरी है।
यह टिप्पणी मुरारीलाल गुप्ता द्वारा दायर याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आई। याचिकाकर्ता ने अपने अधिवक्ता अच्युत तिवारी के माध्यम से दावा किया था कि वह खसरा नंबर 1033/5 की भूमि के वैध मालिक और स्थायी कब्जाधारी हैं, जहां उन्होंने दुकानें बनाकर वर्षों से व्यवसाय किया है।
याचिका में आरोप लगाया गया कि नगर निगम और जिला प्रशासन के अधिकारी बिना नोटिस दिए मौके पर पहुंचकर निर्माण हटाने की मौखिक चेतावनी दे रहे हैं, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है। याचिकाकर्ता ने इसे मनमाना और असंवैधानिक बताते हुए हस्तक्षेप की मांग की।
राज्य सरकार की ओर से पैनल वकील आकांक्षा वर्मा तथा नगर निगम की ओर से अधिवक्ता संदीप दुबे का पक्ष रखते हुए अधिवक्ता मानस वाजपेयी ने दलील दी कि अब तक न तो कोई तोड़फोड़ हुई है और न ही कोई अंतिम निर्णय लिया गया है। याचिकाकर्ता अपने कब्जे में शांतिपूर्वक व्यवसाय कर रहा है।
मामला मंगला-भैसाझार सड़क निर्माण योजना से जुड़ा है। अब तक न भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू हुई है और न ही यह तय करने के लिए सीमांकन किया गया है कि जमीन सड़क के दायरे में आती है या नहीं। ऐसे में संभावित कार्रवाई को लेकर दायर याचिका को अदालत ने केवल अनुमान आधारित माना।
अदालत ने कहा कि जब तक कोई ठोस, प्रत्यक्ष या आसन्न खतरा सामने न हो, तब तक इस प्रकार की याचिकाओं पर विचार नहीं किया जा सकता। इस आधार पर याचिका को निराधार मानते हुए खारिज कर दिया गया।


