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भारत में खतरनाक तरीके से बढ़ रही हैं गर्म हवाओं की तीव्रता, हॉटस्पॉट और दिनों की संख्या
21-Apr-2026 12:47 PM
भारत में खतरनाक तरीके से बढ़ रही हैं गर्म हवाओं की तीव्रता, हॉटस्पॉट और दिनों की संख्या

पहले के समय में यानी 1981 से 2000 के बीच, कई इलाकों में साल में लगभग 2.5 से 5.5 दिन लू चलती थी। लेकिन 2001 से 2020 के बीच यह बढ़कर 3.5 से 8.5 दिन हो गई। फोटो साभार: आईस्टॉक


पहले जहां देश का लगभग 11.9 लाख वर्ग किमी क्षेत्र लू से प्रभावित था, अब यह बढ़कर लगभग 18.1 लाख वर्ग किमी हो गया है।

-दयानिधि

सारांश

  • भारत में पिछले चार दशकों में लू की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ी है, जिससे कई क्षेत्रों में गर्मी का प्रभाव अधिक हुआ।
  • 1981 से 2020 के बीच तापमान लगभग एक डिग्री बढ़ा, जिससे उत्तर-पश्चिम और मध्य भारत सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं।
  • लू के दिनों और उनकी अवधि में वृद्धि हुई है, जिससे लोगों को लंबे समय तक अत्यधिक गर्मी का सामना करना पड़ता है।
  • लू से प्रभावित क्षेत्रों का विस्तार 11.9 लाख से 18.1 लाख वर्ग किलोमीटर तक बढ़ गया, जिससे अधिक आबादी खतरे में आ गई है।
  • बढ़ती गर्मी के कारण भविष्य में मृत्यु दर बढ़ने की आशंका है, खासकर गरीब और कम संसाधनों वाले क्षेत्रों में ज्यादा खतरा है।

भारत में पिछले कुछ सालों में गर्मी बहुत ज्यादा बढ़ गई है। अब गर्मी पहले जैसी नहीं रही। जर्नल 'साइंटिफिक रिपोर्ट्स' में प्रकाशित एक नई रिसर्च के अनुसार, हीटवेव यानी लू की घटनाएं पहले से ज्यादा हो गई हैं और उनका असर भी ज्यादा खतरनाक हो गया है। यह बदलाव मुख्य रूप से जलवायु परिवर्तन यानी ग्लोबल वार्मिंग के कारण हो रहा है।

हीटवेव क्या होती है?

भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के मुताबिक, हीटवेव तब होती है जब किसी क्षेत्र का तापमान सामान्य से बहुत अधिक बढ़ जाता है। भारत में अगर तापमान 45 डिग्री सेल्सियस से ऊपर चला जाए, या सामान्य से 4.5 से 6.4 डिग्री ज्यादा हो जाए, तो उसे हीटवेव या लू कहा जाता है। अगर तापमान 47 डिग्री से ऊपर पहुंच जाए या सामान्य से 6.4 डिग्री ज्यादा हो जाए, तो उसे भयंकर लू मानी जाती है।

पहले के समय में यानी 1981 से 2000 के बीच, कई इलाकों में साल में लगभग 2.5 से 5.5 दिन लू चलती थी। लेकिन 2001 से 2020 के बीच यह बढ़कर 3.5 से 8.5 दिन हो गई।

पारा लगातार छलांग मार रहा है

वैज्ञानिकों ने 1981 से 2020 तक के आंकड़ों का अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि तापमान धीरे-धीरे बढ़ रहा है। साल 2000 तक तापमान लगभग 0.5 डिग्री बढ़ा और 2020 तक यह बढ़कर लगभग एक डिग्री हो गया। यह बढ़ोतरी छोटी लग सकती है, लेकिन इसका असर बहुत बड़ा है। उत्तर-पश्चिम और मध्य भारत में तापमान सबसे ज्यादा बढ़ा है। इसके अलावा दक्षिण भारत में भी लगातार गर्मी बढ़ रही है। देश के कई तटीय हिस्सों में न केवल गर्मी बल्कि उमस भी परेशान करने लगी है।

साल 2000 तक तापमान लगभग 0.5 डिग्री बढ़ा और 2020 तक यह बढ़कर लगभग एक डिग्री हो गया। स्रोत : जर्नल 'साइंटिफिक रिपोर्ट्स'

लू या हीटवेव की संख्या और अवधि में वृद्धि

पहले के समय में यानी 1981 से 2000 के बीच, कई इलाकों में साल में लगभग 2.5 से 5.5 दिन लू चलती थी। लेकिन 2001 से 2020 के बीच यह बढ़कर 3.5 से 8.5 दिन हो गई।

पहले के समय में यानी 1981 से 2000 के बीच, कई इलाकों में साल में लगभग 2.5 से 5.5 दिन लू चलती थी। लेकिन 2001 से 2020 के बीच यह बढ़कर 3.5 से 8.5 दिन हो गई।

सिर्फ संख्या ही नहीं, बल्कि लू की अवधि भी बढ़ गई है। पहले यह लगभग 2.5 से चार दिन तक रहती थी, लेकिन अब यह तीन से पांच दिन या उससे ज्यादा तक चल सकती है। इसका मतलब है कि लोग ज्यादा दिनों तक तेज गर्मी सहने के लिए मजबूर हैं।

लू वाले इलाकों बढ़ रहे हैं

पहले लू कुछ ही क्षेत्रों तक सीमित थी, जैसे गंगा के मैदानी इलाकों, मध्य भारत और आंध्र प्रदेश का तटीय इलाका। लेकिन अब इसका फैलाव बहुत ज्यादा हो गया है।

पहले के समय में यानी 1981 से 2000 के बीच, कई इलाकों में साल में लगभग 2.5 से 5.5 दिन लू चलती थी। लेकिन 2001 से 2020 के बीच यह बढ़कर 3.5 से 8.5 दिन हो गई।

अब उत्तर-पश्चिम भारत, पूर्वी भारत और दक्षिण भारत के बड़े हिस्से भी इसकी चपेट में आ गए हैं। पहले जहां लगभग 11.9 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र प्रभावित था, अब यह बढ़कर लगभग 18.1 लाख वर्ग किलोमीटर हो गया है।

क्या हैं इसके पीछे के कारण?

हीटवेव बढ़ने का सबसे बड़ा कारण ग्लोबल वार्मिंग है। जब हम कोयला, पेट्रोल और डीजल जैसे ईंधन जलाते हैं, तो कार्बन डाइऑक्साइड (सीओ2) जैसी गैसें वातावरण में जाती हैं। ये गैसें गर्मी को बाहर जाने से रोकती हैं, जिससे धरती का तापमान बढ़ता है।

पहले लू कुछ ही क्षेत्रों तक सीमित थी, जैसे गंगा के मैदानी इलाकों, मध्य भारत और आंध्र प्रदेश का तटीय इलाका। लेकिन अब इसका फैलाव बहुत ज्यादा हो गया है।स्रोत : जर्नल 'साइंटिफिक रिपोर्ट्स'

पहले के समय में यानी 1981 से 2000 के बीच, कई इलाकों में साल में लगभग 2.5 से 5.5 दिन लू चलती थी। लेकिन 2001 से 2020 के बीच यह बढ़कर 3.5 से 8.5 दिन हो गई।

इसके अलावा एक प्राकृतिक प्रक्रिया भी जिम्मेदार है, जिसे एल नीनो कहा जाता है। इसके कारण कुछ सालों में तापमान और ज्यादा बढ़ जाता है, जिससे लू और भी तेज हो जाती है।

स्वास्थ्य पर खतरा

तेज गर्मी का सीधा असर लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ता है। इससे डिहाइड्रेशन, हीट स्ट्रोक और यहां तक कि मौत भी हो सकती है। एक रिपोर्ट के अनुसार, आने वाले समय में भारत के कुछ हिस्सों में हर एक लाख लोगों में 23 से 25 लोगों की मौत गर्मी के कारण हो सकती है। राजस्थान के कुछ इलाकों में यह संख्या और भी ज्यादा हो सकती है।

पहले के समय में यानी 1981 से 2000 के बीच, कई इलाकों में साल में लगभग 2.5 से 5.5 दिन लू चलती थी। लेकिन 2001 से 2020 के बीच यह बढ़कर 3.5 से 8.5 दिन हो गई।

गरीब देशों पर ज्यादा असर

लू का असर पूरी दुनिया में होगा, लेकिन गरीब और विकासशील देशों पर इसका प्रभाव ज्यादा होगा। इन देशों में लोग गर्मी से बचने के लिए जरूरी सुविधाएं जैसे एयर कंडीशनर, अच्छी स्वास्थ्य सेवाएं और ठंडी जगहें आसानी से नहीं पा पाते। इसी कारण दुनिया में होने वाली गर्मी से जुड़ी मौतों में से 90 प्रतिशत से ज्यादा मौतें ऐसे देशों में होंगी।

भारत में बढ़ती लू एक गंभीर चेतावनी है। यह केवल मौसम का बदलाव नहीं है, बल्कि यह एक बड़ी पर्यावरणीय और स्वास्थ्य समस्या बनती जा रही है। अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले सालों में स्थिति बद से बदतर हो सकती है।

हमें पर्यावरण को बचाने, प्रदूषण कम करने और लोगों को जागरूक करने की जरूरत है। तभी हम इस बढ़ती गर्मी के खतरे को कम कर सकते हैं।


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