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‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
नई दिल्ली/रायपुर, 20 अप्रैल। रामअवतार जग्गी हत्याकांड में उम्रकैद पाए हुए अमित जोगी को आज दोपहर 12 बजे दो जजों की बेंच के सामने की गई अपील पर कोई राहत नहीं मिली, इस मामले पर 23 अप्रैल को यह अदालत सुनवाई करेगी।
अमित जोगी की तरफ से आज सुप्रीम कोर्ट में दो अलग-अलग याचिकाएं लगाई गईं। एक याचिका, एक जज के चैंबर में लगाई गई जो कि हाईकोर्ट के आदेश के मुताबिक सरेंडर करने पर स्थगन के लिए थी। दूसरी याचिका सुप्रीम कोर्ट के दो नंबर कोर्ट में लगाई गई थी जिस पर दो जजों ने आज सुनवाई की और यह तय किया गया कि 23 अप्रैल, गुरुवार को इस मामले को आगे सुना जाएगा।
अदालत में मृतक रामअवतार जग्गी के बेटे सतीश जग्गी के वकील भी खड़े हुए थे।
इस बेंच ने सरेंडर करने से किसी रियायत देने से मना कर दिया और कहा कि जिस जज के चेंबर में यह आवेदन लगाया गया है वही इसका फैसला करेंगे।
बिलासपुर हाईकोर्ट ने वर्ष 2003 के बहुचर्चित राम अवतार जग्गी हत्याकांड में बड़ा फैसला सुनाते हुए अमित जोगी को दोषी ठहराया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की बैंच ने सीबीआई की अपील स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट के 31 मई 2007 के फैसले को पलट दिया। अदालत ने अमित जोगी को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 और 120-बी के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास और एक हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई है।
तीन सप्ताह में सरेंडर का निर्देश
अदालत ने अमित जोगी को तीन सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट में सरेंडर करने का निर्देश दिया है। निर्धारित समय में सरेंडर नहीं करने पर गिरफ्तारी की कार्रवाई की जाएगी।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि एक ही साक्ष्य के आधार पर कुछ आरोपियों को दोषी ठहराना और मुख्य साजिशकर्ता को बरी करना न्यायसंगत नहीं है। कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के निर्णय को साक्ष्यों के विपरीत और त्रुटिपूर्ण बताया।
मामले के अनुसार 4 जून 2003 की रात रायपुर में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के नेता राम अवतार जग्गी की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। वे 10 जून को प्रस्तावित एक बड़ी राजनीतिक रैली की तैयारी कर रहे थे। जांच के दौरान केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो ने इसे राजनीतिक साजिश बताते हुए अमित जोगी को मुख्य आरोपी बनाया।
सीबीआई जांच में सामने आए अहम तथ्य
सीबीआई की जांच में खुलासा हुआ कि हत्या की योजना पूर्व निर्धारित थी और इसमें कई लोगों की भूमिका थी। गवाहों के बयान, मोबाइल कॉल डिटेल, होटल रिकॉर्ड और अन्य दस्तावेजी साक्ष्यों के आधार पर अदालत ने माना कि अमित जोगी साजिश के प्रमुख सूत्रधार थे। अदालत ने यह भी माना कि शुरुआती जांच में केस को भटकाने की कोशिश की गई।
ट्रायल कोर्ट के फैसले पर सवाल
ट्रायल कोर्ट ने 2007 में अमित जोगी को बरी कर दिया था, जबकि अन्य आरोपियों को सजा सुनाई गई थी। हाईकोर्ट ने इसे कृत्रिम भेद बताते हुए कहा कि समान साक्ष्य होने के बावजूद मुख्य आरोपी को राहत देना कानून के अनुरूप नहीं था।


