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लंदन के एक स्कूल की खबर अभी टीवी पर आ रही है कि किस तरह वहां के एक किशोर ने दो छात्रों को चाकू मार दिया है। इसके साथ-साथ कनाडा की एक दूसरी खबर है कि वहां एक स्कूल, और एक घर में हुई गोलीबारी की घटनाओं में 9 मौतें हो चुकी हैं, और 25 जख्मी हैं। प्रधानमंत्री ने जर्मनी जाना रद्द कर दिया है। कनाडा की इस हमलावर को भूरे बालों वाली एक महिला बताया गया है, और उसकी भी लाश मिली है। अमरीकी मीडिया कवरेज और जांच अधिकारियों द्वारा तुरंत जानकारी देने के तौर-तरीकों से परे कनाडा कुछ धीमे चलते दिख रहा है, इसलिए इतनी हत्याओं के पीछे की नीयत या दूसरी जानकारी तुरंत सामने नहीं आई है। इस घटना को अमरीका में तकरीबन हर पखवाड़े कहीं न कहीं होने वाली गोलीबारी से जोडक़र अगर देखें, तो पश्चिम के देशों में एक चिंताजनक माहौल दिखता है क्योंकि वहां नागरिकों का हथियार रखने का हक एक महत्वपूर्ण बुनियादी अधिकार मान लिया जाता है, और कई देशों में तो लोग एक से अधिक हथियार भी रखते हैं। भारत मोटे तौर पर ऐसी फिक्र से आजाद देश है, लेकिन यहां भी तरह-तरह से हिंसा तो होती ही है, इसलिए हिंसा के पीछे की मानसिकता को समझने की जरूरत तो हिन्दुस्तानी लोगों को भी है।
पिछले ढाई दशकों में अमरीका की बड़ी-बड़ी गोलीबारी का असर अब दूसरे ऐसे देशों में भी दिखने लगा है जहां पर उतनी सामूहिक हिंसा की संस्कृति नहीं थी। अब कनाडा, न्यूजीलैंड, जर्मनी, नार्वे, सर्बिया जैसे देशों में भी स्कूल या दूसरी सार्वजनिक जगहों पर गोलीबारी की बड़ी घटनाएं हुई हैं। अमरीका में तो हर बरस कई स्कूल-कॉलेज में ऐसी बड़ी हिंसा होती है जिसमें कोई एक अकेले बंदूकबाज की चलाई गोलियों से दर्जन-दर्जन भर, या और अधिक लोग भी मारे जाते हैं। कई मामलों में हमलावर वहीं के भूतपूर्व छात्र रहते हैं, जो अपनी पढ़ाई के वक्त से चली आ रही किसी कुंठा के चलते ऐसे हमले करते हैं। लेकिन हर मामले में यह पता लगता है कि हमलावर के घर-परिवार में काफी संख्या में हथियार थे, और उसे बड़ी संख्या में गोलियां हासिल थीं जिनसे वह अपनी भड़ास निकाल सका। हमें अमरीका के अधिकतर हमलों के पीछे पुरूष हमलावर याद पड़ते हैं, लेकिन कनाडा की आज की इस घटना के पीछे एक महिला हमलावर है जिसकी लाश भी बरामद हो चुकी है।
अमरीका तो बंदूक-संस्कृति के लिए बहुत बदनाम देश है, जिसके बारे में लोग यह जानते-मानते हैं, और अमरीकी राजनीति और संसद में जिस पर बड़ी चर्चा भी होती रहती है कि वहां की गन-लॉबी, गन-कंट्रोल के कानून ही नहीं बनने देती। बल्कि यह सार्वजनिक तथ्य है कि वहां की दो पार्टियों में से एक, और फिलहाल सत्तारूढ़, रिपब्लिकन पार्टी तो बंदूकों की आजादी की इतनी बड़ी हिमायती है कि जिस प्रदेश में उसके सम्मेलन होते हैं, वहीं आसपास बंदूकें बनाने वाली कंपनियों अपनी प्रदर्शनी और बिक्री लगाती हैं, क्योंकि इस पार्टी के लोग बंदूकों के बड़े ग्राहक हैं। दूसरी बात यह कि राजनीति और सरकार से परे अमरीकी फिल्में, और वहां के शायद टीवी सीरियल भी बंदूकों की संस्कृति को बढ़ावा देती हैं, और गन-कल्चर का ग्लैमर दुनिया भर में बढ़ाने में अमरीकी फिल्मों का बड़ा हाथ माना जाता है। ऐसे देश में जब कभी बेकसूर लोगों की थोक में हत्या होती है, हर बार बंदूकों की संख्या कम करने की बात होती है, लेकिन रिकॉर्ड की बात यह है कि अमरीका में आबादी के 120 फीसदी बंदूकें हैं। इन बंदूकों से सामूहिक जनसंहार के बीच बस एक नफरत या भड़ास की जरूरत रहती है।
दुनिया के मजबूत लोकतांत्रिक देशों में कानूनी बंदूकें घर-घर रहती हैं, और गृहयुद्ध से गुजरते हुए बहुत से अविकसित देशों में गैरकानूनी बंदूकों का बोलबाला रहता है। इन दोनों ही किस्म के देशों में फौज, पुलिस, और दूसरे सुरक्षाबलों की वर्दियां और उनकी बंदूकें बहुत से नौजवानों के लिए एक बड़ा आकर्षण रहती हैं, और इंसान की ताकत हासिल करने की एक आदिम हसरत भी बंदूकों से पूरी होती है। भारत जैसे देश में भी लाखों लोग गैरकानूनी हथियार लेकर चलते हैं, गली-गली में लडक़ों की जेब में चाकू मिलते हैं, और तरह-तरह के समूहों में जगह-जगह भीड़ खाली हाथों से, लाठियों या पत्थरों से भी नापसंद लोगों को कुचलकर मार डालती है। कुल मिलाकर मतलब यह है कि अगर कानूनी हथियार के मामले में भारत एक अधिक समझदार और जिम्मेदार देश है, तो गैरकानूनी हथियारों पर काबू के मामले में वह उतना ही असफल है। जो जितने बड़े गुंडे हैं, उनके पास उतने ही बड़े-बड़े और अधिक गैरकानूनी हथियार हैं। अभी उत्तर भारत के किसी एक बड़े नेता-मवाली के फोटो-वीडियो सामने आए थे जिसमें वह टेबिलों पर सजे हुए अपने सैकड़ों हथियारों की विजयादशमी पर पूजा कर रहा था। मुंबई की कई हिंसक-गैंगस्टर फिल्मों की तरह असल जिंदगी में भी भारत के कई प्रदेशों में ऐसे गिरोह हैं जो कि सुपारी उठाकर किसी को भी टपका सकते हैं, और देश की सबसे सुरक्षित तिहाड़ जेल में रहते हुए भी अंतरराष्ट्रीय गिरोह चला सकते हैं, दूसरे देशों में भी कत्ल करने के लिए यहीं बैठे ठेका ले सकते हैं। अब जब सुपारी देने की ऐसी सहूलियत हो, तो फिर खुद बंदूक रखने की क्या जरूरत है? भारत के अधिकतर नागरिक निजी हथियार नहीं रखते, लेकिन आबादी के एक बड़े हिस्से के पास इतनी ताकत तो है कि वे कत्ल करने का ठेका दे सकते हैं। जो लोग ठेके पर कत्ल का ऐसा काम करते हैं, उन्हें कमाई के साथ-साथ हथियारों और हिंसा का एक मोह भी रहता है, वे अपने काम का मजा दूसरे कई पेशेवर लोगों के मुकाबले अधिक लेते हैं।
दुनिया के अलग-अलग देशों में हिंसा की अलग-अलग वजहें हो सकती हैं, कहीं पर एक ही धर्म के भीतर के अलग-अलग समुदायों के बीच आपस में थोक में कत्ल होते हैं, जैसे कि अभी दो दिन पहले शिया समुदाय के दर्जनों लोगों को सामुदायिक विरोध की वजह से आत्मघाती विस्फोट में मार डाला गया। कहीं पर भड़ास निकालने के लिए, कहीं नस्लवादी नफरत के चलते, तो कहीं मानसिक रूप से विचलित लोग थोक में कत्ल करते रहते हैं। हम पूरी दुनिया के संदर्भ में आज इस बात को इसलिए कर रहे हैं कि कहीं घातक ऑटोमेटिक बंदूकें आसानी से हासिल हैं, कहीं पर गैरकानूनी विस्फोटक, और कहीं पर अराजक, और हिंसक-हत्यारी भीड़। जब तक दुनिया से हिंसा की सोच खत्म नहीं होगी, तब तक कोई भी सुरक्षित नहीं रह सकते। जब लोग अपने आपको विस्फोट में उड़ाकर किसी एक समुदाय की भीड़ को मार डालने को भी सफलता मानते हैं, तो फिर ऐसे लोगों के सामने कौन सा समुदाय सुरक्षित रह सकता है? हिंसा का सिलसिला लोग शुरू कर सकते हैं, लेकिन वह कहां तक जाएगा, यह तय करना उनके हाथ में नहीं रहता। हर हिंसा की एक प्रतिक्रिया होती है, जैसे कि विज्ञान कहता है कि हर क्रिया की एक प्रतिक्रिया होती है। इसलिए हिंसा के विज्ञान को समझना जरूरी है, और हिंसा को विज्ञान के नजरिए से समझना भी। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


