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स्मृतियों की पगडंडी से: मेरा पेंड्रा रोड
10-Feb-2026 11:17 AM
स्मृतियों की पगडंडी से: मेरा पेंड्रा रोड

-तारन सिन्हा

आज जब मैं अपनी डेस्क पर बैठकर स्मृतियों की खिड़की में झांकता हूं, तो अक्सर मेरी आंखें उन पन्नों के पार चली जाती है,  जहां अरपा की कल-कल धारा और मरवाही के जंगलों की मखमली हरियाली मेरा इंतजार कर रही होती है।

गौरेला-पेंड्रा-मरवाही मेरे लिए केवल मानचित्र पर खिंची रेखाएं नहीं हैं, बल्कि यह मेरे अस्तित्व का वह इकोसिस्टम है जिसने मुझे गढ़ा है।

आज, 10 फरवरी 2026 को जब यह जिला अपनी वर्षगांठ मना रहा है, मैं इसे उस बालक की हैसियत से देख रहा हूं जिसने पेंड्रा की माटी में जन्म लिया और अक्षर गढ़ना सीखा था , मेरे पिताजी लंबे समय पेंड्रा के मल्टीपरपज स्कूल में शिक्षक रहे। मुझे सुकून है कि जिस धरती ने हमें पहचान दी, आज उसे अपना वजूद और अपना हक मिल रहा है।

इतिहास गवाह है कि यह क्षेत्र कभी छत्तीसगढ़ के 36 गढ़ों में से एक 'पेंड्रागढ़' के नाम से अपनी धाक रखता था। समय की धूल ने इसे कुछ वक्त के लिए धुंधला जरूर किया, लेकिन इसकी तासीर कभी कम नहीं हुई। मुझे याद आता है पं. माधवराव सप्रे का वह संकल्प, जिन्होंने 1900 में यहीं से 'छत्तीसगढ़ मित्र' के माध्यम से पत्रकारिता की मशाल जलाई थी। जब 1902 में यह पत्र बंद हुआ, तब सप्रे जी ने लिखा था-  "परमात्मा के अनुग्रह से जब छत्तीसगढ़-मित्र स्वयं सामर्थ्यवान होगा, तब वह फिर कभी लोकसेवा के लिए जन्मधारण करेगा"। एक जिला बनकर इस क्षेत्र का पुनर्जन्म होना, मानो सप्रे जी की उस भविष्यवाणी का साकार होना ही है। पेंड्रा रोड की वह छोटी सी प्रेस केवल कागज नहीं छाप रही थी, वह हम सबकी सामूहिक चेतना को शब्द दे रही थी।

बचपन में हम विद्या नगर,  के जिन मैदानों और बगीचों के बीच खेलते थे, वे केवल भूगोल नहीं थे। इस धरती के कण-कण में पांडवों, बौद्धों, जैनों और कलचुरियों की अनकही कहानियाँ दबी हैं। पुरातात्विक महत्व के‌ अनेक  स्थान आज भी अपनी ऐतिहासिक भव्यता के साथ खड़े हैं, जो हमें याद दिलाते हैं कि हमारी जड़ें कितनी गहरी हैं।

यहीं से जीवनदायिनी अरपा नदी का उद्गम होता है। यह नदी केवल पानी नहीं, बल्कि इस क्षेत्र की संस्कृति और लोकगीतों का प्रवाह है। अमरकंटक की गोद में बसे इस जिले की प्राकृतिक सुंदरता किसी वरदान से कम नहीं है, जहां प्रकृति और इतिहास एक-दूसरे के गले मिलते हैं।

एक आदिवासी जिले के रूप में यह जिला संभावनाओं का वह द्वार है जो सदियों से आधा खुला था। हमारे बैगा, कोरवा और बिरहोर समुदाय के पास वह ज्ञान की थाती है, जिसे दुनिया आज 'सस्टेनेबल लिविंग' कह रही है। विशेष पिछड़ी बैगा जनजाति के कल्याण के लिए अब जो रणनीतियां बन रही हैं, वे केवल सरकारी योजनाएं नहीं, बल्कि उनके गौरव को वापस लौटाने का प्रयास हैं।

मुझे आज भी याद है उन खेतों की खुशबू, जहां 'विष्णुभोग' जैसा बेहतरीन खुशबूदार चावल उपजाया जाता है। यह चावल केवल स्वाद नहीं, बल्कि पेंड्रा के किसानों की मेहनत और इस मिट्टी की उर्वरता की पहचान है।

वर्षों तक बिलासपुर जैसे बड़े जिले का हिस्सा होने के कारण, यहां की स्थानीय जरूरतें अक्सर मुख्यधारा की फाइलों में दब जाती थीं। लेकिन एक छोटी प्रशासनिक इकाई बनने का सबसे बड़ा सुकून यह है कि अब शासन की योजनाएं सटीक तरीके से क्रियान्वित हो रही हैं।

पेंड्रा की धूल, अरपा का जल और मरवाही की बयार—आप सबको सलाम 

 

 


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