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बालोद गैंगरेप–हत्या मामले में उम्रकैद की सजा बरकरार
10-Feb-2026 1:29 PM
बालोद गैंगरेप–हत्या मामले में उम्रकैद की सजा बरकरार

डीएनए साक्ष्य भरोसेमंद, प्रत्यक्षदर्शी न हों तब भी दोष सिद्ध हो सकता है: हाईकोर्ट
'छत्तीसगढ़' संवाददाता

बिलासपुर, 10 फरवरी। बहुचर्चित बालोद गैंगरेप और हत्या मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने तीनों दोषियों की उम्रकैद की सजा को सही ठहराया है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने कहा कि यदि डीएनए रिपोर्ट अन्य परिस्थितिजन्य साक्ष्यों से समर्थित हो, तो वह अपराध सिद्ध करने के लिए पर्याप्त और विश्वसनीय वैज्ञानिक प्रमाण मानी जाएगी।

मामला बालोद जिले के डौंडीलोहारा थाना क्षेत्र का है। 12 जून 2021 की सुबह एक महिला का शव संदिग्ध हालात में उसके ही घर के भीतर मिला था। परिजनों ने पुलिस को बताया कि घर का दरवाजा अंदर से बंद था। पीछे के रास्ते से एक बच्ची को भेजकर कुंडी खुलवाई गई। कमरे में महिला का शव पलंग पर पड़ा था, उसके हाथ पीठ पीछे तौलिये से बंधे हुए थे और चेहरे पर गहरे चोट के निशान थे।

पोस्टमार्टम रिपोर्ट में महिला की मौत का कारण गला घोंटना पाया गया। जांच में यह भी सामने आया कि हत्या से पहले महिला के साथ दुष्कर्म किया गया था। पुलिस विवेचना में सामने आया कि मुख्य आरोपी कमलनारायण साहू का मृतका से पिछले 10–12 वर्षों से संबंध था। वहीं घटना की रात अन्य दो आरोपी कमलेश कुमार और उत्तम कुमार को ग्रामीणों ने मृतका के घर के आसपास संदिग्ध रूप से घूमते देखा था।

मामले में कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं था। पुलिस ने मृतका के कपड़ों, तकिए और जैविक नमूनों की फॉरेंसिक जांच कराई। राज्य फॉरेंसिक प्रयोगशाला की डीएनए रिपोर्ट में आरोपियों के नमूने मृतका से मेल खाते पाए गए। इसके बाद तीनों आरोपियों को गिरफ्तार कर भारतीय दंड संहिता की संबंधित धाराओं में मामला दर्ज किया गया।

ट्रायल कोर्ट ने सभी साक्ष्यों के आधार पर तीनों को सामूहिक दुष्कर्म और हत्या का दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। दोषियों ने इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की थी।

हाईकोर्ट ने अपने 39 पृष्ठों के विस्तृत फैसले में कहा कि डीएनए जांच पूरी तरह एसओपी के अनुरूप की गई थी और साक्ष्यों से छेड़छाड़ का कोई ठोस प्रमाण सामने नहीं आया। अदालत ने स्पष्ट किया कि डीएनए तकनीक एक सशक्त वैज्ञानिक साधन है और यदि नमूनों का सही ढंग से संग्रह व संरक्षण किया जाए, तो केवल प्रत्यक्षदर्शी न होने के आधार पर आरोपी कानून से नहीं बच सकते। हाईकोर्ट ने तीनों आरोपियों की अपील खारिज कर दी और ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा।

 


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