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बांगो बांध विस्थापित आदिवासी मछुआरों का आक्रोश ठेका व्यवस्था के खिलाफ निकाली रैली
10-Feb-2026 12:30 PM
बांगो बांध विस्थापित आदिवासी मछुआरों का आक्रोश ठेका व्यवस्था के खिलाफ निकाली रैली

‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता

कोरबा, 10 फरवरी। बांगो बांध से विस्थापित आदिवासी मछुआरों ने छत्तीसगढ़ मत्स्य नीति 2022 में लागू ठेका प्रथा के विरोध में सोमवार को शांतिपूर्ण रैली निकालकर प्रशासन के समक्ष अपनी मांगें रखीं। रैली के बाद प्रतिनिधिमंडल ने कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक को ज्ञापन सौंपते हुए विस्थापितों को मत्स्याखेट का अधिकार देने की मांग की। संगठनों ने चेतावनी दी कि मांगें नहीं मानी गईं तो सड़क पर उतरकर आंदोलन तेज किया जाएगा।

9 फरवरी को तानसेन चौक से कलेक्टोरेट तक निकली रैली का नेतृत्व बांगो बांध विस्थापित आदिवासी (हसदेव जलाशय) मछुआरा संघर्ष समिति ने किया। इसमें हसदेव क्षेत्र की 22 पंजीकृत मछुआरा सहकारी समितियों तथा बड़ी संख्या में विस्थापित आदिवासी महिला और पुरुष मछुआरे शामिल हुए। छत्तीसगढ़ किसान सभा ने आंदोलन को समर्थन देते हुए विस्थापितों के पारंपरिक अधिकार बहाल करने की मांग उठाई।

संघर्ष समिति के संयोजक फिरतू बिंझवार और कृष्ण कुमार ने कहा कि जलाशयों में लागू ठेका व्यवस्था से विस्थापित आदिवासी और पारंपरिक मछुआरा समुदायों का शोषण हो रहा है। जिन समुदायों की जमीन, जंगल और गांव बांगो बांध में डूबे, वही आज अपने ही जलाशय में ठेकेदारों के अधीन काम करने को मजबूर हैं।

समिति के पदाधिकारियोंसरबोध, दीपक मांझवार, धनसय और रविंद्र सिदार ने बताया कि मिनीमाता हसदेव जलाशय का जल क्षेत्र 2005 से पहले की पारंपरिक ग्राम सीमाओं में आता है, जिस पर वन अधिकार अधिनियम 2006 के तहत सामुदायिक वन संसाधन (सीएफआर) अधिकार का वैध दावा बनता है। इसके बावजूद ग्रामसभाओं के प्रस्तावों की अनदेखी कर ठेका आवंटित किया गया।

ज्ञापन में हाल के दिनों में मछुआरों को धमकाने, अवैध वसूली और जाल जब्ती जैसी घटनाओं का उल्लेख करते हुए जान-माल की सुरक्षा की मांग की गई। संगठनों ने स्पष्ट किया कि वे ठेका व्यवस्था स्वीकार नहीं करेंगे और किसी भी परिस्थिति में ठेकेदार के लिए काम नहीं करेंगे।

रैली में शामिल छत्तीसगढ़ अनुसूचित जनजाति आयोग के पूर्व अध्यक्ष, पूर्व विधायक भानु प्रताप सिंह ने प्रशासन से ठेका प्रथा तत्काल रोकने, ग्रामसभा के अधिकार मान्य करने, रॉयल्टी आधारित सामुदायिक मत्स्य व्यवस्था लागू करने और मछुआरों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की।

किसान सभा के राज्य संयुक्त सचिव प्रशांत झा ने बताया कि 1980 के दशक में हसदेव नदी पर बने बांगो बांध से 58 आदिवासी बहुल गांव पूरी तरह डूब गए। प्रारंभ में रॉयल्टी आधार पर मत्स्याखेट से आजीविका का भरोसा दिया गया, पर बाद में निजी ठेकेदारों को पट्टा देकर नियंत्रण सौंप दिया गया। इससे विस्थापित अपने ही संसाधनों पर मजदूर बनकर रह गए। किसान सभा ने चेतावनी दी कि मांगें नहीं मानी गईं तो आंदोलन और तेज होगा।

आंदोलन को सीटू के राज्य महासचिव एस.एन. बनर्जी सहित दीपक साहू और दामोदर श्याम ने भी समर्थन दिया।


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