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सारंगढ़ नगर पालिका अध्यक्ष को हटाने का आदेश निरस्त
10-Feb-2026 12:27 PM
सारंगढ़ नगर पालिका अध्यक्ष को हटाने का आदेश निरस्त

व्यक्तिगत दोष सिद्ध किए बिना सामूहिक निर्णय के आधार पर कार्रवाई अवैध: हाईकोर्ट

‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता

बिलासपुर, 10 फरवरी। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की खंडपीठ ने सारंगढ़ नगर पालिका की निर्वाचित अध्यक्ष को पद से हटाने और अयोग्य ठहराने के राज्य सरकार के आदेश को निरस्त कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की पीठ ने साफ कहा कि छत्तीसगढ़ नगर पालिका अधिनियम, 1961 की धारा 41-ए के तहत किसी निर्वाचित अध्यक्ष को हटाने की कार्रवाई तब तक न्यायसंगत नहीं ठहराई जा सकती, जब तक व्यक्तिगत स्तर पर गंभीर कदाचार का स्पष्ट निष्कर्ष न हो। सामूहिक निर्णय के आधार पर की गई ऐसी कार्रवाई चयनात्मक और भेदभावपूर्ण मानी जाएगी।

याचिकाकर्ता सोनी अजय बंजारे सारंगढ़ नगर पालिका परिषद की निर्वाचित पार्षद हैं। स्थानीय निकाय चुनाव में जीत के बाद उन्हें परिषद का अध्यक्ष चुना गया और 3 जनवरी 2022 से उन्होंने नगर पालिका अध्यक्ष का पद संभाला। उनके कार्यकाल के दौरान नगर पालिका सीमा के भीतर विभिन्न स्थानों पर स्थित परिषद की भूमि के छोटे-छोटे हिस्से निजी व्यक्तियों को दुकानों के निर्माण अथवा विस्तार के लिए आवंटित किए गए। ये आवंटन पहले प्रेसिडेंट-इन-काउंसिल के प्रस्तावों से स्वीकृत हुए और बाद में सामान्य सभा के समक्ष रखे गए।

शिकायत के बाद जांच शुरू हुई और अध्यक्ष को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। जांच के उपरांत 2 जुलाई 2025 को यह कहते हुए आदेश पारित किया गया कि भूमि आवंटन राज्य सरकार की पूर्व अनुमति और छत्तीसगढ़ नगर पालिकाएं (अचल संपत्ति अंतरण) नियम, 1996 की प्रक्रिया पूरी किए बिना किया गया। राज्य सरकार ने इसे जनहित के विपरीत मानते हुए धारा 41-ए के तहत अध्यक्ष को पद से हटाने और आगे के कार्यकाल के लिए अयोग्य ठहराने का आदेश जारी कर दिया।

इस आदेश को सोनी बंजारे ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, एकलपीठ ने राज्य सरकार के फैसले को सही ठहराते हुए याचिका खारिज कर दी। इसके बाद उन्होंने खंडपीठ में अपील दायर की। खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि किसी निर्वाचित जनप्रतिनिधि को हटाने के लिए गंभीर कदाचार और कठोर प्रक्रिया पालन की कसौटी पूरी होना आवश्यक है, जो इस मामले में स्पष्ट रूप से अनुपस्थित है। कोर्ट ने माना कि एकलपीठ ने कानून की त्रुटिपूर्ण व्याख्या करते हुए राज्य सरकार के आदेश को बरकरार रखा।

हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने आरोपों के गुण-दोष पर कोई राय नहीं दी है। राज्य सरकार चाहे तो इस आदेश की प्रति प्राप्त होने के दो सप्ताह के भीतर, कानून और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार, नई कार्रवाई शुरू कर सकती है। ऐसी स्थिति में याचिकाकर्ता को पूरा और प्रभावी सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य होगा।

खंडपीठ ने न केवल एकलपीठ के आदेश को, बल्कि 2 जुलाई 2025 के राज्य सरकार के आदेश को भी निरस्त कर दिया, जिसमें सोनी बंजारे की पद से हटाने की कार्रवाई की गई थी।


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