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हाईकोर्ट ने विचारण न्यायालय के आदेश को पलटा
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
बिलासपुर, 10 फरवरी। मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत कोई भी मुस्लिम व्यक्ति अपनी कुल संपत्ति का अधिकतम एक-तिहाई हिस्सा ही वसीयत के माध्यम से किसी अन्य को दे सकता है। इससे अधिक हिस्से की वसीयत तभी मान्य होगी, जब वारिसों की मृत्यु के बाद उनकी स्पष्ट और स्वेच्छा से दी गई सहमति उपलब्ध हो। बिना सहमति पूरी संपत्ति की वसीयत को अवैध माना जाएगा।
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने कहा कि यह सिद्धांत इस्लामिक कानून का मूल आधार है, जिसका उद्देश्य वैध वारिसों के अधिकारों की रक्षा करना है।
एकलपीठ में बिभु दत्त गुरु ने 2 फरवरी 2026 को यह निर्णय देते हुए निचली अदालतों के आदेशों को पलट दिया। बेंच का यह फैसला कोरबा जिले की 64 वर्षीय विधवा जैबुन निशा की अपील पर आया है। वह स्वर्गीय अब्दुल सत्तार लोधिया की पत्नी हैं। अब्दुल सत्तार का निधन 19 मई 2004 को हुआ था। उनके नाम पर कोरबा शहर में खसरा नंबर 1045/3 स्थित लगभग आठ डिसमिल (0.004 एकड़) भूमि और उस पर बना मकान था, जो उनकी स्व-अर्जित संपत्ति थी। दंपती की कोई संतान नहीं थी।
अब्दुल सत्तार की मृत्यु के बाद उनके भतीजे मोहम्मद सिकंदर ने स्वयं को दत्तक पुत्र बताते हुए पूरी संपत्ति पर अधिकार जताया। उसने 27 अप्रैल 2004 की एक वसीयत पेश की, जिसमें कथित तौर पर अब्दुल सत्तार ने अपनी पूरी संपत्ति उसके नाम कर दी थी। इसी आधार पर तहसीलदार के समक्ष आवेदन कर राजस्व रिकॉर्ड में जैबुन निशा के साथ अपना नाम दर्ज करा लिया गया।
जैबुन निशा ने दावा किया कि उन्हें इस प्रविष्टि की जानकारी नवंबर 2007 में मिली। उन्होंने वसीयत को जाली बताते हुए कहा कि यह उनकी सहमति के बिना और मुस्लिम कानून के विरुद्ध बनाई गई है। इसके बाद उन्होंने 2014 में सिविल जज, कोरबा की अदालत में वाद दायर कर स्वयं को संपत्ति की एकमात्र स्वामिनी घोषित करने और सिकंदर का नाम हटाने की मांग की। ट्रायल कोर्ट ने 7 फरवरी 2015 को उनका दावा खारिज कर दिया। द्वितीय अपर जिला न्यायाधीश, कोरबा ने भी 28 जनवरी 2016 को इस निर्णय को बरकरार रखा। हाईकोर्ट ने इन आदेशों को गंभीर कानूनी त्रुटि करार देते हुए कहा कि निचली अदालतों ने विधवा को उसके वैधानिक हिस्से से पूरी तरह वंचित कर दिया, जो कानूनन गलत है।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि वसीयत के आधार पर लाभार्थी को एक-तिहाई से अधिक संपत्ति नहीं दी जा सकती और इस सीमा से आगे कोई भी दावा स्वीकार्य नहीं होगा। इसी आधार पर जैबुन निशा की अपील मंजूर करते हुए उसे राहत दी गई।


