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बिना कीट-हत्या के नैतिक रेशम तैयार की कोल इंडिया व आईआईटी बॉम्बे की ‘जीवोदय’ पहल ने
02-Feb-2026 11:56 AM
बिना कीट-हत्या के नैतिक रेशम तैयार की कोल इंडिया व आईआईटी बॉम्बे की ‘जीवोदय’ पहल ने

सीएसआर सहायता से तीन साल तक चले शोध का लक्ष्य हासिल हुआ

‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
बिलासपुर, 2 फरवरी।
देश में रेशम उत्पादन की सदियों पुरानी परंपरा को मानवीय और करुणामय दिशा देते हुए आईआईटी बॉम्बे के ‘जीवोदय’ पायलट प्रोजेक्ट ने बड़ी सफलता हासिल की है। कोयला इंडिया की कॉरपोरेट सामाजिक दायित्व-सीएसआर सहायता से संचालित इस परियोजना के तहत तीन वर्षों के सतत अनुसंधान के बाद ऐसी अभिनव तकनीक विकसित की गई है, जिससे बिना कीटों की हत्या किए रेशम का उत्पादन संभव हुआ है।

यह परियोजना आईआईटी बॉम्बे के सेंटर फॉर टेक्नोलॉजी अल्टरनेटिव्स फॉर रूरल एरियाज़ ( सीटीएआरए ) द्वारा क्रियान्वित की गई। शोधकर्ताओं ने ऐसी तकनीक विकसित की, जिसमें रेशम के कीड़े अपने प्राकृतिक जीवनचक्र को पूरा करते हैं। रेशम धागा तैयार करने के बाद वे पतंगे में परिवर्तित होकर सुरक्षित रूप से उड़ जाते हैं। इस मानवीय दृष्टिकोण को दर्शाने के लिए इस रेशम को ‘जीवोदय सिल्क’ नाम दिया गया है।

अब तक रेशम उत्पादन में शहतूत की पत्तियों पर पलने वाले कीट कोकून बनाते हैं, जिन्हें उबालकर धागा निकाला जाता है। इस प्रक्रिया में करोड़ों कीटों की मृत्यु हो जाती है। ‘जीवोदय’ परियोजना ने इस दशकों पुरानी पद्धति को चुनौती देते हुए करुणा और विज्ञान के समन्वय से एक नया मार्ग प्रस्तुत किया है।

लगातार प्रयोगों के बाद सीटीएआरए की टीम ने कीटों को समतल सतह पर धागा बुनने के लिए प्रशिक्षित करने में सफलता पाई। इससे कोकून बनाने की आवश्यकता समाप्त हो गई और कीट सुरक्षित रूप से अपना जीवनचक्र पूरा कर सके। वैज्ञानिक दृष्टि से इसे एक दुर्लभ और महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।

कोयला इंडिया के निरंतर सीएसआर सहयोग ने इस अवधारणा को प्रयोगशाला से वास्तविक सफलता तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई। कोल इंडिया ने कहा है कि यह तकनीक न केवल नैतिक और पर्यावरणीय दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि रेशम उत्पादन से जुड़े किसानों के लिए आय का नया, टिकाऊ स्रोत भी उपलब्ध कराती है, जिससे ग्रामीण आजीविका को मजबूती मिलेगी।


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