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बजट हर स्तर पर खोखला..
01-Feb-2026 3:39 PM
बजट हर स्तर पर खोखला..

एआईसीसी के रिसर्च विभाग के समन्वयक की प्रतिक्रिया

रायपुर,1 फरवरी। कांग्रेस के रिसर्च विभाग के राष्ट्रीय समन्वयक सुश्री कुलिशा देवी ने केन्द्रीय बजट पर अपनी प्रतिक्रिया में बजट को खोखला करार दिया है। उन्होंने कहा कि यह बजट आय बढ़ाने का नहीं, बल्कि कर्ज बढ़ाने का बजट है।

 राष्ट्रीय समन्वयक ने कहा कि जब बजट के आँकड़े पीछे छूट जाते हैं, घिसे-पिटे जुमले दोहरा दिए जाते हैं और चुनावी नारों को चतुराई से भाषण में पिरो दिया जाता है, तब असली सवाल यह होता है—क्या यह केंद्रीय बजट आम लोगों की ज़िंदगी में कोई सकारात्मक बदलाव लाने वाला है? सरकार के अब तक के रिकॉर्ड को देखते हुए इसका जवाब साफ़ और बेझिझक है: नहीं। बिल्कुल नहीं।

कुलिशा ने आगे कहा कि यह बजट हर स्तर पर खोखला है। व्यापक आर्थिक आँकड़ों की चमक-दमक के पीछे एक असहज सच्चाई छुपी हुई है। सरकार दावा कर रही है कि वित्त वर्ष 2026 में अर्थव्यवस्था 7.4 प्रतिशत की दर से बढ़ेगी। अगर यह सच होता, तो देश में रोज़गार की बाढ़ आ जानी चाहिए थी, निवेश उमड़ पड़ा होता। लेकिन हकीकत यह है कि 2025 के दस महीनों में से चार महीनों में शुद्ध विदेशी निवेश नकारात्मक रहा। यानी विदेशी निवेशक भारत से पैसा निकालकर भाग रहे हैं और भारतीय पूँजी विदेशों में शरण ले रही है। नतीजा सामने है—रुपया 90 के पार जा चुका है और सरकार के पास कहने को कोई ठोस जवाब नहीं।

उन्होंने आगे कहा कि घर-घर की हालत और भी बदतर है। मार्च 2025 तक 28 करोड़ से ज़्यादा लोग कर्ज़दार हैं। औसतन हर व्यक्ति पर 4.8 लाख रुपये का कर्ज़ चढ़ चुका है। सिर्फ़ चार साल में औसत कर्ज़ 40 प्रतिशत बढ़ गया। वेतनभोगी वर्ग अब सम्मान से नहीं, कर्ज़ के सहारे ज़िंदा है—क्योंकि किराया, राशन और ज़रूरी खर्च ही पूरी आमदनी निगल जा रहे हैं।
इस गंभीर संकट पर बजट पूरी तरह खामोश है। उलटे सरकार खुद स्वीकार कर रही है कि अगले साल जीएसटी संग्रह 2.5 प्रतिशत कम रहेगा। सवाल यह है कि जब नाममात्र की आर्थिक वृद्धि 10 प्रतिशत बताई जा रही है, तो टैक्स संग्रह कैसे घट रहा है? 2025-26 में सरकार आयकर लक्ष्य से 1,09,000 करोड़ रुपये पीछे रह जाएगी, फिर भी अगले साल आयकर से लगभग 14 लाख करोड़ रुपये वसूलने का सपना दिखाया जा रहा है। जैसा कि वित्त मंत्री की ‘युवा शक्ति’ कहेगी—यह गणित नहीं, जुमलेबाज़ी है।

कुलिशा ने कहा कि आम परिवारों के लिए यह बजट एक साफ़ संदेश देता है: कमाओ मत, कर्ज़ लो।

किसान क्रेडिट कार्ड की सीमा बढ़ाना हो या पीएम स्वनिधि जैसी योजनाएँ—सरकार के पास आय बढ़ाने का कोई रोडमैप नहीं है। वह सिर्फ़ कर्ज़ का रास्ता दिखा रही है। जब ग्रामीण भारत में हर चार में से तीन लोग पहले से कर्ज़ में डूबे हैं, तब और कर्ज़ थोपना आर्थिक नीति नहीं, सामाजिक अपराध है।

उन्होंने कहा कि किसानों के नाम पर बजट में सिर्फ़ छलावा है। पीएम किसान और फसल बीमा जैसी योजनाओं का बजट महँगाई और बढ़ती किसान आबादी के बावजूद जस का तस रखा गया है। उधर यूरिया और पोषक तत्वों पर सब्सिडी घटाकर किसानों की लागत और बढ़ा दी गई है। यानी किसान से कहा जा रहा है—ज़्यादा पैदा करो, ज़्यादा खर्च करो, और घाटा खुद सहो।

कृषि उत्पादन बढ़ाने की बातें खोखली हैं। खासकर भाजपा शासित राज्यों में सरकारें खुद अपने चुनावी झूठ में फँस चुकी हैं। छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में बढ़े हुए एमएसपी पर धान खरीद का वादा किया गया, लेकिन सत्ता में आते ही किसानों के लिए रास्ते बंद कर दिए गए। मंडियों में हर कदम पर मुश्किलें खड़ी की गईं। कम से कम धान ख़रीद हो इसके निर्देश अधिकारियों को दिए गए। जब किसान को यह भरोसा ही नहीं कि उसकी फसल बिकेगी, तो वह क्यों ज़्यादा उत्पादन करेगा? ज़्यादा उत्पादन का मतलब है ज़्यादा नुकसान—और सरकार इसे अच्छी तरह जानती है।

उन्होंने कहा कि जल जीवन मिशन का पाँच साल का विस्तार सरकार की नाकामी की खुली स्वीकारोक्ति है। पिछले बजट में 67,000 करोड़ रुपये रखे गए, बाद में उसे घटाकर 17,000 करोड़ कर दिया गया। सवाल सीधा है—पैसा था तो खर्च क्यों नहीं किया? योजना समय पर पूरी क्यों नहीं हुई? जवाब कोई नहीं। ज़मीन पर हकीकत यह है कि ठेकेदार पैसा लेकर चले गए, नल तो लगे लेकिन पानी नहीं आया।

कुछ घोषणाएँ सुनने में अच्छी लगती हैं—स्कूलों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को वाई-फाई से जोड़ना, गिग वर्कर्स को पहचान और स्वास्थ्य सहायता देना। लेकिन ये ऊँट के मुँह में ज़ीरे के बराबर हैं। जिस पैमाने पर संकट है, उस पैमाने पर यह बजट मज़ाक बनकर रह जाता है। शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में आवंटन अपनी आवश्यकता से बहुत नीचे है। 

कुलिशा ने कहा कि मेडिकल कॉलेजों में 75,000 सीटें बढ़ाने की घोषणा भी एक और खोखला दावा है। बिना अच्छे अस्पतालों, प्रयोगशालाओं और योग्य शिक्षकों के ये सीटें सिर्फ़ आँकड़े हैं। डॉक्टर और प्रोफेसर तब उपलब्ध होंगे जब नौकरी की शर्तें सम्मानजनक हों, वेतन और कार्य-परिस्थितियाँ आकर्षक हों। इसके लिए पैसा चाहिए—और इस बजट में पैसा नहीं, सिर्फ़ भाषण है।

‘मेक इन इंडिया’ का बार-बार जाप भी अब थकाने लगा है। फैक्ट्रियाँ नारों से नहीं चलतीं। निवेश भरोसे से आता है, सामाजिक स्थिरता से आता है। जब माहौल असुरक्षित और संस्थाएँ कमज़ोर हों, तब कोई भी योजना काग़ज़ से बाहर नहीं निकलती। इस सच्चाई पर बजट पूरी तरह चुप है।

उन्होंने कहा कि निष्कर्ष साफ़ है
यह बजट आय बढ़ाने का नहीं, कर्ज़ बढ़ाने का बजट है।
यह सुधारों का नहीं, टालमटोल का बजट है।
सरकार की विश्वसनीयता पहले ही सवालों के घेरे में है—और यह बजट उसे बचाने के बजाय और गहरा गड्ढा खोदता है।

 


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