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ओडिशा के कोरापुट का एक सरकारी आदेश सामने आया है जिसमें कलेक्टर ने गणतंत्र दिवस के उपलक्ष्य में 26 जनवरी को पूरे जिले में मांस-मछली, मुर्गी-अंडा, और बाकी किस्म के गैरशाकाहारी सामान बेचने पर रोक लगाई है। कलेक्टर का यह आदेश सोशल मीडिया पर लोगों की आलोचना झेल रहा है कि गणतंत्र दिवस का खानपान से क्या लेना-देना हो सकता है? और जो खानपान त्यौहारों से परे के बाकी आम दिनों पर कानूनी है, वह गणतंत्र दिवस के दिन आपत्तिजनक कैसे हो सकता है? क्या देश का कानून, या ऐसे राष्ट्रीय दिवस मांसाहारी लोगों के लिए नहीं हैं? क्या जो लोग छुट्टियों के दिन मांसाहार पकाने-खाने की सहूलियत पाते हैं, उनके अधिकार शाकाहारी लोगों के मुकाबले कम होने चाहिए?
कई बार जिले की कमान पाने वाले अफसर अतिउत्साह में, या सत्ता के राजनीतिक रूझान, और उसकी रीति-नीति को देख-समझकर, खुद ही उसका अंदाज लगाकर राजा के प्रति, राजा से अधिक निष्ठावान हो जाते हैं। यह मामला अधिक अटपटा इसलिए भी लगता है कि देश में शाकाहारी और मांसाहारी लोगों का जो नक्शा है, उनमें राष्ट्रीय औसत 29 फीसदी शाकाहारियों के मुकाबले, ओडिशा में कुल 2.6 फीसदी लोग ही शाकाहारी हैं। ओडिशा से लेकर बंगाल, और दक्षिण भारत के समुद्रतटीय राज्यों तक शाकाहारियों की संख्या सबसे कम है, और दिलचस्प बात यह है कि दक्षिण के कुछ राज्यों में तो अरूणाचल और नागालैंड जैसे उत्तर-पूर्वी राज्यों से भी कम शाकाहारी हैं। देश में भारत सरकार के सर्वे के मुकाबिक ही 70 फीसदी महिलाएं, और 78 फीसदी पुरूष मांसाहार करते हैं। तेलंगाना, आंध्र, बंगाल, तमिलनाडु, ओडिशा, और झारखंड ऐसे राज्य हैं जहां पर मांसाहारियों की संख्या 97 फीसदी से अधिक है। ओडिशा हर मायने में मांसाहार के पैमाने पर सबसे ऊपर के गिने-चुने राज्यों में से है, और ऐसे में वहां पर संविधान लागू होने के गणतंत्र दिवस पर बिना किसी संवैधानिक प्रावधान के सिर्फ जिला दंडाधिकारी के अधिकार इस्तेमाल करके मांसाहार और अंडे तक पर रोक लगा देना एक धर्म के भीतर की एक तबके की सोच के प्रति निष्ठा दिखाना है। कोरापुट कलेक्टर के इस आदेश में अंडे तक पर रोक लगा दी गई है, जो कि देशभर में बहुत से राज्यों में स्कूलों के भोजन में शामिल सामान है।
अलग-अलग जगहों पर ऐसा अतिउत्साही प्रशासन कई तरह के काम करता है जिनमें से कुछ सत्ता को खुश करने वाले हो सकते हैं, लेकिन ऐसे अधिकतर काम सत्ता की लोकतांत्रिक और संवैधानिक पकड़ को कमजोर साबित करने वाले रहते हैं। अधिक वफादारी दिखाने के लिए अभी छत्तीसगढ़ में एक अफसर ने एक अल्पसंख्यक समुदाय के कारोबारी के तीन कारखाने एक साथ बंद करवा दिए, जबकि उसी दर्जे का प्रदूषण प्रदेश में हजारों और कारखानों में उसी तरह जारी है। यह काम तो बुनियादी रूप से गलत है, लेकिन अगर सरकारें इस तरह के कोई फैसले अघोषित रूप से भी लागू करने की नीयत रखती हैं, तो कम से कम अफसरों के स्तर पर ऐसा हिसाब चुकता नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे नियमों से कुछ या अधिक हद तक अनजान नेताओं को भी यह लगने लगता है कि उनके राजनीतिक या साम्प्रदायिक पूर्वाग्रह के फैसले सही हैं। यह सिलसिला अनजान सत्तारूढ़ नेताओं को भी इस खुशफहमी से भर देता है कि वे कुछ भी कर सकते हैं।
आज देशभर में अधिकतर प्रदेशों में हालत यह है कि कमाऊ कुर्सियों की हवस वाले अफसर बैठने को कहने पर लेट जाते हैं। सत्ता अगर उन्हें किसी की लाठी तोडऩे कहे, तो वे उसका सिर भी तोडऩे पर उतारू हो जाते हैं। यह सिलसिला खतरनाक इसलिए है कि भारत में कदम-कदम पर यह साबित हो रहा है कि शासन-प्रशासन अपनी दुर्भावना से जिन लोगों पर कार्रवाई करते हैं, उन्हें उससे बचने और उबरने के कानूनी विकल्प पाने में ही बरसों लग जाते हैं। अभी कई मामलों में मुकदमा झेल रहे लोग पांच, दस, या बीस बरस बाद जाकर बेकसूर रिहा हुए हैं। मतलब यही है कि उन्हें कोई सरकार अपनी बदनीयत से लंबे वक्त तक बंद रख सकती है। जब कार्रवाई करने वाले अफसर सत्ता को खुश करने पर इतने आमादा रहते हैं, तो वे 26 जनवरी जैसे राष्ट्रीय पर्व को भी किसी शाकाहारी, या शाकाहारी माने जाने वाले धर्म के धार्मिक त्यौहार की तरह मांसरहित बना सकते हैं। खासे पढ़े-लिखे, प्रशिक्षित, लोकतांत्रिक और संवैधानिक मुद्दों पर जानकार अफसर भी जब धर्मान्धता के आदेश जारी करने लगते हैं, तो उससे निपटने के अदालती रास्ते न तो आसान रहते हैं, न ही छोटे। जिस ओडिशा में 97 फीसदी से अधिक आबादी मांसाहारी है, वहां पर सरकारी छुट्टी वाले गणतंत्र दिवस पर मांस पर रोक लगाना पूरी तरह बेवकूफी का फैसला है। 2011 की जनगणना के मुताबिक ओडिशा मेंं 93.63 फीसदी आबादी हिन्दू है। खानपान के केन्द्र सरकार के एक दूसरे सर्वे के मुताबिक ओडिशा में 97 फीसदी से अधिक लोग मांसाहारी हैं। ऐसी आबादी पर ऐसा बेतुका फैसला क्यों थोपना, जिसे अदालती चुनौती देने में भी हफ्तों या महीनों का वक्त लग जाएगा।
अगर देश में लोगों को एक करने के दिए जा रहे कई किस्म के आव्हान ईमानदार हैं, तो ऐसे शाकाहारी आव्हान को मांसाहारी आबादी पर थोपकर समाज को बांटने का ही काम हो रहा है, उसे जोडऩे का काम नहीं हो रहा। फिर धीरे-धीरे ऐसी सोच पोशाक पर आती है, एक धर्म के त्यौहार के समय सडक़ किनारे दूसरे धर्म के लोगों के फुटपाथी कारोबार के खिलाफ आती है, और फिर यह सिलसिला हर बरस अधिक हिंसक, अधिक हमलावर भी होते चलता है। ओडिशा के एक जिले का यह नाजायज दिखता आदेश नौकरशाही के गैरकानूनी, या बेहतर यह कहना होगा, कानूनविरोधी उत्साह का एक सुबूत है, और अफसरों को मांसाहार का गैरकानूनी विरोध करने से दूर रखना चाहिए। इससे परे भी एक दूसरी बात यह सोचनी चाहिए कि इस देश में राष्ट्रीय स्तर पर जब तीन चौथाई आबादी मांसाहारी है तो शाकाहार को राष्ट्रीय आहार का दर्जा देना कहां तक जायज है? जिन धर्मों के लिए, या जिस धर्म के लिए ऐसा आक्रामक रूख दिखाया जा रहा है, उस धर्म के भी अपने पुराने इतिहास में पशुओं की बलि, और उनके मांस को खाने का लंबा इतिहास दर्ज है। जब कश्मीर से कन्याकुमारी तक सभी धर्मों के लोगों को जोडऩे की बात होनी चाहिए, तो भारत के बहुसंख्यक हिन्दू धर्म के भीतर ही तकरीबन तीन चौथाई मांसाहारी आबादी की खानपान की पसंद को नाजायज करार दिया जा रहा है, यह सिलसिला एक राजनीतिक फतवे के रूप में भी नुकसान का है, और ओडिशा की सत्तारूढ़ भाजपा को यह समझना चाहिए। एक चौथाई से कम शाकाहारी हिन्दुओं के खानपान-दुराग्रही बड़े छोटे से तबके को खुश करके कोरापुट कलेक्टर तो सत्ता की कुछ मेहरबानी पा सकते हैं, लेकिन क्या उससे देश-प्रदेश का कोई भला भी होगा?


