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छत्तीसगढ़ की दो अलग-अलग घटनाएं प्रदेश में कानून की स्थिति बताने वाली है। पेंड्रा में एक विधवा महिला का एक शादीशुदा व्यक्ति से प्रेमप्रसंग था। दोनों ही हमउम्र अधेड़ थे। कुछ अरसा पहले दोनों घर छोडक़र चले गए थे, और मध्यप्रदेश में रह रहे थे। अभी लौटे तो प्रेमी के परिवार ने इस महिला को घर से निकालकर उसके कपड़े फाड़े, उसके बदन पर गोबर पोता, और उसे पीटते हुए गांव की गलियों में घुमाया। अब इसके फोटो-वीडियो सामने आने पर पुलिस ने इस प्रेमी की पत्नी सहित परिवार के कुछ और लोगों के खिलाफ जुर्म दर्ज किया है। एक दूसरा मामला इससे बिल्कुल ही अलग है, जिसमें छत्तीसगढ़ के बसना में ओडिशा से गांजा लेकर आ रहे तस्करों की कार ने पुलिस की गाड़ी को टक्कर मारी, और फिर अपनी कार आगे-पीछे करके उसे और ठोका। पांच पुलिसवालों ने कूदकर जान बचाई, और इसके बाद पुलिस गाड़ी में आग लग गई। लाखों के गांजे सहित छोड़ी गई इस कार को पुलिस ने जब्त किया है। ये दोनों मामले एकदम अलग किस्म के हैं, लेकिन इन दोनों में एक बात एक सरीखी है कि लोगों के मन में कानून का सम्मान बहुत बुरी तरह कमजोर हो चुका है। हर दिन जगह-जगह होने वाली चाकूबाजी भी यही बताती है कि लोग अपने झगड़े इतने बेफिक्र होकर सडक़ों पर जुर्म की हिंसा करके निपटा रहे हैं कि न तो उन्हें अदालत से कोई उम्मीद है, और न ही अदालत जाना उन्हें जरूरी लगता है। लोग पूरी तरह बेफिक्र होकर अपना हिसाब खुद ही चुकता कर रहे हैं, पहले तो यह कहा जाता था कि लोग कानून हाथ में लेते हैं, लेकिन अब यह समझ पड़ता है कि लोग कानून हाथ में लेकर जमीन पर डालकर उसे अपने पैरों से कुचलते भी हैं। यह सिलसिला अधिक खतरनाक इसलिए है कि ऐसा करने वाले तमाम लोग पेशेवर मुजरिम नहीं रहते, कई लोग परिवार के भीतर भी हिंसा करते हैं, पड़ोसियों को मार डालते हैं, नाबालिगों से बलात्कार करते हैं, और देश में एक मजबूत कानून होने के बावजूद किसी को सजा का डर नहीं लगता है। जुर्म करने वाले अगर सिर्फ पेशेवर मुजरिम होते, तो वे गिनते के रहते, और उन पर काबू पाना, उन्हें सजा दिलाना आसान भी रहता। आज जब आम घरेलू लोग भी किसी तनातनी की हालत में, ठगने और लूटपाट करने के लिए, क्षणिक देहसुख पाने के लिए संगीन जुर्म करने पर उतारू हो जा रहे हैं, तो यह समाज के लिए अधिक खतरनाक है, और कानून लागू करने की जिम्मेदार संस्थाओं के लिए अधिक बड़ी चुनौती।
यह भी सोचने की जरूरत है कि लोगों के मन से सजा का खौफ क्यों निकल गया है? इसलिए कि निचली अदालत से लेकर हाईकोर्ट पहुंचने तक लोगों को जमानत पर घूमने-फिरने, और सजा पाने पर भी अपील पर फिर छूट जाने का इतना मौका मिलता है, कि सजा का डर उन्हें डराता नहीं है। यह भी एक वजह हो सकती है कि पुलिस जैसी प्राथमिक जांच एजेंसी से लेकर न्याय व्यवस्था तक में जहां जो भ्रष्टाचार है, उसका अंदाज लोगों को है, और वे उस भ्रष्टाचार के भरोसे डरना-सहमना छोड़ चुके हैं। एक तीसरी वजह यह हो सकती है कि जिनको सजा के असल खतरे का अंदाज भी है, उन्हें भी जेल के बाहर की जिंदगी, और जेल के भीतर की जिंदगी में कोई बहुत बड़ा फर्क नहीं दिखता है, उनका बहुत अधिक सुख का वर्तमान नहीं है, और महत्वाकांक्षाओं का कोई भविष्य नहीं है, इसलिए वे लापरवाही से जुर्म कर बैठते हैं। आज सरकारों ने किसी जुर्म के हो जाने के बाद उसके आरोपी को पकडऩे, और उसे सजा दिलाने को ही अपनी सबसे बड़ी जिम्मेदारी और कामयाबी मान लिया है। होना तो यह चाहिए था कि जुर्म की वजहों का अध्ययन करके सरकारें समाज में ऐसी स्थितियां लातीं कि जुर्म होना ही घटता, लेकिन पांच बरस या उससे कम की दूरदर्शिता वाली सरकारें ऐसा नहीं कर पा रही हैं।
अदालतों में चलने वाले मामलों में जब 25-50 बरस तक फैसले नहीं होते, तो भी लोगों का कानून और न्याय व्यवस्था पर से भरोसा उठ जाता है, और लोग खुद होकर सडक़ों पर त्वरित हिंसक न्याय करने लगते हैं। इंसाफ की धीमी रफ्तार की वजह से बढऩे वाले ऐसे जुर्म लोकतंत्र में न्याय व्यवस्था में गंभीर कमजोरी का एक सुबूत भी रहते हैं, और इसका आसान इलाज नहीं हो सकता। देश में आज पुलिस और अदालतों का जितना राजनीतिकरण हो चुका है, इन दोनों ही संस्थाओं में सरकारी और राजनीतिक दखल जितनी अधिक हो चुकी है, उसे देखते हुए आने वाले वक्त में बहुत उम्मीद रखने की भी कोई वजह नहीं बनती। लोकतंत्र में बदलाव बहुत धीमी रफ्तार से आते हैं, खासकर सकारात्मक बदलाव। नकारात्मक बदलाव बड़ी तेजी से आते हैं, और समाज को जकड़ भी लेते हैं।
आए दिन होने वाले तरह-तरह के जुर्म, तरह-तरह की अराजकता को आंकड़ों में देखना, और अलग-अलग बरसों के आंकड़ों की तुलना कर लेना काफी नहीं होना चाहिए। समाज में बदअमनी और अराजकता का सामाजिक अध्ययन लगातार चलना चाहिए, और लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में ऐसे अध्ययन के नतीजों पर अनिवार्य रूप से विचार होना चाहिए। सरकारों को आंकड़ों में बदलाव को तौलना अधिक आसान लगता है, बजट के आंकड़े बताना भी आकर्षक और लुभावना लगता है, लेकिन आंकड़ों से परे की हकीकत को बयां करना किसी चार्ज या ग्राफ की तरह आसान नहीं होता। सरकारें पुलिस बढ़ाती चलें, कहीं-कहीं पर अदालतें भी बढ़ा लें, लेकिन उससे समस्या की जड़ पर वार नहीं होगा। जुर्म और हिंसा की, अराजकता और गुंडागर्दी की समस्याओं को खत्म करने के लिए उनके पीछे की वजहों को देखना होगा, और समाज में कानून के राज को हर मोर्चे पर कायम करना होगा। ऐसा नहीं हो सकता कि किसी एक राजनीतिक, धार्मिक, साम्प्रदायिक मुद्दे पर सरकारें अराजकता को छूट दें, और बाकी मोर्चों पर अराजकता को कुचलें। लोकतंत्र में व्यक्तियों का मिजाज जब कानून के लिए हिकारत का हो जाता है, तो वह हर किस्म के कानून के खिलाफ रहता है, किसी एक खास कानून को उस हिकारत से बचाया नहीं जा सकता। सरकारों को देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों के समाज वैज्ञानिकों को शामिल करके ऐसे सामाजिक अध्ययन को पाठ्यक्रम में जोडऩा भी चाहिए जिससे निकले हुए लोग समाज में हो रहे हिंसा और जुर्म का अध्ययन करके सरकार को हकीकत बता सकें।


