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शिक्षक की याचिका पर स्कूल शिक्षा विभाग का आदेश निरस्त, 90 दिनों में नया फैसला लेने के निर्देश
छत्तीसगढ़' संवाददाता
बिलासपुर, 26 दिसंबर। सेवा नियमों के उल्लंघन कर की गई पदोन्नति को हाईकोर्ट ने निरस्त करते हुए कहा है कि नियमों की अवहेलना कर किसी पात्र कर्मचारी को उसके वैधानिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता।
शिक्षक दिनेश कुमार राठौर ने अधिवक्ता जितेन्द्र पाली और अनिकेत वर्मा के माध्यम से हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ता की प्रारंभिक नियुक्ति 26 अप्रैल 1989 को निम्न वर्ग शिक्षक के पद पर हुई थी। बाद में 2 फरवरी 2009 को उन्हें उच्च वर्ग शिक्षक के पद पर पदोन्नत किया गया। 23 जनवरी 2015 को जिला शिक्षा अधिकारी द्वारा आदेश जारी कर 18 अगस्त 2008 से उनकी वरिष्ठता तय की गई थी।
याचिका में बताया गया कि नियमों के अनुसार पांच वर्ष की सेवा पूर्ण करने के बाद वे व्याख्याता (लेक्चरर) पद पर पदोन्नति के लिए पात्र हो गए थे। छत्तीसगढ़ स्कूल शिक्षा राजपत्रित सेवा (स्कूल स्तर सेवा) भर्ती एवं पदोन्नति नियम, 2008 के तहत व्याख्याता के पद 100 प्रतिशत पदोन्नति से उच्च वर्ग शिक्षकों से भरे जाने का प्रावधान है। इसके बावजूद विभागीय पदोन्नति समिति ने 19 जून 2012 के आदेश में उनसे कनिष्ठ शिक्षकों को पदोन्नत कर दिया और उनके मामले पर विचार नहीं किया गया।
विभाग ने यह कहकर उनका दावा खारिज किया कि 1 अप्रैल 2010 की स्थिति में उनके पास स्नातकोत्तर डिग्री नहीं थी। जबकि याचिकाकर्ता का कहना था कि उन्होंने 16 अप्रैल 2012 को स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त कर ली थी और इसके बावजूद जानबूझकर उन्हें पदोन्नति से वंचित किया गया।
मामले की सुनवाई जस्टिस संजय अग्रवाल की सिंगल बेंच में हुई। सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने 16 सितंबर 2016 के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें स्नातकोत्तर उपाधि नहीं होने के आधार पर याचिकाकर्ता को पदोन्नति के लिए अयोग्य ठहराया गया था।
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को निर्देश दिया है कि वे अपनी सभी मांगों के साथ विभाग के समक्ष अभ्यावेदन प्रस्तुत करें। साथ ही राज्य शासन और सक्षम प्राधिकारी को भर्ती एवं पदोन्नति नियम, 2008 के अनुसार 90 दिनों के भीतर निर्णय लेने के आदेश दिए गए हैं।


