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-राजेश प्रियदर्शी
विनोद कुमार शुक्ल…. चाहने से उन जैसा नहीं हुआ जा सकता, वे ख़ुद चाहकर वैसा नहीं हो पाते जैसे वे थे. वे ख़ुद के जैसे थे, एकदम मौलिक.
ऐसा मैंने निर्मल वर्मा और चित्रकार रज़ा के बारे में भी महसूस किया. विनोद जी के साथ लंदन में करीब 20 साल पहले अकेले तसल्ली से चाय पीने का अवसर मिला था.
उन्होंने बीबीसी के बड़े-से कैफ़ेटेरिया में रत्ती भर भी दिलचस्पी नहीं दिखाई, उन्होंने वहाँ काम करने वाली अफ्रीकी लड़कियों से बहुत कम शब्दों में लेकिन ऐसे बात की जैसे वे उन्हीं के गाँव की हों.
फिर लंदन में रहने वाले अफ्रीकी और एशियाई लोगों की सामाजिक-आर्थिक दशा पर धीरे-धीरे, छोटे-छोटे वाक्यों में (जो उनकी ख़ासियत थी) गहरी उत्सुकता ज़ाहिर करते रहे.
मुझे याद है उस दिन कैफ़ेटेरिया में दो अफ्रीकी लड़कियाँ काम कर रही थीं. मैंने बताया कि उनके यहाँ भी भारत की तरह नाम अर्थपूर्ण होते हैं, एक का नाम कम्फ़र्ट था और दूसरी का पेशेंस.
विनोद जी हल्की मुस्कान के साथ बुदबुदाए, “कितना अच्छा”.
लिखने और बोलने, दोनों में मात्रा पर उनका ज़ोर नहीं था.
उनकी कई कविताएँ अचानक दिमाग़ में कौंध जाती हैं.
हमारे जीवन में विनोद जी की उपस्थिति हवा में तैरती खुशबू की तरह रही है, उनके जीवन-व्यक्तित्व और लेखनी तीनों में कुछ भी स्थूल नहीं है, वे सूक्ष्म भावों की कैलिग्राफ़ी करते थे, वैसे ही जीते भी थे.
उन्होंने विद्वता के लबादे से बहुत दूरी रखी, इसीलिए हमारे जीवन में उनके जाने के बाद भी उनकी मौजूदगी उसी सहजता से बनी रहेगी जैसी उनके जीवित रहने पर थी. (बीबीसी)


