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अरावली पहाड़ियों की 'नई परिभाषा' पर हो रहे विरोध के बीच पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने प्रतिक्रिया दी है.
भूपेंद्र यादव ने कहा, "कोर्ट ने ही अरावली पहाड़ियों और अरावली को लेकर एक टेक्टिकल कमेटी का गठन किया. इसका मक़सद खनन को सीमित करना है. पहले ऐसा होता था कि किसी भी जगह खनन होता था, ये तय नहीं था कि अरावली पहाड़ी या अरावली क्या है."
पर्यावरण मंत्री ने इस मुद्दे पर कुछ वरिष्ठ नेताओं पर भ्रामक पोस्ट करने का आरोप लगाया.
उन्होंने कहा, "कई लोग कई तरह की बातें कह रहे हैं, कुछ हमारे वरिष्ठ नेता लोग भी भ्रामक पोस्ट कर रहे हैं. सबसे पहले मैं स्पष्ट कर दूं, एनसीआर क्षेत्र में खनन की अनुमति ही नहीं है. एनसीआर का मतलब है दिल्ली, गुरुग्राम, फ़रीदाबाद, नूहं और अलवर का एनसीआर हिस्सा. जब एनसीआर क्षेत्र में खनन की अनुमति ही नहीं है, तो उनका तथ्य ही झूठा है."
"ये परिभाषा आने के बाद भी इस निर्णय में ही ये कहा गया है कि अभी कोई नई माइनिंग लीज़ नहीं दी जाएगी. सिर्फ़ क्रिटिकल, रणनीतिक रूप से अहम और परमाणु खनिजों को लेकर ही अपवाद होगा."
सरकार की ओर से 21 दिसंबर को जारी प्रेस रिलीज़ में कहा गया, "100 मीटर या उससे ज़्यादा ऊंचाई वाली पहाड़ियों को घेरने वाली सबसे निचली भू-आकृतियों को, उनकी ऊंचाई और ढलान की परवाह किए बिना, खनन की लीज़ देने के मकसद से बाहर रखा गया है."
"इसी तरह, अरावली रेंज को उन सभी भू-आकृतियों के रूप में समझाया गया है जो 100 मीटर या उससे ज़्यादा ऊंचाई वाली दो आस-पास की पहाड़ियों के 500 मीटर के दायरे में मौजूद हैं. इस 500 मीटर के ज़ोन में मौजूद सभी भू-आकृतियों को, उनकी ऊंचाई और ढलान की परवाह किए बिना, माइनिंग लीज़ देने के मकसद से बाहर रखा गया है." (bbc.com/hindi)


