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मध्य प्रदेश के नर्मदापुरम में एक दरगाह को भगवा रंग में रंगने का मामला सामने आया है. कई अख़बारों ने इस ख़बर को प्रमुखता से छापा है. आज के प्रेस रिव्यू में सबसे पहले यही पढ़िए.
अंग्रेज़ी अख़बार द इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, करीब 50 साल पुरानी ये दरगाह नर्मदापुरम (होशंगाबाद) ज़िला मुख्यालय से तकरीबन 40 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. रविवार को इस दरगाह में तोड़फ़ोड़ की गई और फिर इसे भगवा रंग से रंगा गया.
पुलिस के अनुसार, ये मामला सुबह 6 बजे के आसपास सामने आया जब कुछ स्थानीय युवाओं ने दरगाह को भगवा रंग में पुता हुआ पाया और देखा कि दरगाह का दरवाज़ा भी टूटा और ख़ुला हुआ है.
दरगाह की रखवाली करने वाले अब्दुल सत्तार ने कहा कि सुबह 6 बजे के आसपास गांव के कुछ युवाओं ने सूचित किया कि दरगाह को भगवा रंग दिया गया है.
अब्दुल सत्तार ने कहा, "वहां पहुंचने पर हमने देखा कि मंदिर के लकड़ी के दरवाज़े टूटे हुए थे और मारू नदी में फेंक दिए गए थे. न सिर्फ मीनार बल्कि मक़बरे और प्रवेश द्वार को भी भगवा रंग से रंगा गया था. इसके अलावा परिसर के अंदर का हैंडपंप भी उखड़ा हुआ था."
गांववालों का आरोप है कि पुलिस ने पहले उनकी शिकायत नहीं सुनी लेकिन जब उन्होंने राष्ट्रीय राजमार्ग-22 को बंद कर दिया तो पुलिस ने कार्रवाई शुरू की. पुलिस और ज़िला प्रशासन की टीम के घटनास्थल पर पहुंचने और कार्रवाई का आश्वासन देने के बाद स्थानीय लोगों ने "चक्का जाम" खत्म किया.
इस मामले में भारतीय दंड संहिता की धारा 295 (ए) के तहत एफ़आईआर दर्ज की गई है. घटना के बाद गांव में तनाव का माहौल है और हर तरफ़ पुलिस को तैनात कर दिया गया है.
इस बीच दरगाह को दोबारा रंगने का काम भी शुरू कर दिया गया है. दमकल विभाग की दो गाड़ियों को दरगाह को दोबारा खोलने में लगे गांववालों की मदद के लिए लगाया गया है.
माखन नगर पुलिस थाने के टाउन इंस्पेक्टर हेमंत श्रीवास्तव के मुताबिक़, "हमने एफ़आईआर दर्ज कर ली है लेकिन हमारी प्राथमिकता दरगाह को दोबारा खोलना है, जो अब हो गया है. इसके बाद आरोपी भी गिरफ्तार किए जाएंगे. लेकिन पहली नज़र में ये नहीं लगता कि यह काम स्थानीय युवाओं ने किया होगा. क्योंकि दोनों समुदाय के लोग यहां शांतिपूर्वक तरीके से रहते हैं और पहले कभी भी यहां सांप्रदायिक तनाव नहीं देखने को मिला है."
हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा चुनावों में मिले झटके के बाद किसान संगठनों के मंच संयुक्त किसान मोर्चा ने भविष्य की योजनाओं पर चर्चा के लिए सोमवार को दिल्ली में बैठक बुलाई है. इस बैठक में किसान आंदोलन फिर से शुरू करने पर भी विचार किया जा सकता है.
अंग्रेज़ी अख़बार हिंदुस्तान टाइम्स की ख़बर के मुताबिक, एसकेएम के निर्णय लेने वाली समिति के एक सदस्य ने बताया कि किसानों का लक्ष्य सिर्फ एक चुनाव भर सीमित नहीं था. हालांकि, एसकेएम ने उत्तर प्रदेश में बीजेपी के ख़िलाफ़ प्रचार किया था.
उत्तर प्रदेश में भाजपा ने किसानों के विद्रोह को आसानी से दबाते हुए फिर से चुनाव जीत लिया. हालांकि, पार्टी को इस बार कम सीटें मिलीं. कहा जाता है कि भारत की सबसे ज़्यादा आबादी वाले इस राज्य में चुनाव का राष्ट्र की राजनीति पर असर पड़ता है.
भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत ने रविवार को कहा, "कोई भी पार्टी सत्ता में हो, हमारा आंदोलन तब तक चलेगा जब तक मांगे पूरी नहीं होती. मैं उत्तर प्रदेश चुनाव के बारे में बात नहीं करना चाहता. वो खत्म हो चुके हैं. लेकिन ये 100 फ़ीसदी सच है कि आंदोलन चलता रहेगा. मैं एसकेएम के साथ हूं."
आंदोलन से हटने की चर्चा को "बदमाशों की अफ़वाह" बताते हुए टिकैत ने खारिज कर दिया. उन्होंने कहा, "न्यूज़ चैनल कह रहे हैं हम फेल हो गए. अगर हम फेल हो गए तो सरकार ने कृषि कानून वापस क्यों लिए?" (bbc.com)


