अंतरराष्ट्रीय
रौहान अहमद
ईरान और अमेरिका के बीच न्यूक्लियर डील पर बातचीत शुरू हो चुकी है. ये बातचीत ओमान में हो रही है.
इससे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई को कड़ी चेतावनी दी थी.
तब लग रहा था कि ये बातचीत ख़तरे में पड़ गई है. क्योंकि दोनों देशों के बीच स्थान और बातचीत की शर्तों को लेकर मतभेद थे.
इस बीच, पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि उसे ईरान और अमेरिका के बीच परमाणु बातचीत में शामिल होने का बुलावा मिला है. उसने इस न्योते को मंजूर कर लिया है.
पिछले दिनों ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बक़ाई ने कहा था कि ईरान और अमेरिका के बीच 'अगले कुछ दिनों में' बातचीत होगी. ओमान, तुर्की और दूसरे देशों ने वार्ता की मेज़बानी करने में दिलचस्पी दिखाई है. इसके लिए जल्द ही कोई एक जगह तय कर ली जाएगी."
अमेरिकी समाचार वेबसाइट 'एक्सियोस' ने एक अरब सूत्र के हवाले से कहा है कि ट्रंप प्रशासन ने वार्ता तुर्की की बजाय ओमान में आयोजित करने के ईरानी अनुरोध को मान लिया.
अभी इस बात पर चर्चा जारी है कि क्या अरब और दूसरे मुस्लिम देशों को भी इन वार्ताओं में शामिल किया जाना चाहिए.
मध्य पूर्व के लिए ट्रंप के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ़ और दूसरे सरकारी अधिकारियों के साथ ईरान की ओर से विदेश मंत्री अब्बास अराग़ची इस बातचीत में हिस्सा ले रहे हैं.
अब्बास अराग़ची ने सीएनएन को दिए एक इंटरव्यू में कहा था, ''मुझे भरोसा है कि हम एक समझौते तक पहुंच सकते हैं."
इन वार्ताओं में पाकिस्तान की भूमिका क्या हो सकती है? इस सवाल का जवाब देने से पहले यह जानना ज़रूरी है कि अमेरिका और ईरान इन वार्ताओं के ज़रिए क्या हासिल करना चाहते हैं.
अमेरिका और ईरान के बीच तनाव पिछले कई वर्षों से जारी है. पिछले साल अमेरिका ने ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमले भी किए थे जिसके बाद ईरान ने क़तर स्थित अल-उदैद एयरबेस पर मिसाइल हमले किए थे.
हाल के दिनों में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप नए सिरे से कई बार ईरान पर हमले की धमकियां देते नज़र आए.
उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिकी विमानवाहक पोत 'यूएसएस अब्राहम लिंकन' ईरान की तरफ़ बढ़ रहा है. इसके साथ ही उन्होंने बार-बार ईरान के साथ बातचीत का इशारा भी किया था.
अभी तक ईरान या अमेरिका की तरफ़ से बातचीत का एजेंडा साझा नहीं किया गया है.
हालांकि पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने बीबीसी को बताया कि इन वार्ताओं का मक़सद दोनों देशों के बीच तनाव को कम करना है.
अतीत में ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत परमाणु समझौते के इर्द-गिर्द घूमती रही है.
अब तक अमेरिका का रुख़ साफ़ तौर पर यह रहा है कि वह ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह से ख़त्म करना चाहता है और उसे ऐसे किसी समझौते की उम्मीद होगी जिसमें यूरेनियम संवर्द्धन को पूरी तरह बंद करना शामिल हो.
दूसरी तरफ़ ईरानी अधिकारी और ख़ुद राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान कई बार यह दावा कर चुके हैं कि उनके देश ने न तो कभी परमाणु हथियार हासिल करने की कोशिश की है और न ही करेगा.
ईरानी राष्ट्रपति के अनुसार देश का परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण काम के लिए है.
अमेरिकी विदेश नीति और ईरान पर गहरी नज़र रखने वाले विश्लेषकों का मानना है कि इस माहौल में दोनों देशों के बीच किसी तरह का समझौता होना ज़रूरी है क्योंकि ईरान पर अमेरिकी हमला पूरे क्षेत्र के लिए ख़तरनाक हो सकता है.
अमेरिका में रहने वाली विश्लेषक सहर ख़ान कई विदेशी थिंक टैंक से जुड़ी रही हैं. उन्होंने बीबीसी उर्दू को बताया, "मैं उम्मीद कर रही हूं कि ईरान और अमेरिका किसी तरह के समझौते के लिए तैयार हो जाएंगे जिससे ईरान पर संभावित हमले रुक जाएं."
हालांकि उनका कहना है कि ईरान से बातचीत के लिए अमेरिका का तरीक़ा तनाव कम करने में मददगार साबित नहीं हो रहा है.
सहर ख़ान ने कहा, "अमेरिकी तरीक़ा बहुत अस्पष्ट रहा है और इससे ऐसे इशारे मिलते हैं कि अमेरिका वार्ता में दिलचस्पी ही नहीं रखता."
वह कहती हैं, "ईरान पर अमेरिकी हमला न केवल ईरान को बल्कि पूरे क्षेत्र को अस्थिरता का शिकार बना सकता है."
"यह बात भी अहम है कि अमेरिका को पता हो कि ईरान अफ़ग़ानिस्तान नहीं है. न ज़मीन के लिहाज़ से, न आबादी के और न ही संसाधनों के लिहाज़ से. ईरान इराक भी नहीं है, मुझे उम्मीद है कि अमेरिकी नीति निर्धारक इन बातों पर भी ग़ौर कर रहे होंगे."
न्यू लाइन्स इंस्टीट्यूट से जुड़े कामरान बुख़ारी का मानना है कि ईरान को यह एहसास हो गया है कि मौजूदा हुकूमत को बचाने के लिए अमेरिका के साथ किसी तरह का समझौता करना ज़रूरी है.
बीबीसी उर्दू से बात करते हुए उन्होंने कहा, "उन्हें (ईरान को) पता है कि वह कगार पर खड़े हैं. उन्हें मालूम है कि वह कमज़ोरी के दौर से गुज़र रहे हैं और अपनी अंदरुनी समस्याओं को अमेरिका के साथ समझौते के बिना हल नहीं कर सकते."
सहर ख़ान
ध्यान रहे कि हाल के दिनों में ईरान में ख़राब आर्थिक स्थिति के कारण लगभग दो हफ़्ते तक हिंसक विरोध प्रदर्शन होते रहे थे.
कामरान बुख़ारी की राय में अमेरिका से बातचीत या समझौते के बाद ईरान को आर्थिक रूप से सांस लेने का मौक़ा मिल सकता है और कुछ पाबंदियों से छुटकारा मिल सकता है.
वह समझते हैं कि शायद अब ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम पर भी समझौता करने को तैयार हो जाए.
वह कहते हैं, "मुझे लगता है कि ट्रंप प्रशासन भी अब यही कह रहा है कि पहले परमाणु मुद्दे पर बात करते हैं और बाक़ी मामलों पर बाद में चर्चा हो सकती है. मेरे ख़्याल में बैकडोर चैनलों और मध्यस्थों के ज़रिए से अब ईरान भी कह रहा है कि हम अपने मिसाइल प्रोग्राम पर समझौता नहीं करेंगे, हम अपनी प्रॉक्सियों के साथ संबंधों पर समझौता नहीं करेंगे, लेकिन हम एटॉमिक प्रोग्राम पर आपकी (अमेरिका की) कुछ मांगों पर समझौता कर सकते हैं या उस समझौते के क़रीब आ सकते हैं."
पाकिस्तान की भूमिका
अंतरराष्ट्रीय मीडिया में यह ख़बरें भी चल रही हैं कि पाकिस्तान के अलावा सऊदी अरब, क़तर, मिस्र, ओमान और संयुक्त अरब अमीरात सहित कई देशों को ईरान और अमेरिका की वार्ता में शामिल होने का बुलावा मिला है. हालांकि, निमंत्रण मिलने की आधिकारिक पुष्टि केवल पाकिस्तान की ओर से की गई है.
पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ताहिर अंदराबी ने बीबीसी से इस बात की पुष्टि की है कि निमंत्रण मिल चुका है. हालांकि, इन वार्ताओं में कौन शामिल होगा अभी इसका फ़ैसला नहीं किया गया है.
दूसरी तरफ़ पाकिस्तानी प्रधानमंत्री की टीम के एक सदस्य ने बीबीसी को बताया कि उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इसहाक़ डार के इन वार्ताओं में शामिल होने की उम्मीद है.
यह पहली बार नहीं है कि ईरान और अमेरिका के बीच तनाव के बीच पाकिस्तान का नाम लिया जा रहा हो.
बीबीसी उर्दू ने पिछले साल फ़ील्ड मार्शल आसिम मुनीर के वॉशिंगटन दौरे के दौरान राष्ट्रपति ट्रंप और पाकिस्तानी सेना प्रमुख के बीच हुई बातचीत के बारे में वॉशिंगटन में मौजूद एक सूत्र से बात की थी.
उस सूत्र ने यह पुष्टि की थी कि उस मुलाक़ात में ईरान और इसराइल के बीच संघर्ष पर चर्चा हुई थी.
वॉशिंगटन के स्रोत ने उस वक़्त बीबीसी उर्दू को बताया था, "पाकिस्तानी नेतृत्व समझता है कि इस मामले का कूटनीतिक समाधान निकल सकता है और उसकी ओर से ईरान को भी यही संदेश दिया गया है कि मध्य पूर्व में अमेरिकी हितों को नुकसान पहुंचाना सही नहीं होगा और बाक़ी मामलों को कूटनीतिक स्तर से हल किया जा सकता है."
पूर्व अमेरिकी राजनयिक और स्टिमसन सेंटर से जुड़ी एलिज़ाबेथ थ्रेलकेल्ड ने बीबीसी उर्दू से बात करते हुए कहा, "पाकिस्तानी अधिकारी बताते हैं कि पाकिस्तान ख़ामोशी से ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत में मददगार बन रहा है."
उनका मानना है कि वार्ता में पाकिस्तान की भागीदारी एक अहम बात है.
एलिज़ाबेथ कहती हैं, "पाकिस्तान एक ऐसे समझौते के लिए काम करना जारी रखेगा जिससे सैन्य कार्रवाई का ख़तरा टल जाए. और वह इसके लिए तेहरान और वॉशिंगटन से अपने मज़बूत संबंधों के अलावा दूसरे क्षेत्रीय भागीदारों के साथ संबंधों का भी फ़ायदा उठाएगा."
विश्लेषकों का मानना है कि ईरान और अमेरिका के बीच वार्ता में पाकिस्तान को शामिल करना एक अच्छी प्रगति है.
सहर ख़ान कहती हैं, "पाकिस्तान को इन वार्ताओं में बुलाया जाना एक अच्छा क़दम है, चाहे उसे मध्यस्थ की भूमिका दी जा रही हो या एक पर्यवेक्षक की."
पाकिस्तान और ईरान की सीमाएं एक-दूसरे से मिलती हैं. ऐसे में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव इस्लामाबाद को भी प्रभावित कर सकता है.
सहर ख़ान कहती हैं, "इससे यह भी संकेत मिलता है कि ट्रंप प्रशासन ईरान से जुड़ी पाकिस्तान की चिंताओं को गंभीरता से देख रहा है."
वर्ष 2024 में ईरान और पाकिस्तान ने भी एक-दूसरे के सीमावर्ती क्षेत्रों में हमले किए थे, लेकिन उसके बाद से दोनों देशों के बीच संबंधों में सुधार आया है.
कामरान बुख़ारी
सहर ख़ान के अनुसार, "पाकिस्तान और ईरान एक-दूसरे के साथ संबंधों को मज़बूत करना चाहते हैं और इन वार्ताओं में पाकिस्तान को बुलाया जाना पाकिस्तान के महत्व की ओर इशारा करता है. मुझे उम्मीद है कि पाकिस्तान एक समझदारी भरी आवाज़ उठाएगा."
वह मानती हैं कि पाकिस्तान इस क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण है और अमेरिका को भी इस महत्व का अंदाज़ा है.
एलिज़ाबेथ भी वार्ता में शामिल होने को पाकिस्तान की विदेश नीति की कामयाबी बताते हुए कहती हैं, "मध्य पूर्व का हिस्सा न होते हुए भी पाकिस्तान वह एकमात्र देश है जो इन वार्ताओं में शामिल होगा और यह इस बात का सबूत है कि पाकिस्तान क्षेत्र में होने वाली गतिविधियों में कितनी दिलचस्पी ले रहा है."
दूसरे विश्लेषकों का मानना है कि ईरान और अमेरिका वार्ता में पाकिस्तान को शामिल होने का न्योता देना यह भी साबित करता है कि अमेरिका की क्षेत्रीय नीति में बदलाव आ रहा है.
अमेरिका के न्यू लाइन्स इंस्टीट्यूट से जुड़े कामरान बुख़ारी कहते हैं कि पाकिस्तान को इन वार्ताओं में शामिल होने का निमंत्रण देना "अमेरिका की नई नीति का हिस्सा है, जिसके तहत वह अपना क्षेत्रीय बोझ दूसरे देशों के साथ बांटना चाहता है." (bbc.com/hindi)


