संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : जब संसद सोच-विचार की जहमत उठाना नहीं चाहती, तो यही होता है..
सुनील कुमार ने लिखा है
28-Apr-2026 8:34 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : जब संसद सोच-विचार की जहमत उठाना नहीं चाहती, तो यही होता है..

भारत की बड़ी अदालतों में केन्द्र और राज्य सरकारें ही सबसे बड़ी वादी, और प्रतिवादी बनी दिखती हैं। सुप्रीम कोर्ट कई बार इस बात को कह भी चुका है कि किस तरह सरकार ही अदालतों पर बोझ बढ़ाती हैं। इसके अलावा संसद में भी कई बार ऐसे कानून बनते हैं जिनमें लचीलापन गायब रहता है, और बाद में होने वाले मुकदमों के दौरान अदालतों को कानून की बारीकियों के बीच से एक लचीलेपन की तलाश करनी पड़ती है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में अभी एक ऐसा ही मामला आया। 55 बरस के पति, और 49 बरस की पत्नी की इकलौती बेटी अभी 2022 में गुजर गई। गम में डूबे हुए मां-बाप को यह सूझने में वक्त लग गया कि वे कृत्रिम गर्भाधान तकनीक से एक बार फिर मां-बाप बन सकते हैं, औलाद पा सकते हैं। लेकिन भारत में प्रजनन प्रौद्योगिकी को लेकर 2021 में बने कानून में यह तय किया गया है कि महिला अगर 50 बरस पार कर लेगी, और पुरूष 55 बरस, तो फिर वे इस तकनीक के माध्यम से माता-पिता नहीं बन सकते। इस नियम के जाल से निकलने के लिए इस जोड़े ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी, और जस्टिस अमितेन्द्र किशोर प्रसाद ने यह कहा कि संतान सुख पाना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का हिस्सा है। इसलिए किसी भी व्यक्ति को माता-पिता बनने से नहीं रोका जा सकता। आईवीएफ सेंटर ने उम्र की सीमा का हवाला देते हुए इस जोड़े को मेडिकल रूप से सक्षम रहते हुए भी मना कर दिया था। अब हाईकोर्ट ने आईवीएफ सेंटर को छूट दी है, और यह आदेश भी दिया है कि अगर आईवीएफ ट्रीटमेंट के दौरान इस महिला की उम्र 50 बरस से अधिक भी हो जाए, तो भी यह इलाज न रोका जाए। 

अब सवाल यह उठता है कि जब यह कानून बनाया गया, क्या ऐसी स्थितियों की कल्पना संसद में किसी सदस्य ने नहीं की थी? जब ऐसे कानून की जानकारी सांसदों को पहले से दी जाती है, संसद में चर्चा और बहस की उम्मीद की जाती है, तब भी अगर सांसद ऐसे पहलुओं पर नहीं सोचते, तो इसका मतलब यही है कि वे ऐसे बनने जा रहे कानूनों पर अपने इलाके के अलग-अलग तबकों से राय नहीं लेते हैं, राजनीतिक दल भी अपने अनगिनत प्रकोष्ठों के भीतर किसी प्रस्तावित कानून की बारीकियों तक विचार-विमर्श नहीं करते हैं, और विधेयक मंजूरी पाकर कानून बन जाते हैं। बहुत से और दूसरे कानूनों के साथ भी ऐसी जटिलताएं जुड़ी रहती हैं जो कि व्यापक और सार्थक चर्चा से दूर हो सकती थीं, लेकिन कानून बन जाने के बाद वे अदालतों पर बोझ बन जाती हैं। लोगों को याद रखना चाहिए कि देश का संविधान बनाने के लिए जब संविधान सभा के लंबे चले सत्रों में एक-एक पहलू पर खूब विचार-विमर्श होता था, तो उसका फायदा संविधान के रास्ते देश को मिला। उस वक्त भी अगर हल्ला-गुल्ला, और बहिर्गमन के बीच बिना विचार-विमर्श और बहस के संविधान बन गया होता, तो आज अदालतें उसी की व्याख्या करने में लगी रहतीं। 

प्रजनन तकनीक से जुड़े हुए कुछ और पहलुओं पर हमने पहले भी इसी जगह लिखा है। भारत में बेऔलाद लोगों को संतान पाने में मदद करने की एक तकनीक, सरोगेसी, के लिए कानून इतना जटिल बना दिया गया है, कि संतान पाने की चाह रखने वाले लोगों की हसरत अधूरी रह जाने का खतरा रहता है, दूसरी तरफ देश में जिन जरूरतमंद महिलाओं को दूसरों की मदद करके खुद भी कुछ फायदा हो सकता था, उसकी संभावना भी इस कानून ने खत्म कर दी है। इसके लिए जो महिला दूसरे जोड़े के एम्ब्रियो को अपनी कोख में रखने के लिए तैयार हो, उसका ऐसे बेऔलाद जोड़े का एकदम ही करीबी रिश्तेदार होना जरूरी है। ऐसी महिला अपने खुद के अंडे नहीं दे सकती। उसका शादीशुदा, विधवा, या तलाकशुदा होना जरूरी है। उसकी उम्र 25 से 35 बरस के बीच होनी चाहिए। उसका कम से कम एक जीवित जैविक बच्चा अपना खुद का होना चाहिए। सरोगेसी केवल नि:स्वार्थ आधार पर ही की जा सकती है, इसके लिए वह महिला केवल मेडिकल खर्च, और स्वास्थ्य बीमा का कवरेज ले सकती है, लेकिन इसके अलावा और कुछ नहीं पा सकती। कहने के लिए तो यह कानून गरीब महिलाओं के कारोबारी शोषण को रोकने के लिए लाया गया है, लेकिन इसकी शर्तें इतनी कड़ी हैं कि बहुत से जोड़ों को तो ऐसे शर्तों वाली कोई रिश्तेदार महिला शायद मिल भी न पाए। दूसरी तरफ जिस देश में किसी महिला का देह बेचना गैरकानूनी नहीं है, जहां पर गैरकानूनी तरीके से किडनी खरीदना देश भर में धड़ल्ले से जारी है, वहां पर एक गरीब महिला को भी किसी दूसरी जरूरतमंद महिला से सरोगेसी के लिए भुगतान लेने की छूट नहीं है। 

हमारा मानना है कि सरोगेसी के कानून को भारतीय संसद ने इस तरह आदर्शवादी बनाने की कोशिश की है कि समाज में जरूरतमंद जोड़ों की जरूरत पूरी न हो सके, और न ही इससे किसी गरीब महिला को अपने परिवार की जरूरत के लिए मदद मिल सके। पाकिस्तान के मशहूर लेखक मंटो की एक कहानी याद आती है जिसमें एक तांगेवाले की मौत के बाद उसकी पत्नी तांगा चलाने का लाइसेंस लेने म्युनिसिपल दफ्तर जाती है, तो उसे वहां बताया जाता है कि एक औरत को तांगे का लाइसेंस नहीं मिल सकता। थक-हारकर वह कोठे पर जा बैठती है, और उसे धंधा करने का लाइसेंस मिल जाता है। भारत में अगर सरोगेसी से संतान पाने की जरूरत वाले लोगों के काम आकर अगर किसी गरीब महिला को तमाम सरकारी-कानूनी और मेडिकल शर्तें पूरी करते हुए कुछ कमाई हो सकती है, तो गरीबों से पटे हुए इस देश में इस कानून ने उसकी संभावना भी खत्म कर दी है। पांच किलो अनाज से दिन में दो वक्त का खाना पाने वाले लोगों को किसी मानवीय काम से खुद भी कुछ मिल जाए, तो वह इस कानून को मंजूर नहीं है। फिर ऐसे कानूनों को चुनौती देना भी आसान नहीं रहता है, क्योंकि जरूरतमंद जोड़े अघोषित और गैरकानूनी रूप से ऐसी मदद जुटा लेते हैं। 

भारत में सरकार, राजनीतिक दल, और संसद, बहुत तेजी से आदर्शवादी रूख अपना लेते हैं, यही वजह है कि साथ रहने वाले बालिग जोड़ों के लिए सुप्रीम कोर्ट को फैसले देने होते हैं, अपना बदन बेचने वाली महिला जुर्म नहीं करती, यह फैसला भी सुप्रीम कोर्ट को देना होता है। इस देश में लोगों को व्यावहारिक रूख अपनाने के बजाय एक पाखंड का मुखौटा लगाना बेहतर लगता है, फिर चाहे उन्हें यह पता रहता है कि असलियत क्या है, और पर्दे के पीछे क्या होता है। जो देश कन्या भ्रूण हत्या करने के लिए सोनोग्राफी सेंटरों पर काबू नहीं पा सकता, वह आदर्श के पैमानों की बड़ी ऊंची-ऊंची मीनारें बनाने पर फख्र करता है। ऐसा देश आदर्श से जरा भी नीचे दिखता कानून बनाना नहीं चाहता, फिर चाहे उस कानून की व्याख्या करते हुए देश की बड़ी अदालतों का कितना ही वक्त बर्बाद क्यों न हो जाए, अदालतों तक जाने वाले लोगों का लंबा-चौड़ा खर्च, और बरसों का संघर्ष क्यों न हो जाए। 

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