संपादकीय
चुनाव और जंग के दिनों में सबसे अधिक नुकसान सच का होता है। इन दोनों को ही जीतने के लिए हर किस्म का झूठ जायज मान लिया जाता है। कहा भी जाता है कि जंग में पहली लाश सच की गिरती है। क्या चुनाव में भी ऐसा ही नहीं होता है? अब वे दिन हवा हुए जब चुनावों में मुद्दों की बात हुआ करती थी, विचारधारा के आधार पर भाषण दिए जाते थे, और विपक्षी उम्मीदवार विरोधी न होकर विपक्षी ही माने जाते थे। अब वे दिन ग्रामोफोन रिकॉर्ड के दिनों की तरह धरोहर के दर्जे में आ गए हैं। इसी तरह किसी जंग के जायज होने, या उसमें नैतिकता का ख्याल रखने की बात अब प्रासंगिक नहीं रह गई है। हिन्दुस्तान की दर्जनों बोलियों में जिसकी लाठी, उसकी भैंस, यह बात अलग-अलग तरीके से लोकोक्तियों में आती है, और आज एक विकसित हो चुके समझे जाने वाले, लेकिन पाषाण युग में पहुंच चुके अमरीका को देखकर लगता है कि लोकतंत्र से पहले की यह लोकोक्ति उस पर कितनी खरी उतरती है। चुनाव और जंग, इन दोनों को लेकर अब रणनीति, रणभूमि, हथियार, हमला जैसे शब्द इस्तेमाल होते हैं, और आज भारत के पांच राज्यों में चुनाव को लेकर वक्त कुछ ऐसा चल रहा है कि जंग के साथ-साथ चुनावी लड़ाई भी सोशल मीडिया पर छाई हुई है, और इन दोनों के मिलेजुले काले बादल सच के सूरज की किसी भी संभावना को ढांक चुके हैं।
ऐसे में सोशल मीडिया के साथ-साथ अखबार और दूसरे समाचार साधनों से समाचार-विचार पाने वाले लोगों का क्या हाल है? अखबारों तक तो यह बात अभी भी लागू है कि उसके अलग-अलग पन्नों पर आई हुई खबरों में से लोग अपनी पसंद की खबरें पढ़ सकते हैं, बाकी खबरों को छोड़ सकते हैं। सोशल मीडिया के एल्गोरिद्म के साथ-साथ अब तो ऑनलाईन समाचार माध्यमों में भी लोगों की पसंद के हिसाब से समाचार-विचार सामने दिखते हैं। दो कदम और आगे बढ़ें, तो आज एआई समाचार-विचार को छांटने, उनका विश्लेषण करने, और उनके बारे में अपनी राय जोडक़र सामने रखने के लिए एक पैर पर खड़े दिखता है। अलग-अलग एआई आपको मुफ्त इस्तेमाल का अलग-अलग गिनती का कोटा देता है, और जब तक आखिरी सवाल भी पूछने का आपका कोटा बाकी है, वह आपको उकसाते रहता है कि अब तक की बातचीत के बाद वह आपके लिए और क्या करे? अब गूगल जैसे सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाले सर्च इंजन भी साधारण सर्च करके नतीजे सामने रखने के बजाय उन नतीजों पर अपना विश्लेषण पहले सामने रखते हैं, फिर उसके नीचे नतीजे रखते हैं। मतलब यह कि आपकी पसंद को भांपकर सारे सर्च इंजन, सारे एआई, और सारे समाचार श्रोत जो आपको सुहाए, वही आपके सामने रखते हैं। दशकों पहले हिन्दी फिल्म का एक गाना था, जो तुमको हो पसंद वही बात करेंगे, तुम दिन को अगर रात कहो, रात कहेंगे...।
जब पूरी की पूरी टेक्नॉलॉजी आपकी मुसाहिब और चापलूस हो जाए, आपकी हाँ में हाँ मिलाने लगे, आपकी पसंद की फोटो, वीडियो, और पोस्ट दिखाने लगे, जो लोग आपको पसंद हैं, उन्हीं-उन्हीं का पोस्ट किया हुआ दिखाने लगे, तो आप रेशम के कीड़े की तरह अपने ही इर्द-गिर्द के ककून के कैदी होकर रह जाते हैं, और धीरे-धीरे यह ककून एक अंडे की तरह बंद हो जाता है, और उसके भीतर जिस तरह रेशम का कीड़ा कैद रहकर दम तोड़ देता है, उसी तरह इंसान की कल्पनाशीलता, रचनाशीलता, उसकी जागरूकता और चेतना धीरे-धीरे दम तोडऩे लगते हैं। अब इन दिनों तो भारत जैसे देश में किसी एक, या दूसरी, राजनीतिक विचारधारा के कैदी बढ़ते चल रहे हैं। राजनीतिक कैदियों के बाद धार्मिक और साम्प्रदायिक, जातीय और क्षेत्रवादी कैदी भी बढ़ते चल रहे हैं। ये किसी जेल में बंद नहीं हैं, लेकिन सोच के कैदी हैं, और ये विविधता से धीरे-धीरे पहले भी दूर होते जाते थे, लेकिन अब तो वे कम्प्यूटर, सोशल मीडिया, मोबाइल फोन की मेहरबानी से अपने दायरे को और तंग करते चलते हैं। अधिकतर लोग फेसबुक या इंस्टाग्राम पर भी 25-50 लोगों तक सीमित रह जाते हैं, उन्हीं का पोस्ट किया हुआ दिखता है, और विपरीत विचारधारा आंखों से दूर होती जाती है।
इस अमूर्त से विषय पर लिखने की जरूरत आज इसलिए लग रही है कि इंसानों ने पेड़ों से, हरियाली से, प्राकृतिक नदी-तालाब से अपने को दूर कर लिया है। अब शहर में कहीं तालाब हैं, तो उनके इर्द-गिर्द इतना सीमेंटीकरण हो चुका है कि उसका क्षेत्रफल पानी के क्षेत्रफल से कहीं अधिक रहता है। कहीं शहरी जंगल लगाया भी गया है, तो वहां आसपास चलने-फिरने, और उठने-बैठने का फर्शीकरण, सीमेंटीकरण इतना हो चुका है कि बिना किसी कृत्रिम चीज के एक पेड़ भी देखना आसान नहीं रह गया है। जंगल तो दूर रह गए हैं, और वहां भी लोग उन्हीं जगहों पर जाकर गाड़ी रोकते हैं, जहां पर इंसानों के बनाए हुए रिसॉर्ट रहते हैं। नतीजा यह है कि कुदरत की जिस विविधता से इंसानों के बहुत कुछ सीखने का हो सकता था, वह विविधता गायब हो गई है आसपास से। नतीजा यह हुआ है कि एक ही किस्म की सोच इस हद तक हावी हो चुकी है कि मानो किसी सीमेंट कारखाने से एक आकार बनकर निकले हुए सीमेंट ब्लॉक हों। जब लोगों की सोच से विविधता चली जाती है, तो पहले दूसरे देश के लोगों को सोचने और समझने की जरूरत खत्म होने लगती है, फिर अपने ही देश के दूसरे धर्म या प्रदेश के लोगों को, उसके बाद बारी आती है दूसरी जाति या दूसरे लिंग के लोगों की। आज औरत और मर्द भी एक-दूसरे को सोचने-समझने की कोशिशों से इतना खासा दूर हो चुके हैं कि थर्ड जेंडर, एलजीबीटीक्यू जैसे तबकों के लोगों को समझना तो नाजायज सा माना जाता है। जो इंटरनेट और सोशल मीडिया अभी हाल के बरसों तक लोगों को पूरी दुनिया बताने वाला माना जाता था, उस इंटरनेट और सोशल मीडिया ने लोगों की पसंद को जानकर और भांपकर, पहले अपने एल्गोरिद्म से और अब एआई की मदद से हर उस व्यक्ति को रेशम के कीड़े की तरह एक ककून में कैद करना शुरू कर दिया है, जो अपना खासा समय ऑनलाईन गुजारते हैं।
हमने अभी तक जो लिखा है इसे भूमिका मान लिया जाए। अब आखिरी के गिने-चुने शब्दों में हम मुद्दे की बात करना चाहते हैं कि लोगों को रेशम के कीड़े सरीखी मौत पाने से बचना चाहिए। एक सीमित दायरे के कैदी हो जाना कभी इंसानों के मिजाज में नहीं था। हिन्दुस्तान के लोग पानी के जहाज पर चढक़र पश्चिम के देशों तक जाते थे, चीन के व्यापारी और विद्वान भारत आते थे, अफगानिस्तान से मेवा बेचने के लिए आने वाले काबुलीवाले को तो हमने अपने बचपन में देखा हुआ है। लेकिन आज बहुराष्ट्रीय कंपनियों का पैक किया हुआ मेवा प्लास्टिक की पैकिंग के प्रदूषण के साथ आता है, और हमें किसी काबुलीवाले को देखना भी नसीब नहीं होता। इसलिए आज बहुत अधिक जरूरत है ऑनलाईन कैद से कम से कम कुछ अरसा बाहर निकलकर जिंदगी के असल लोगों से मिलने की, अलग-अलग सोच को सुनने और समझने की, ऑनलाईन या ऑफलाईन अलग-अलग देश, पेशे, जात और धरम, अलग-अलग जेंडर के लोगों से संपर्क करने की। यह विविधता इंसानों को गुफाकाल से, पाषाणकाल से, चकमक पत्थरों से लाकर अंतरिक्ष तक पहुंचा चुकी है, और आज इंसानों का हाल यह हो चला है कि वे असल जिंदगी में, और आभासी जीवन में भी अपनी पसंद की, एल्गोरिद्म की छांटी हुई, और अब एआई की सुझाई हुई गुफा में रह रहे हैं। अब वे अगल-बगल की दूसरी गुफा में बसे हुए लोगों से भी अधिक संपर्क रखने पर भरोसा नहीं रखते हैं, क्योंकि अब सामानों से लेकर खानपान तक, और फल-सब्जी तक की गुफा-डिलीवरी होने लगी है, और लोग अपनी दिमागी जरूरतें भी अपनी वैचारिक गुफा के भीतर पूरी करने लगे हैं। जिस नस्ल की कल्पनाएं खुले आसमान पर उन्मुक्त उड़ान भरना भूल जाएं, वे अंतरिक्ष तो दूर, आसमान पर भी उड़ान भरने की संभावना खो बैठती हैं। पंखों को भी हवा के प्रतिरोध के खिलाफ फडफ़ड़ाकर उड़ान भरना होता है, अपनी ही दिशा में चलने वाली हवा में उडक़र कोई आसमान तक नहीं पहुंच सकते। उनकी हालत नदी में बहाव की दिशा में बहने वाले मुर्दों सरीखी होकर रह जाती है जो बिना किसी कोशिश की बहाव के साथ आसानी से बहते चले जाते हैं। लोगों को विविधता, असहमति, विरोध, प्रतिरोध के महत्व को कम नहीं आंकना चाहिए क्योंकि जब इंसान ने पहली बार आग पाई थी, तो दो चकमक पत्थरों को आपस में टकराकर, उनके रगडऩे से चिंगारी पैदा करके उसने पहली आग सुलझाई थी। संघर्ष और रगडऩे से बहुत डरना-सहमना ठीक नहीं है। बिना दूसरी दिशा में मथे हुए तो दूध या दही से मक्खन भी नहीं निकलता है। इसलिए दूसरी दिशा, दूसरे बहाव, दूसरे विचार, दूसरी आस्था के महत्व को कम नहीं आंकना चाहिए, चकमक पत्थर से जो घर्षण शुरू हुआ, उसी ने वायु मंडल को चीरकर अंतरिक्ष तक पहुंचने वाले रॉकेट को प्रतिरोध से उबरना सिखाया। आज वैचारिक हुआ-हुआ से ऊपर उठने की जरूरत है, हालांकि जंग और चुनाव के वक्त ऐसी बातें कहना लोग बागी मान सकते हैं।


