संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : देश में पिछले दो-चार दिनों में बने दो विश्व रिकॉर्ड!
सुनील कुमार ने लिखा है
27-Apr-2026 3:47 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय :  देश में पिछले दो-चार दिनों में बने दो विश्व रिकॉर्ड!

हिन्दुस्तान में इन दिनों दो तरह के रिकॉर्ड बन रहे हैं, पहला रिकॉर्ड तो गर्मी का है, दुनिया के नक्शे में भारत सबसे गर्म देश के रूप में दर्ज हुआ है। दुनिया के सौ सबसे गर्म देशों में से 90 से 95 शहर तो अकेले भारत में हैं, जबकि खाड़ी के जो रेगिस्तानी देश परंपरागत रूप से बहुत गर्म रहते आए हैं, वे भी भारत से पीछे रह गए हैं। दुनिया में सबसे गर्म 20 शहरों में से 19 भारत में हैं, और एक शहर लगे हुए नेपाल का लुम्बिनी है, जो कि भारत को प्रभावित करने जैसा ही है। भारत में रेगिस्तानी राजस्थान और गुजरात से परे के बिहार के भागलपुर, ओडिशा के तालचेर, और बंगाल के आसनसोल जैसे शहर 44-45 डिग्री के साथ दुनिया के सबसे गर्म शहरों में शामिल हैं। छत्तीसगढ़ भी इसी तबके में आ चुका है। मौसम का जो नक्शा गर्मी को लाल रंग से दिखाता है, उस नक्शे पर पूरे का पूरा हिन्दुस्तान लहूलुहान सा दिख रहा है। अब दूसरा रिकॉर्ड जो बन रहा है, वह इससे जुड़ा हुआ भी है। भारत में अभी 24 अप्रैल को बिजली की मांग 256.11 गीगा वॉट रही है, जो कि रिकॉर्डतोड़ है। पिछले साल यह सबसे अधिक 243 गीगा वॉट थी, लेकिन साल भर में ही जितने एयरकंडीशनर बढ़े हैं, और गरीबों के घरों में भी कूलर लगने से बिजली की जो खपत बढ़ी है, उसकी वजह से राष्ट्रीय स्तर पर यह अधिकतम खपत का नया रिकॉर्ड बना है। जबकि आज देश में अंतरराष्ट्रीय जंग और अस्थिरता के चलते हुए बहुत से कारखाने बंद हैं, या उन्होंने उत्पादन घटाया हुआ है। भारत के बिजली खपत में सबसे बड़ा हिस्सा, 41 फीसदी उद्योगों का ही है। 25 फीसदी बिजली घरों में खर्च होती है, और 17 फीसदी खेती में। कारोबार 8 फीसदी बिजली खर्च करते हैं। अब देश में बिजली की खपत कारखानों की कुछ घटी हुई मांग के बावजूद इतिहास में सबसे अधिक हो चुकी है, और 2031-32 तक यह और सौ गीगा वॉट बढ़ सकती है, 2040 तक यह खपत दुगुनी हो सकती है।

अब हम यह देखना चाहते हैं कि पूरी दुनिया में भारत जब सबसे गर्म देश बन ही चुका है, और सबसे गर्म शहरों के 95 फीसदी अकेले भारत में हैं, तो इस देश को अपने बारे में सोचना चाहिए। न सिर्फ पर्यावरणशास्त्री, बल्कि चिकित्सा विज्ञानी भी बार-बार यह खतरा गिनाते हैं कि बहुत अधिक गर्मी होने से इंसानी सेहत पर क्या फर्क पड़ता है? वे किस तरह जानलेवा खतरे में पड़ जाती है, और उसकी उत्पादकता कम हो जाती है। आमतौर पर मई-जून के महीने सबसे अधिक गर्म रहते थे, लेकिन अब भारत में लू काफी पहले, मार्च-अप्रैल में ही शुरू हो जाती है, जो कि लंबे समय तक रहती है। लोगों को शायद याद नहीं होगा कि अभी दो-चार बरस पहले उत्तर भारत में अधिक लू और गर्मी की वजह से गेहूं की फसल बहुत बुरी तरह प्रभावित हुई थी, और उसके पौधों में, दानों में दूध नहीं आ पाया था। अब जलवायु परिवर्तन की वजह से एक तो भारत के ऊपर समुद्री सतह गर्म होने से गर्मी का एक दबाव बना हुआ है, और एंटी साइक्लोन स्थिति बन जाने से गर्मी बढ़ते चल रही है। इसके अलावा पाकिस्तान और खाड़ी के देशों की ओर से सूखी और गर्म हवा भारत में पहुंच रही है, और हिमालय इन्हें आगे बढऩे से रोकता है, जिससे उत्तर-मध्य भारत एक हॉटबॉक्स बन गया है।

यह सब तो जलवायु परिवर्तन और प्रकृति के व्यापक फेरबदल की वजह से हुआ है, दूसरी तरफ शहरों में लगातार कांक्रीट के जंगल विकसित होते जा रहे हैं, इमारतें बढ़ती जा रही हैं, डामर और कांक्रीट की सडक़ें बढ़ती चल रही हैं, गाडिय़ां बढ़ती चल रही हैं। ये सारी चीजें दिन के सबसे गर्म घंटों में गर्मी को सोख लेती हैं, और रात में भी पूरी तरह ठंडी नहीं हो पाती हैं, जब सूरज ढलने के बाद हवा कुछ ठंडी होती है, तब भी ये चीजें अपनी गर्मी हवा में छोड़ती हैं, इसलिए शहरों में रात का तापमान भी ग्रामीण इलाकों के मुकाबले खासा ज्यादा रहता है। फिर लगातार यह बात खबरों में रहती है कि किस तरह हरियाली कटती जा रही है, और तालाब पटते जा रहे हैं। इन दोनों की वजह से नमी खत्म हो रही है, पानी की कमी तो हो रही है। भारत के इस मार्च-अप्रैल में मानसून के पहले की बारिश बहुत कम हुई है, और धरती को ठंडा होने का मौका ही नहीं मिला है। इन तमाम बातों को मिलाकर नौबत बहुत खतरनाक हो गई है, और हम भी बार-बार लोगों से इस बात की अपील करते हैं कि वे दोपहर के सबसे गर्म घंटों में अपने कर्मचारियों और कामगारों को बिना बहुत जरूरी हुए बाहर खुले में न भेजें।

फिर भारत जैसे देश में जो आर्थिक असमानता बढ़ रही है, उसके चलते हुए सरकार में बैठे हुए लोग, नीति-निर्धारक, मीडिया, और उद्योग-व्यापार के बड़े लोग, जो कि मायने रखते हैं, वे खुद तो एसी की सहूलियत में रह लेते हैं, एसी गाडिय़ों में घूम लेते हैं, और देश-प्रदेश की जो फिक्र होनी चाहिए, वह नहीं हो पाती है। जब तक लोग खुद न झेलें, तब तक वे नौबत सुधारने की सोच भी नहीं सकते। आज भारत में पिछले 20 बरस से अधिक की सरकारें जंगल की परिभाषा को बदलकर किसी भी तरह के शहरी वृक्षारोपण को खींचतान कर जंगल की परिभाषा में फिट करने लगी हैं। ऐसा करने में किसी पार्टी की सरकार का अलग से कोई सोचना नहीं रहा। नतीजा यह रहा कि सरकार बदले हुए पैमानों के आधार पर यह कहने लगी है कि देश में फॉरेस्ट-कवरेज पहले से बढ़ गया है। जब अपने आपको धोखा देने के लिए झूठ बार-बार बोला जाए, तो धीरे-धीरे खुद को उस पर भरोसा भी होने लगता है, और जब समस्या को ही अनदेखा कर दिया जाए, तो समाधान की जरूरत क्या रहती है? जलवायु परिवर्तन से लेकर बढ़ती हुई गर्मी तक का समाधान जब लोग अपने निजी इस्तेमाल के एसी में ढूंढ लेते हैं, तो नौबत बेहतर होने की गुंजाइश नहीं रहती है। एक पेड़ कितने किस्म से गर्मी को कम करता है, मौसम में और क्या-क्या फर्क लाता है, इसकी चर्चा भी अब बंद हो चुकी है। शहरी कॉलोनियों से लेकर कारखानों के अहातों तक वृक्षारोपण नाम का होने लगा है, और उसका असली जंगल का विकल्प बनने का दावा झूठा रहता है।

अभी मई-जून शुरू भी नहीं हुआ है, और भारत में ये दो नए रिकॉर्ड बन गए हैं। दुनिया के सबसे गर्म सौ शहरों में से 95 फीसदी हिन्दुस्तान में हैं, और बिजली की खपत यहां इतिहास में सबसे अधिक हो चुकी है। जिन लोगों के माथे पर पूरे भारत के नक्शे के लाल हो जाने पर भी कोई शिकन नहीं है, उनके बारे में यह तय मान लेना चाहिए कि वे माथे किसी न किसी एसी कमरे में हैं और एसी गाड़ी में सफर करते हैं।  (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक) 


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