संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : पांच राज्यों के चुनावों में विदेशी मुद्दों की छाया कितनी, धर्म की कितनी?
सुनील कुमार ने लिखा है
18-Mar-2026 4:54 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : पांच राज्यों के चुनावों में विदेशी मुद्दों की छाया कितनी, धर्म की कितनी?

पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों की घोषणा हो चुकी है, और अगले महीने 9 से 29 तारीख के बीच असम, केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, और पुदुचेरी में चुनाव हो जाएंगे। इन पांच राज्यों में तीन राज्य कुछ अधिक दिलचस्प हैं जहां मुस्लिम और ईसाई आबादी काफी है। इनमें असम में करीब 34 फीसदी मुस्लिम, और 4 फीसदी ईसाई वोटर हैं। कुछ जिले ऐसे भी हैं जहां मुस्लिम वोटर 50 से 70 फीसदी तक हैं। भाजपा के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा मुस्लिम आबादी को बरसों से एक बड़ा मुद्दा बनाकर चल रहे हैं कि राज्य का ढांचा ही बढ़ते मुस्लिमों से बदल जाएगा। मुस्लिमों के साथ-साथ असम और पश्चिम बंगाल में बांग्लादेश से आकर बसे हुए लोगों का भी एक बड़ा मुद्दा है जिनकी छंटनी करने में चुनाव आयोग लगा हुआ है, और दसियों लाख वोटरों के कागजात की छानबीन बंगाल में अभी बाकी है। वहां सीपीएम और तृणमूल कांग्रेस ने यह सवाल भी उठाया है कि चुनाव की घोषणा के दिन तक 50 लाख से अधिक वोटरों के कागजात की जांच बाकी है, और ऐसे में चुनाव कैसे करवाए जा सकते हैं? बंगाल में असम से कम, लेकिन 27 फीसदी मुस्लिम वोटर हैं। कुछ जिलों में मुस्लिम वोटरों का अनुपात खासा है। बंगाल में भी वामपंथी पार्टियों और कांग्रेस को पीछे छोडक़र भाजपा प्रमुख विपक्षी दल बनी हुई है, और उसने बांग्लादेशी घुसपैठियों का एक बड़ा मुद्दा बनाया हुआ है। अब केरल चलते हैं जहां पर 27 फीसदी मुस्लिम वोटर हैं, और 18 फीसदी ईसाई वोटर हैं। इन दोनों प्रमुख अल्पसंख्यक समुदायों को देखें, तो केरल इन सारे पांच राज्यों में सबसे आगे है। तमिलनाडु और पुदुचेरी में मुस्लिम और ईसाई वोटर मिलाकर करीब 12 फीसदी हैं, और इन राज्यों में धार्मिक ध्रुवीकरण जैसी नौबत नहीं है।

इस मुद्दे पर लिखने की आज इसलिए सूझी कि मुस्लिम बहुल राज्यों में आज एक अलग किस्म का तनाव भी चल रहा होगा। इजराइल और अमरीका, दोनों गैरमुस्लिम, और एक किस्म से मुस्लिम-विरोधी देशों ने एक शिया-मुस्लिम देश ईरान पर इतिहास का सबसे बड़ा हमला किया है। फिर इसके जवाब में ईरान ने अड़ोस-पड़ोस के दूसरे मुस्लिम देशों पर हमला किया है, जहां पर अमरीकी फौजी अड्डे हैं। कहने के लिए ये हमले सिर्फ फौजी ठिकानों पर हो रहे हैं, लेकिन पूरी दुनिया में ऐसे कोई हमले दर्ज नहीं हो रहे जो फौज पर किए जाएं, और फौज पर ही निशाना लगे। यूक्रेन से लेकर गाजा तक, और ईरान के पड़ोसियों से लेकर अफगानिस्तान के काबुल तक नागरिक ठिकानों पर हमले आम बात हैं, और केरल से खाड़ी के देशों में जाकर बसे हुए और काम करने वाले लाखों मलयाली लोगों पर ईरान-युद्ध का क्या असर होगा, यह अभी साफ नहीं है। भारत के मुस्लिमों में शिया मुस्लिम बहुत कम हैं, इसलिए जब खाड़ी के दूसरे गैरशिया मुस्लिम देशों पर शिया-ईरान का हमला हो रहा है, तो ऐसे देशों में बसे हुए भारतीय मुस्लिम, और गैरमुस्लिमों की क्या प्रतिक्रिया होगी, यह अभी साफ नहीं है। फिर यह भी साफ नहीं है कि क्या भारत के घरेलू प्रादेशिक चुनावों में इन सबका कोई असर होगा। लेकिन हम जिस तरह असम और बंगाल में बांग्लादेशी घुसपैठिया मुस्लिमों, और बाकी मुस्लिमों के मुद्दे को देख रहे हैं, उसी तरह केरल में भी हम मुस्लिम और ईसाई समुदाय की भावनाओं को समझना चाहते हैं क्योंकि केरल अपने लोगों की परदेस में मौजूदगी की वजह से हो सकता है कि कई भावनाओं से, घटनाओं से प्रभावित होता हो।

हमने अंदाज लगाने की कोशिश की, तो बंगाल और असम में तो बांग्लादेशी, और दीगर मुस्लिमों के मुद्दे सबसे बड़े हैं। एक तरफ भाजपा खुलकर इन दोनों तबकों के खिलाफ हैं, हिमंत बिस्वा सरमा तो हेट-स्पीच की सीमा में भीतर दूर तक जाकर बयान देते हैं, और बंगाल में भी जिन दसियों लाख वोटरों के नाम वोटर लिस्ट से अभी तक बाहर हैं, उनमें शायद मुस्लिम ही सबसे अधिक हैं। कई लोगों का यह भी मानना है कि मतदाता पुनरीक्षण का अभियान चुनावी नतीजे पहले ही तय कर चुका है। बंगाल में एक वक्त जो मुस्लिम समुदाय वामपंथियों के साथ था, वह अब पूरी तरह से ममता बैनर्जी के साथ है, क्योंकि वामपंथी किसी भी तरह से भाजपा को रोकने की ताकत अब नहीं रखते। ऐसे में ममता के पक्ष में मुस्लिमों का एक मजबूत ध्रुवीकरण चुनावी नतीजों को ममता के खिलाफ भी ले जा सकता है, क्योंकि करीब 27 फीसदी मुस्लिम मतदाताओं में से एक बड़े हिस्से के मतदाता सूची से बाहर हो जाने का आसार दिख रहा है।

अब चूंकि हम सभी चुनावी राज्यों पर धार्मिक आधार पर एक नजर डाल रहे हैं, इसलिए तमिलनाडु, और उसके छोटे से पड़ोसी पुदुचेरी की भी बात कर लें, जो कि एक ही वंश के हैं। पुदुचेरी 1962 में उस वक्त के मद्रास राज्य (अब तमिलनाडु) से अलग हुआ, और तब से यह केन्द्र प्रशासित प्रदेश चले आ रहा है। इन दोनों ही राज्यों की जातीय संरचना में, संस्कृति और भाषा में बड़ी समानता है। दोनों में अल्पसंख्यकों से लेकर ब्राम्हण और पिछड़ी जातियों का अनुपात आसपास है, और दोनों में दलित समुदायों का अनुपात भी करीब है। इसलिए इस चुनाव में हम धार्मिक आधार पर विश्लेषण में मोटेतौर पर तमिलनाडु को देख रहे हैं जहां कि द्रविड़ पहचान, और तमिल भाषा सबसे बड़े मुद्दे रहते हैं। यहां पर ईसाई और मुस्लिम आबादी 12 फीसदी के करीब है, लेकिन वह सत्तारूढ़ दलित पार्टी, डीएमके के साथ रहती है। तमिलनाडु में भाजपा वहां की सत्तारूढ़ डीएमके को हिन्दूविरोधी करार देते आई है, और डीएमके के मंत्री-मुख्यमंत्री, और बाकी बड़े-बड़े नेता भाजपा को इसका मौका भी देते आए हैं। तमिलनाडु की राजनीति एकदम खुलकर दलित, और गैरदलित राजनीति है, इसलिए यहां पर हिन्दुओं और दूसरे अल्पसंख्यक धर्मों के बीच कोई सीधा ध्रुवीकरण नहीं है। यह जरूर है कि गैरहिन्दू लोग अपने को एक गैरदलित पार्टी के साथ अधिक जुड़ा हुआ पाते हैं क्योंकि वहां पर भाजपा सनातनी मुद्दों को लेकर अपनी जमीन बनाने में लगी हुई है। एक दिलचस्प, लेकिन छोटा सा पहलू यह भी है कि जिस तरह असम और बंगाल में बांग्लादेश एक मुद्दा है, उसी तरह तमिलनाडु में श्रीलंका के तमिलों का मुद्दा हमेशा बने रहता है। हम यह तो नहीं कहते कि तमिलनाडु का चुनाव श्रीलंका के तमिल मुद्दे से प्रभावित होगा, लेकिन केन्द्र पर सत्तारूढ़ गठबंधन की श्रीलंका नीति, और खासकर तमिल नीति को तमिलनाडु में गौर से देखा जाता है। वहां पर भाजपा गैरडीएमके पार्टी के साथ भागीदारी करके अपने सनातनी एजेंडे को आगे बढ़ा सकती है, लेकिन आज खाड़ी में जो चल रहा है, या बांग्लादेशी घुसपैठियों का जो मुद्दा है, तमिलनाडु इन दोनों से अछूता है। उसके धर्म और जाति के मुद्दे घरेलू हैं।

यह विश्लेषण कुछ लोगों को इन राज्यों के चुनावी विश्लेषण के पैमाने पर एक अतिसरलीकरण लग सकता है, लेकिन हमने एक नजर में दिखने वाले, धर्म, जाति, और विदेशी मुद्दों को छूने की कोशिश भर की है। देखते हैं आगे कुछ अधिक जानकार विश्लेषक इन पहलुओं पर क्या लिखते हैं। 

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