दुर्ग
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
दुर्ग, 26 अगस्त। ऋषभ नगर स्थित नवकार भवन में चातुर्मास प्रवचन श्रृंखला के तहत मधुर व्याख्यायनी साध्वी प्रभावती श्रीजी ने कहा कि क्रोध के बाद मान यानी अहंकार एक ऐसा भाव है जो सांसारिक जीवन में मनुष्य भव व संस्कारों को बिगाड़ देता है। अहंकार का भाव जिस भी मनुष्य के भीतर हो वह मनुष्य पुण्य कम पाप का संचय ज्यादा कर लेता है। अहंकारी मनुष्य का स्वभाव, बर्ताव, आचार, व्यवहार सब कुछ विसंगतिपूर्ण हो जाता है। ऐसे व्यक्ति हमेशा स्वयं को श्रेष्ठ और दूसरों को निकृष्ट समझते हैं।
मनुष्य की जीवन को छह प्रकार के ‘कार’ प्रभावित करते हैं। ये ‘कारें’ कर्म बंधन बांधने में सहायक होते हैं और धर्म साधना के मार्ग से भटका देते हैं। पहला कार है, ‘अलंकार’- मतलब आभूषण, जेवरात आदि। जिस भी व्यक्ति के पास आभूषण अधिक परिमाण में होगा उसकी जान का खतरा बना रहेगा। इन कीमती जेवरातों की रक्षा-सुरक्षा के प्रति व्यक्ति हमेशा चिंतित रहता है। इससे कई बार जान जाने का खतरा भी उत्पन्न हो जाता है। दूसरा कार साध्वी ने बताया ‘अधिकार’- अधिकार सम्पन्न व्यक्ति को शक्ति अहंकार हो जाता है। शक्तिशाली व्यक्ति अपने प्रभाव क्षेत्र व कार्य क्षेत्र में अपनी ही चलाता है। इससे अन्य लोगों को मानसिक चोट लगती है।
घूम-फिरकर कालांतर में यह भाव अधिकार सम्पन्न व्यक्ति को ही चोट पंहुचाता है। इससे उसके भाव और भव दोनों बिगड़ जाते हैं। इसी तरह ‘धिक्कार’ फटकार और अंधकार ये सभी तत्व भी व्यक्ति को कष्ट पंहुचाने वाले ही होते हैं। अंत में अहंकार जो व्यक्ति को ऊंचा उठाने के बजाए नीचे गिरा देता है। महासती ने कहा कि जीवन में शांति, सद्गुण और समभाव से रहना चाहते हैं तो उपरोक्त ‘कारों’ से उतरें और विनम्रता के विमान पर सवार हो जाएंगे तो विनम्रता का यह विमान आप को ऊपर ले जाएगा।


